Valmiki Ramayana, Sundarkand, Sarg 42: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, हनुमान जी द्वारा अशोक वाटिका का विध्वंस किया जाता है।
Valmiki Ramayana, Sundarkand, Sarg 42: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, हनुमान जी द्वारा अशोक वाटिका का विध्वंस किया जाता है। उधर पक्षियों के कोलाहल और वृक्षों के टूटने की आवाज सुनकर समस्त लंकानिवासी भय से घबरा उठे। प्रमदावन में सोयी हुई विकराल मुखवाली राक्षसियों की निद्रा टूट गयी। उन्होंने उठने पर उस वन को उजड़ा हुआ देखा। साथ ही उनकी दृष्टि उन वीर महाकपि हनुमान जी पर भी पड़ी। महाबली, महान् साहसी एवं महाबाहु हनुमान् जी ने जब उन राक्षसियों को देखा, तब उन्हें डराने वाला विशाल रूप धारण कर लिया।
पर्वत के समान बड़े शरीरवाले महाबली वानर को देखकर वे राक्षसियाँ जनकनन्दिनी सीता से पूछने लगीं, यह कौन है? किसका है? और कहाँ से किसलिये यहाँ आया है ? इसने तुम्हारे साथ क्यों बातचीत की है? तब सर्वांगसुन्दरी साध्वी सीता ने कहा, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले राक्षसों को समझने या पहचानने का मेरे पास क्या उपाय है? तुम्हीं जानो यह कौन है और क्या करेगा? साँप के पैरों को साँप ही पहचानता है, इसमें संशय नहीं है। मैं भी इसे देखकर बहुत डरी हुई हूँ। मुझे नहीं मालूम कि यह कौन है? मैं तो इसे इच्छानुसार रूप धारण करके आया हुआ कोई राक्षस ही समझती हूँ।
विदेहनन्दिनी सीता की यह बात सुनकर राक्षसियाँ बड़े वेग से भागीं। उनमें से कुछ तो वहीं खड़ी हो गयीं और कुछ रावण को सूचना देने के लिये चली गयीं। रावण के समीप जाकर उन विकराल मुखवाली राक्षसियों ने रावण को यह सूचना दी कि कोई विकटरूपधारी भयंकर वानर प्रमदावन में आ पहुँचा है। राजन् ! अशोक वाटिका में एक वानर आया है, जिसका शरीर बड़ा भयंकर है। उसने सीता से बातचीत की है। वह महापराक्रमी वानर अभी वहीं मौजूद है। सम्भव है वह इन्द्र या कुबेर का दूत हो अथवा श्रीराम ने ही उसे सीता की खोज के लिये भेजा हो।
मनोहर पल्लवों और पत्तों से भरा हुआ वह विशाल अशोक वृक्ष, जिसके नीचे सीता का निवास है, उसने सुरक्षित रख छोड़ा है। राक्षसराज! जिन्हें आपने अपने हृदय में स्थान दिया है, उन सीता देवी से कौन बातें कर सकता है? जिसने अपने प्राणों का मोह नहीं छोड़ा है, वह उनसे वार्तालाप कैसे कर सकता है? राक्षसियों की यह बात सुनकर राक्षसों का राजा रावण प्रज्वलित चिता की भाँति क्रोध से जल उठा। उसके नेत्र रोष से घूमने लगे। उस महातेजस्वी निशाचर ने हनुमान जी को कैद करने के लिये अपने ही समान वीर किंकर नामधारी राक्षसों को जाने की आज्ञा दी।
राजा की आज्ञा पाकर अस्सी हजार वेगवान् किंकर हाथों में कूट और मुद्गर लिये उस महल से बाहर निकले। प्रमदावन के फाटक पर खड़े हुए उन वानरवीर के पास पहुँचकर वे महान् वेगशाली निशाचर उनपर चारों ओर से इस प्रकार झपटे, जैसे फतिंगे आग पर टूट पड़े हों। तब पर्वत के समान विशाल शरीरवाले तेजस्वी श्रीमान् हनुमान् भी अपनी पूँछ को पृथ्वी पर पटककर बड़े जोर से गर्जने लगे। पवनपुत्र हनुमान् अत्यन्त विशाल शरीर धारण करके अपनी पूँछ फटकारने और उसके शब्द से लङ्का को प्रतिध्वनित करने लगे।
उनकी पूँछ फटकारने का गम्भीर घोष बहुत दूर तक गूंज उठता था। उससे भयभीत हो पक्षी आकाश से गिर पड़ते थे। उस समय हनुमान जी ने उच्च स्वर से इस प्रकार घोषणा की। मैं अनायास ही महान् पराक्रम करने वाले कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजी का दास हूँ। मेरा नाम हनुमान् है। मैं वायु का पुत्र तथा शत्रुसेना का संहार करने वाला हूँ। जब मैं हजारों वृक्ष और पत्थरों से प्रहार करने लगूंगा, उस समय सहस्रों रावण मिलकर भी युद्ध में मेरे बल की समानता अथवा मेरा सामना नहीं कर सकते। मैं लङ्कापुरी को तहस नहस कर डालूँगा और मिथिलेशकुमारी सीता को प्रणाम करने के अनन्तर सब राक्षसों के देखते-देखते अपना कार्य सिद्ध करके जाऊँगा।
हनुमान जी ने अपने स्वामी का नाम लेकर स्वयं ही अपना परिचय दे दिया था, इसलिये राक्षसों को उन्हें पहचानने में कोई संदेह नहीं रहा। वे नाना प्रकार के भयंकर अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते हुए चारों ओर से उन पर टूट पड़े। उन शूरवीर राक्षसों द्वारा सब ओर से घिर जाने पर महाबली हनुमान् ने फाटक पर रखा हुआ एक भयंकर लोहे का परिघ उठा लिया। जैसे विनतानन्दन गरुड़ ने छटपटाते हुए सर्प को पंजों में दाब रखा हो, उसी प्रकार उस परिघ को हाथ में लेकर हनुमान जी ने उन निशाचरों का संहार आरम्भ किया। जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र अपने वज्र से दैत्यों का वध करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने उस परिघ से सामने आये हुए समस्त राक्षसों को मार डाला।
तदनन्तर वहाँ उस भय से मुक्त हुए कुछ राक्षसों ने जाकर रावण को यह समाचार निवेदन किया कि समस्त किंकर नामक राक्षस मार डाले गये। राक्षसों की उस विशाल सेना को मारी गयी सुनकर राक्षसराज रावण की आँखें चढ़ गयीं और उसने प्रहस्त के पुत्र को जिसके पराक्रम की कहीं तुलना नहीं थी तथा युद्ध में जिसे परास्त करना नितान्त कठिन था, हनुमान जी का सामना करने के लिये भेजा।