विज्ञापन
Home  dharm  jagannath yatra ke teeno ratho ke nam vishesta aur mahatav

Jagannath Yatra: जगन्नाथ यात्रा के तीनों रथों के नाम, विशेषता और महत्व

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Jagannath Yatra:  भारत की सबसे भव्य और दिव्य धार्मिक यात्राओं में से एक जगन्नाथ रथयात्रा का विशेष स्थान है। यह यात्रा ओडिशा के पुरी में प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन निकाली जाती है।

Jagannath Yatra: 
Jagannath Yatra:  भारत की सबसे भव्य और दिव्य धार्मिक यात्राओं में से एक जगन्नाथ रथयात्रा का विशेष स्थान है। यह यात्रा ओडिशा के पुरी में प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन निकाली जाती है। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडीचा मंदिर तक यात्रा करते हैं। इस रथयात्रा को देखने और रथ खींचने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि रथ की रस्सी को श्रद्धापूर्वक खींचने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और उसे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। रथयात्रा का सबसे आकर्षक पक्ष भगवानों के तीनों विशाल रथ हैं। हर रथ का अपना अलग नाम, रंग, आकार, ध्वज, सारथी, घोड़े और आध्यात्मिक महत्व है। आइए जानते हैं तीनों रथों की विशेषताएं और उनका धार्मिक महत्व।

 1. भगवान जगन्नाथ का रथ – नंदीघोष

भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम  नंदीघोष है। इसे कभी-कभी गरुड़ध्वज या कपिध्वज भी कहा जाता है। यह तीनों रथों में सबसे बड़ा और सबसे ऊंचा होता है।

विशेषताएं

ऊंचाई लगभग 45 से 46 फीट।
इसमें 16 विशाल पहिए होते हैं।
पहियों का व्यास लगभग 7 फीट होता है।
रथ का मुख्य रंग लाल और पीला होता है।
इसके चार सफेद घोड़े होते हैं।
रथ के सारथी का नाम दारुक माना जाता है।
रथ के शीर्ष पर गरुड़ ध्वज स्थापित किया जाता है।

धार्मिक महत्व

नंदीघोष भगवान विष्णु के दिव्य वैभव और संपूर्ण सृष्टि के पालनकर्ता स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। भगवान जगन्नाथ जब इस रथ पर बैठकर नगर भ्रमण करते हैं तो यह संदेश देते हैं कि ईश्वर केवल मंदिरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं।लाल रंग शक्ति और उत्साह का प्रतीक है, जबकि पीला रंग ज्ञान, धर्म और समृद्धि का संकेत देता है। नंदीघोष जीवन में धर्म, प्रेम और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

 2. भगवान बलभद्र का रथ – तालध्वज

भगवान जगन्नाथ के बड़े भाई भगवान बलभद्र के रथ का नाम तालध्वज है। यह तीनों रथों में सबसे पहले चलता है और शक्ति तथा संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।

 विशेषताएं

 ऊंचाई लगभग 44 फीट।
 इसमें 14 पहिए होते हैं।
 रथ का मुख्य रंग लाल और हरा होता है।
इसके चार काले घोड़े होते हैं।
 सारथी का नाम मातलि माना जाता है।
 रथ पर ताड़ वृक्ष का ध्वज लगाया जाता है, इसलिए इसका नाम तालध्वज पड़ा।

 धार्मिक महत्व

भगवान बलभद्र शक्ति, धैर्य और धर्म की रक्षा के प्रतीक हैं। उनका रथ यह संदेश देता है कि जीवन में केवल ज्ञान ही पर्याप्त नहीं, बल्कि साहस, संयम और कर्तव्यपालन भी आवश्यक हैं।हरा रंग प्रकृति, उन्नति और जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ऊर्जा और पराक्रम को दर्शाता है। तालध्वज हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए सदैव दृढ़ रहना चाहिए।

3. देवी सुभद्रा का रथ – दर्पदलन

भगवान जगन्नाथ की बहन देवी सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलन है। इसे देवदलन या पद्मध्वज भी कहा जाता है। यह तीनों रथों में सबसे छोटा होता है।

विशेषताएं
ऊंचाई लगभग 43 फीट।
 इसमें 12 पहिए होते हैं।
रथ का मुख्य रंग लाल और काला होता है।
 इसके चार लाल घोड़े होते हैं।
 सारथी का नाम अर्जुन माना जाता है।
 रथ पर कमल का ध्वज स्थापित किया जाता है।

धार्मिक महत्व

दर्पदलन का अर्थ है अहंकार का नाश करने वाला। देवी सुभद्रा करुणा, प्रेम, मातृत्व और शक्ति की प्रतीक मानी जाती हैं। उनका रथ यह संदेश देता है कि मनुष्य को अपने भीतर के अभिमान, क्रोध और अहंकार का त्याग करना चाहिए।कमल की भांति संसार में रहते हुए भी मन को निर्मल और पवित्र बनाए रखना ही सच्ची आध्यात्मिकता है।

तीनों रथों का निर्माण कैसे होता है?

हर वर्ष अक्षय तृतीया से तीनों रथों का निर्माण प्रारंभ होता है। इन रथों को विशेष प्रकार की लकड़ी से बनाया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं। पुराने रथों का पुनः उपयोग नहीं किया जाता।रथ निर्माण का कार्य केवल परंपरागत सेवायत परिवारों के कुशल कारीगरों द्वारा किया जाता है। निर्माण के दौरान शास्त्रीय नियमों और धार्मिक परंपराओं का पूरी श्रद्धा के साथ पालन किया जाता है। प्रत्येक रथ के लिए निर्धारित संख्या में लकड़ी, पहिए, खंभे और अन्य भाग बनाए जाते हैं।

रथ खींचने का महत्व

जगन्नाथ रथयात्रा में लाखों श्रद्धालु रस्सी पकड़कर रथ खींचते हैं। यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भगवान के प्रति समर्पण का प्रतीक है। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से रथ खींचता है, उसके अनेक जन्मों के पाप नष्ट होते हैं और उसे भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद प्राप्त होता है।यह यात्रा समाज में समानता का भी संदेश देती है। यहां किसी जाति, वर्ग, धर्म या पद का भेदभाव नहीं होता। राजा से लेकर सामान्य व्यक्ति तक सभी एक साथ रथ खींचते हैं। यही जगन्नाथ संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है।

 तीनों रथों का आध्यात्मिक संदेश

तीनों रथ केवल लकड़ी से बने वाहन नहीं हैं, बल्कि जीवन के तीन महत्वपूर्ण आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

नंदीघोष- हमें ईश्वर की भक्ति, धर्म और करुणा का मार्ग दिखाता है।
तालध्वज- साहस, शक्ति, कर्तव्य और धर्मरक्षा की प्रेरणा देता है।
दर्पदलन- विनम्रता, प्रेम, करुणा और अहंकार त्याग का संदेश देता है।

जब ये तीनों रथ एक साथ आगे बढ़ते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो ज्ञान, शक्ति और भक्ति स्वयं मानव जीवन का मार्गदर्शन कर रहे हों।

यह भी पढ़ें 

Lord Jagannath: आखिर किस भक्त की पीड़ा भोगते हैं भगवान जगन्नाथ? पौराणिक कथा से जानें अनासर काल का रहस्य

Jagannath Rath Yatra: क्या है जगन्नाथ रथयात्रा के नियम? जानें भगवान जगन्नाथ के रथ को कौन खींच सकता है

Bhagvan Jagannath: जानिए क्या हुआ जब भगवान जगन्नाथ को लेना पडा गणेश जी का स्वरूप


(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

 

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel