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Jitiya Vrat Sutra: महिलाएं क्यों पहनती हैं जितिया धागा? जानें इसका धार्मिक महत्व और पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी
सार

Jitiya Vrat Mahatva: हिंदू धर्म में मां का स्थान सर्वोच्च होता है। वह न केवल अपना जीवन संतान को समर्पित कर देती है, बल्कि उसके सुख-स्वास्थ्य के लिए हर संभव प्रयास करती है। ऐसे ही एक परंपरा है जितिया व्रत, जो मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है।

Jitiya
Jitiya Vrat 2025: हिंदू धर्म में मां का स्थान सर्वोच्च होता है। वह न केवल अपना जीवन संतान को समर्पित कर देती है, बल्कि उसके सुख-स्वास्थ्य के लिए हर संभव प्रयास करती है। ऐसे ही एक परंपरा है जितिया व्रत, जो मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। यह व्रत रखने वाली महिलाएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं। यह एक कठिन निर्जला उपवास है, जहां पूरे दिन बिना पानी और भोजन के रहना पड़ता है, लेकिन इसमें छिपा है मां के असीम प्रेम और समर्पण का भाव। आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत रखा जाता है, जो इस साल 14 सितंबर 2025 को पड़ रही है। इस व्रत की शुरुआत नहाय-खाय से होती है और तीन दिनों तक चलता है।इस व्रत का एक अनूठा पहलू है जितिया धागा या सूत्र, जिसे महिलाएं कलाई पर बांधती हैं। यह धागा केवल एक रेशमी या सूती रस्सी नहीं, बल्कि मां के अटूट प्रेम, विश्वास और संतान की सुरक्षा का प्रतीक है। लेकिन आखिर यह धागा क्यों पहना जाता है? इसके पीछे क्या धार्मिक महत्व और पौराणिक कथा है? चलिए इस बारे में जानते हैं...

जितिया व्रत का धार्मिक महत्व

जितिया व्रत का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक स्तर पर भी गहरा है। यह व्रत मां-बच्चे के बीच के पवित्र बंधन को मजबूत करता है। मान्यता है कि इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करने वाली मां की संतान को जीवन में कोई कष्ट नहीं सताता। बच्चे दीर्घायु होते हैं, उनके जीवन में सुख-समृद्धि आती है और सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। यह व्रत विशेष रूप से पुत्रों की लंबी आयु के लिए रखा जाता है, लेकिन आजकल बेटियों के लिए भी किया जाता है। 

जितिया धागे का महत्व

जितिया व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो इस साल 14 सितंबर 2025 को पड़ रहा है। इस व्रत के दौरान महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं और अपनी संतान की लंबी आयु की कामना करती हैं। जितिया धागा इस व्रत का एक अभिन्न हिस्सा है। यह धागा आमतौर पर लाल या पीले रंग का होता है, जिसमें कई बार पांच या सात गांठें लगाई जाती हैं। इसे मां अपनी दाहिनी कलाई पर बांधती है या गले में पहनती हैं और कुछ जगहों पर बच्चों की कलाई पर भी बांधा जाता है। 

धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह धागा संतान की रक्षा के लिए एक रक्षाकवच का काम करता है। इसे बांधने से न केवल मां और बच्चे के बीच का भावनात्मक बंधन मजबूत होता है, बल्कि यह भगवान जीमूतवाहन और माता गंगा की कृपा का प्रतीक भी माना जाता है। यह सूत्र मां की प्रार्थनाओं को स्वर्ग तक पहुंचाने और बच्चों को बुरी नजर, रोग और विपत्तियों से बचाने का माध्यम माना जाता है। धागे की हर गांठ एक संकल्प का प्रतीक होती है, जो मां अपनी संतान के लिए लेती है- जैसे दीर्घायु, स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि। 

कहा जाता है कि इस धागे को बांधने से मां की तपस्या और आस्था एक सूत्र में बंध जाती है, जो बच्चों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। यह धागा तब तक कलाई पर रखा जाता है, जब तक यह स्वयं टूटकर न गिर जाए। इसे जबरदस्ती उतारना अशुभ माना जाता है। कुछ समुदायों में इसे व्रत के बाद गंगा नदी या किसी पवित्र जलाशय में विसर्जित भी किया जाता है, ताकि मां की प्रार्थनाएं पूरी हों।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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