Krishnapingal Sankashti Chaturthi Vrat Katha: सनातन धर्म में प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी भगवान श्रीगणेश को समर्पित होती है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आने वाली कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व माना गया है।
Krishnapingal Sankashti Chaturthi Vrat Katha: सनातन धर्म में प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी भगवान श्रीगणेश को समर्पित होती है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आने वाली कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन भगवान गणेश केकृष्णपिङ्गल स्वरूप की पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं, बुद्धि, बल, यश और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है तथा मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में धर्मसेन नाम का एक न्यायप्रिय और धर्मात्मा राजा राज्य करता था। उसकी प्रजा सुखी थी, लेकिन स्वयं राजा और रानी संतान सुख से वंचित थे। अनेक यज्ञ, दान और पूजा करने के बाद भी उन्हें संतान की प्राप्ति नहीं हुई। धीरे-धीरे राजा का मन निराश रहने लगा।एक दिन महल मेंमहर्षि लोमश का आगमन हुआ। राजा और रानी ने उनका आदर-सत्कार किया और अपनी पीड़ा सुनाई। महर्षि ने ध्यान लगाकर कहा, "राजन! तुम्हारे पूर्व जन्म के कुछ कर्मों के कारण तुम्हें यह कष्ट प्राप्त हुआ है। यदि तुम आषाढ़ कृष्ण पक्ष की कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी का व्रत पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से करोगे तथा भगवान श्रीगणेश के कृष्णपिङ्गल स्वरूप की आराधना करोगे, तो तुम्हारे सभी संकट दूर हो जाएंगे।"महर्षि की आज्ञा पाकर राजा और रानी ने व्रत करने का संकल्प लिया। चतुर्थी के दिन दोनों ने प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए। भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें दूर्वा, लाल पुष्प, सिंदूर, मोदक और लड्डू अर्पित किए। पूरे दिन उपवास रखा और भगवान गणेश के मंत्रों का जप किया।
संध्या समय चंद्रमा के उदय की प्रतीक्षा की गई। चंद्र दर्शन के बाद भगवान गणेश को अर्घ्य अर्पित कर विधिपूर्वक पूजा संपन्न की गई। इसके पश्चात व्रत कथा सुनी और ब्राह्मणों को भोजन तथा दक्षिणा देकर व्रत का पारण किया।भगवान गणेश की कृपा से कुछ ही समय बाद रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। पूरा राज्य आनंद से भर गया। राजा ने इसे भगवान गणेश की कृपा माना और प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने का संकल्प लिया।समय बीतता गया। राजकुमार बड़ा होकर अत्यंत बुद्धिमान, पराक्रमी और धर्मनिष्ठ बना। उसने राज्य का विस्तार किया और प्रजा का कल्याण किया। राजा धर्मसेन ने समझ लिया कि भगवान गणेश की भक्ति और व्रत का प्रभाव कभी व्यर्थ नहीं जाता।
इसी राज्य में एक निर्धन ब्राह्मण भी रहता था। वह अत्यंत विद्वान था, किंतु आर्थिक तंगी के कारण उसका परिवार कष्ट में जीवन व्यतीत कर रहा था। एक दिन उसने राजा से पूछा कि उनके जीवन में इतना बड़ा परिवर्तन कैसे आया।राजा ने उसे कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व बताया। ब्राह्मण ने भी पूर्ण श्रद्धा से यह व्रत करना आरंभ किया। वह प्रत्येक चतुर्थी को उपवास रखता, भगवान गणेश का स्मरण करता और अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्हें गुड़, दूर्वा तथा मोदक अर्पित करता।कुछ ही महीनों में उसके जीवन के कष्ट समाप्त होने लगे। उसे सम्मान मिलने लगा, धन की प्राप्ति हुई और उसके परिवार में सुख-शांति का वास हो गया। उसने अनुभव किया कि भगवान गणेश केवल भव्य पूजा से नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा और निष्काम भक्ति से प्रसन्न होते हैं।
धीरे-धीरे इस व्रत की महिमा पूरे राज्य में फैल गई। जो भी व्यक्ति श्रद्धा, विश्वास और नियमपूर्वक कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी का व्रत करता, उसके जीवन के संकट दूर होने लगते। रोगी को स्वास्थ्य, निर्धन को धन, विद्यार्थी को विद्या, व्यापारी को उन्नति तथा दंपत्तियों को संतान सुख प्राप्त होने लगा।तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि भगवान गणेश के कृष्णपिङ्गल स्वरूप की आराधना विशेष रूप से जीवन के कठिन संकटों को समाप्त करती है। "कृष्ण" का अर्थ गहरा अथवा श्याम वर्ण और "पिङ्गल" का अर्थ सुनहरा अथवा ताम्रवर्ण माना गया है। यह स्वरूप भगवान गणेश के तेज, ज्ञान और शक्ति का प्रतीक है, जो भक्तों के जीवन से अज्ञान, भय और बाधाओं का नाश करता है। यह भी पढ़ें:- Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)