हिंदू धर्म में भगवान जगन्नाथ भगवान विष्णु के एक स्वरूप हैं। भगवान जगन्नाथ को ओडिशा के पुरी में भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ पूजा जाता है। प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास में विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा से पहले एक अनूठी परंपरा होती है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा बीमार पड़ते हैं। इसे अनवसार या अनासर के नाम से जाना जाता है। इस दौरान भगवान 15 दिनों तक अनासर घर में विश्राम करते हैं और भक्तों को उनके दर्शन नहीं मिलते, लेकिन भगवान जगन्नाथ के बीमार होने की यह परंपरा क्यों है? इसके पीछे की पौराणिक कथा, इस अवधि में होने वाली रीति-रिवाज और इसका धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व क्या है? आइए इस बारे में जानते हैं...
भगवान जगन्नाथ के बीमार होने की परंपरा
प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को पुरी के जगन्नाथ मंदिर में विशेष स्नान कराया जाता है। इस दौरान 108 घड़ों में पवित्र जल, चंदन और औषधियों से भगवानों का अभिषेक होता है। मान्यता है कि इस भव्य स्नान के बाद भगवान बुखार से पीड़ित हो जाते हैं और उन्हें 15 दिनों के लिए अनासर घर में ले जाया जाता है। इस अवधि में भक्तों को दर्शन बंद हो जाते हैं और मंदिर के पुजारी भगवानों की विशेष देखभाल करते हैं। इस परंपरा को अनवसार कहा जाता है और इसके समापन के बाद नवयौवन दर्शन और रथ यात्रा का आयोजन होता है।
भगवान जगन्नाथ क्यों पड़ते हैं बीमार?
भगवान जगन्नाथ के बीमार होने की परंपरा के पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। चलिए जानते हैं इसके बारे में...
1. माता लक्ष्मी का क्रोध और श्राप
एक पौराणिक कथा के अनुसार स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का भव्य स्नान समारोह आयोजित किया जाता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ की पत्नी देवी लक्ष्मी को स्नान समारोह में शामिल नहीं किया जाता है। इससे नाराज होकर देवी लक्ष्मी भगवान को श्राप देती हैं कि स्नान के बाद वे बीमार पड़ जाएंगे और उन्हें 15 दिनों तक एकांत में रहना होगा। इस श्राप के कारण भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा स्नान पूर्णिमा के बाद बुखार से पीड़ित हो जाते हैं और अनासर घर में आराम करते हैं।
2. भक्त की भक्ति और भगवान की लीला
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार एक भक्त ने भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना की कि वे उनके गांव में पधारें। भगवान ने भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके गांव में जाने का वचन दिया, लेकिन स्नान पूर्णिमा के बाद भारी वर्षा और ठंड के कारण भगवान बीमार पड़ गए और उन्हें अनासर घर में रहना पड़ा।
3. आदिवासी परंपरा और प्रतीकात्मकता
जगन्नाथ पूजा में आदिवासी संस्कृति का गहरा प्रभाव है। कुछ विद्वानों का मानना है कि अनवसार की परंपरा आदिवासी रीति से प्रेरित है, जिसमें देवताओं की मूर्तियों को समय-समय पर विश्राम और नवीकरण के लिए एकांत में रखा जाता है। इस दौरान मूर्तियों की मरम्मत और पुनर्चित्रण किया जाता है, जो भगवानों के 'नवयौवन' का प्रतीक है।
अनवसार के दौरान क्या होता है?
अनवसार की 15 दिनों की अवधि में कई विशेष रीति-रिवाज और परंपराएं निभाई जाती हैं...
स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को मंदिर के एक विशेष कक्ष में ले जाया जाता है। यह कक्ष गोपनीय होता है और केवल दइता ही वहां प्रवेश कर सकते हैं।
इस दौरान भगवानों की बीमारी का उपचार आयुर्वेदिक औषधियों और काढ़ों से किया जाता है। दइता पुजारी भगवानों को औषधीय काढ़ा, फल और अन्य पौष्टिक आहार अर्पित करते हैं।
अनवसार के दौरान भगवानों की काष्ठ की मूर्तियों की मरम्मत और पुनर्चित्रण किया जाता है। उनकी मूर्तियों पर नए रंग और प्राकृतिक लेप चढ़ाए जाते हैं, जो उनके नवयौवन का प्रतीक है।
इस अवधि में भक्तों को भगवानों के दर्शन नहीं मिलते। मंदिर में अन्य पूजाएं और अनुष्ठान सीमित रूप से होते हैं। भक्त मंदिर के बाहर से ही प्रार्थना करते हैं।
भगवानों के दर्शन बंद रहते हैं, भक्त मंदिर में रखे गए पट्टचित्र की पूजा करते हैं, जिनमें जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के चित्र अंकित होते हैं।
अनवसार के 15वें दिन भगवान स्वस्थ होकर नवयौवन रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इस दिन को 'नवयौवन दर्शन' कहा जाता है और भक्त बड़ी संख्या में मंदिर में उमड़ते हैं। इसके बाद रथ यात्रा का आयोजन होता है।
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