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Mahabharata: लाक्षागृह से निकलकर कहां पहुंचे थे पांडव? जानें दुर्योधन के षड्यंत्र की पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी
सार

Mahabharata Katha: महाभारत में कौरवों और पांडवों के बीच का तनाव शुरू से ही स्पष्ट था। हस्तिनापुर के सिंहासन पर दृष्टि रखने वाले दुर्योधन को पांडवों की बढ़ती लोकप्रियता और युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा असहनीय थी, जिसके बाद दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए लाक्षागृह षड्यंत्र रचा।

लाक्षागृह
Mahabharata Mythological Story: महाभारत की गाथाएं हमें साहस, धैर्य और धर्म की राह दिखाती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि पांडवों को एक ऐसी आग में झोंकने की साजिश रची गई थी, जिसे पार करना असंभव लगता था? लाक्षागृह की कथा एक ऐसी रोमांचक और पौराणिक कहानी है, जो दुर्योधन की ईर्ष्या और पांडवों की बुद्धिमानी को उजागर करती है। यह सवाल हर किसी के मन में उठता है कि आखिर पांडव उस भयंकर अग्निकांड से कैसे बचे और लाक्षागृह की आग से निकलकर कहां पहुंचे? आइए, इस जानते हैं कि कैसे पांडवों ने दुर्योधन के इस खतरनाक षड्यंत्र को नाकाम किया और अपनी यात्रा को आगे बढ़ाया। 

लाक्षागृह षड्यंत्र 

महाभारत में कौरवों और पांडवों के बीच का तनाव शुरू से ही स्पष्ट था। हस्तिनापुर के सिंहासन पर दृष्टि रखने वाले दुर्योधन को पांडवों की बढ़ती लोकप्रियता और युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा असहनीय थी। पांडवों के पिता पांडु की मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र ने पांडवों को अपने संरक्षण में लिया, लेकिन दुर्योधन ने ईर्ष्या में एक खतरनाक योजना बनाई। उसने अपने मामा शकुनि और मित्र कर्ण के साथ मिलकर पांडवों को समाप्त करने की साजिश रची। इस साजिश का केंद्र था-लाक्षागृह, अर्थात लाख का घर।

दुर्योधन ने अपने विश्वासपात्र पुरोचन को इस योजना का जिम्मा सौंपा। योजना थी कि पांडवों को वारणावत नामक स्थान पर एक भव्य महल में ठहराया जाए, जो दिखने में तो शानदार हो, लेकिन वास्तव में लाख, राल और अन्य ज्वलनशील पदार्थों से बना हो। इस महल में आग लगाकर पांडवों और उनकी माता कुंती को जला देने की साजिश थी। दुर्योधन का मानना था कि इस तरह पांडवों का अंत हो जाएगा और हस्तिनापुर का सिंहासन उसका हो जाएगा।

लाक्षागृह का निर्माण 

दुर्योधन ने धृतराष्ट्र को वारणावत के एक उत्सव में पांडवों को भेजने का सुझाव दिया। धृतराष्ट्र ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। पांडवों को उनके माता कुंती सहित वारणावत भेजा गया। वहां पुरोचन ने एक भव्य महल तैयार किया था, जिसे उसने लाख, राल, घी और अन्य ज्वलनशील सामग्रियों से बनवाया था। यह महल इतना सुंदर था कि किसी को संदेह न हो, लेकिन इसका असली मकसद पांडवों को जलाकर मारना था।

पांडव जब इस महल में पहुंचे तो युधिष्ठिर की सूझबूझ ने उन्हें सतर्क कर दिया। युधिष्ठिर ने महल की दीवारों और संरचना को देखकर संदेह किया कि यह सामान्य नहीं है। उनकी यह शंका तब और गहरी हो गई, जब विदुर ने उन्हें गुप्त रूप से संदेश भेजा। विदुर को दुर्योधन की साजिश का पता चल चुका था। उन्होंने पांडवों को एक गुप्त संदेश भेजा। इस संदेश ने पांडवों को सतर्क कर दिया।

लाक्षागृह से कैसे बचे पांडव

युधिष्ठिर ने अपने भाइयों- भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव के साथ इस खतरे का सामना करने की योजना बनाई। विदुर ने उनकी सहायता के लिए एक खनिक यानी सुरंग बनाने वाला भेजा, जिसने महल के नीचे एक गुप्त सुरंग खोदी। यह सुरंग पांडवों के लिए भागने का रास्ता थी। पांडवों ने पुरोचन की हर गतिविधि पर नजर रखी और सही समय का इंतजार किया।

एक रात, जब पुरोचन ने महल में आग लगाने की योजना बनाई, पांडव तैयार थे। भीम की ताकत और अर्जुन की बुद्धिमानी ने इस योजना को और मजबूत किया। पांडवों ने पहले ही पुरोचन की साजिश को भांप लिया था। उस रात, जब आग लगाई गई तो पांडव और कुंती उस गुप्त सुरंग के माध्यम से सुरक्षित बाहर निकल गए। हालांकि, इस अग्निकांड में पुरोचन स्वयं जलकर मर गया। साथ ही, एक भीलनी और उसके पांच पुत्र भी आग में मारे गए, जो उस रात महल में मेहमान थे। यह संयोग दुर्योधन के लिए फायदेमंद रहा, क्योंकि उसने सोचा कि पांडव और कुंती मर चुके हैं।

लाक्षागृह से बचकर पांडव कहां पहुंचे?  

लाक्षागृह की आग से बचने के बाद पांडव और कुंती सुरंग के रास्ते एक घने जंगल में पहुंचे। यह जंगल वारणावत के निकट था और पांडवों के लिए एक अस्थायी शरणस्थली बन गया। इस जंगल में वे कुछ समय तक छिपे रहे, ताकि दुर्योधन और उसके सहयोगियों को उनकी जीवित होने की भनक न लगे। जंगल में रहते हुए पांडवों को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन भीम की शक्ति और युधिष्ठिर की बुद्धिमानी ने उन्हें हर परिस्थिति में संबल प्रदान किया।

जंगल में रहते हुए पांडवों का सामना एक राक्षस हिडिम्ब से हुआ। भीम ने हिडिम्ब को युद्ध में परास्त किया और उसकी बहन हिडिम्बा भीम से प्रेम करने लगी। बाद में हिडिम्बा और भीम का विवाह हुआ और उनके पुत्र घटोत्कच का जन्म हुआ। पांडवों ने जंगल में कुछ समय बिताने के बाद अपनी यात्रा जारी रखी और अंततः एकचक्रा नगरी पहुंचे। वहां वे एक ब्राह्मण के घर में छिपकर रहे और अपनी पहचान गुप्त रखी। एकचक्रा में ही भीम ने बकासुर नामक राक्षस का वध किया, जिसने वहां के निवासियों को आतंकित कर रखा था।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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