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Jagannath Yatra: राजस्थान के इस शहर में मनाया जाता है जगन्नाथ पूरी की परंपरा, सांस्कृतिक विरासत का है प्रतीक

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Jagannath Yatra: ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर उदयपुर के ऐतिहासिक जगदीश मंदिर में भगवान जगन्नाथ का विशेष स्नान परम्परागत रूप से सम्पन्न कराया गया। यह अनुष्ठान ठीक उसी प्रकार सम्पन्न हुआ, जिस तरह जगन्नाथ पुरी में भगवान जगन्नाथ के साथ होता है। 

Jagannath Yatra
Jagannath Yatra: ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर उदयपुर के ऐतिहासिक जगदीश मंदिर में भगवान श्री जगन्नाथ का विशेष ज्येष्ठांगण स्नान परम्परागत रूप से सम्पन्न हुआ। यह अनुष्ठान ठीक उसी प्रकार सम्पन्न हुआ, जिस तरह जगन्नाथ पुरी में भगवान जगन्नाथ के साथ होता है। यहां पर सैकड़ों वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है। इस तरह के परंपर देखने के लिए मंगलवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ मंदिर में पहुंचे।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ माह की भीषण गर्मी भगवान सहन नहीं कर पाते, इसलिए उन्हें शीतलता प्रदान करने के लिए विशेष स्नान कराया जाता है। भगवान का दूध, दही, शहद, घी और पंचामृत से अभिषेक किया गया। इसके बाद 108 कलशों से शुद्ध जल से स्नान भी कराया गया। अभिषेक के बाद भगवान को वर्तमान काल की अवस्था में रखा जाता है, जिसे रोग अवस्था कहते हैं।

विश्राम काल में सामान्य दर्शन नहीं

इस अवधि में भगवान मंदिर के गर्भगृह में विश्राम करते हैं और उन्हें सामान्य दर्शन के लिए नहीं रखा जाता। भगवान की विशेष सेवा की जाती है और उन्हें हल्का, आसानी से पचने वाला भोजन अर्पित किया जाता है। पुजारी विनोद ने बताया कि यह परंपरा जगन्नाथ पुरी से प्रेरित होकर शुरू की गई है, क्योंकि उदयपुर का जगदीश मंदिर भी उसी परंपरा और स्थापत्य शैली पर आधारित है।

 
Jagannath Yatra
जेष्टांगन स्नान के बाद भगवान 15 दिन तक विश्राम करते हैं। फिर आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान चांदी के रथ पर सवार होकर पूरे शहर के भ्रमण के लिए निकलते हैं। पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह भगवान जगन्नाथ का रथ यात्रा उदयपुर शहर के सबसे प्राचीन और प्रमुख धार्मिक आयोजनों में से एक माना जाता है। इसे दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी रथ यात्रा माना जाता है।

सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है यह रथ यात्रा

हर साल देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु और पर्यटक इस विशाल रथ यात्रा में भाग लेते हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं विशेष रूप से सजाए गए रथ में विराजमान होकर शहर के मुख्य मार्गों से होते हुए वापस मंदिर पहुंचती हैं। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि यह संस्कृति और विरासत का जीवंत उदाहरण भी है, जो धार्मिक पर्यटन के लिहाज से उदयपुर को हर साल नई पहचान दिलाती है।

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