Raksha Bandhan: हिंदू धार्मिक परंपराओं में मौली या कलावा को भाई की कलाई पर बांधते समय तीन बार लपेटने की परंपरा कई जगहों पर प्रचलित है। इसे शुभ माना जाता है।
Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन के दिन बहन जब भाई की कलाई पर राखी बांधती है, तो यह केवल एक परंपरा नहीं बल्कि हिंदू धर्म में भाई-बहन के पवित्र रिश्ते से जुड़ा महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। राखी बांधते समय कई परिवारों में कुछ खास नियमों का पालन किया जाता है। इन्हीं में से एक सवाल अक्सर लोगों के मन में रहता है कि भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र कितनी बार लपेटना चाहिए? क्या राखी को तीन बार लपेटना जरूरी है या इसे केवल एक बार ही बांधा जाता है? क्या इसके पीछे कोई धार्मिक मान्यता भी जुड़ी है? आइए जानते हैं रक्षासूत्र बांधने से जुड़े धार्मिक नियम और मान्यता...
कितनी बार लपेटें रक्षा सूत्र?
हिंदू धार्मिक परंपराओं में मौली या कलावा को भाई की कलाई पर बांधते समय तीन बार लपेटने की परंपरा कई जगहों पर प्रचलित है। इसे शुभ माना जाता है। हालांकि, रक्षाबंधन की राखी के लिए शास्त्रों में ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं मिलता कि हर स्थिति में राखी को ठीक तीन बार ही लपेटना अनिवार्य है। राखी यदि धागे या मौली के रूप में है तो उसे कलाई पर सुविधानुसार लपेटकर बांधा जा सकता है। वहीं कई परिवारों में रक्षा सूत्र को तीन फेरे देकर बांधने की परंपरा निभाई जाती है। इसलिए तीन बार लपेटना एक प्रचलित धार्मिक परंपरा है, लेकिन इसे अनिवार्य नियम नहीं माना जाना चाहिए।
तीन बार लपेटने की मान्यता
हिंदू धर्म में संख्या तीन का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में तीन की संख्या का कई बार प्रयोग होता है। इसी कारण रक्षा सूत्र को तीन बार लपेटकर बांधने की परंपरा भी कई स्थानों पर देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, रक्षा सूत्र बांधते समय बहन अपने भाई के सुख, स्वास्थ्य, समृद्धि और लंबी आयु की कामना करती है। तीन फेरे या तीन बार लपेटकर बांधना इसी शुभ भावना के साथ जोड़ा जाता है।
राखी और रक्षा सूत्र में अंतर
यहां राखी और रक्षा सूत्र के बीच अंतर समझना भी जरूरी है। रक्षाबंधन पर बहन द्वारा भाई की कलाई पर बांधी जाने वाली राखी अलग-अलग डिजाइन और धागों से बनी हो सकती है। इसे आमतौर पर कलाई पर रखकर बांध दिया जाता है। वहीं रक्षा सूत्र या मौली धार्मिक अनुष्ठानों में इस्तेमाल होने वाला पवित्र धागा है। इसे पूजा के बाद कलाई पर बांधने की परंपरा है। मौली को कई जगह तीन बार लपेटकर बांधा जाता है, इसलिए यदि सवाल खास तौर पर मौली या रक्षा सूत्र को लेकर है, तो तीन बार लपेटने की परंपरा प्रचलित है।
राखी बांधने की सही विधि
रक्षाबंधन के दिन बहन सबसे पहले भाई को शुभ स्थान पर बैठाकर उसके माथे पर तिलक लगाती है। इसके बाद भाई की आरती की जाती है। फिर भाई की कलाई पर राखी या रक्षा सूत्र बांधा जाता है। राखी बांधते समय बहन भाई की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती है। इसके बाद भाई अपनी बहन को उपहार देता है और उसकी रक्षा का संकल्प लेने की परंपरा निभाई जाती है। यदि राखी में लंबा धागा है तो उसे कलाई पर जरूरत के अनुसार लपेटना चाहिए। धागा बहुत ज्यादा कसकर नहीं बांधना चाहिए, ताकि कलाई पर परेशानी न हो।
पहले कौन-सी कलाई पर बांधें?
हिंदू परंपरा में आमतौर पर भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधने की परंपरा है। पूजा-पाठ में दाहिने हाथ को शुभ कार्यों के लिए विशेष महत्व दिया जाता है। इसलिए रक्षाबंधन पर भी भाई की दाहिनी कलाई पर राखी बांधने की परंपरा अधिक प्रचलित है। हालांकि, अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में स्थानीय परंपराएं अलग हो सकती हैं। इसलिए घर में चली आ रही धार्मिक परंपरा का भी पालन किया जा सकता है।
राखी बांधते समय क्या बोलें?
राखी बांधते समय कई परिवारों में वैदिक मंत्र का उच्चारण किया जाता है। इसके लिए प्रसिद्ध मंत्र है-
“येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
इस मंत्र में राजा बलि से जुड़ी धार्मिक कथा का उल्लेख मिलता है। मंत्र के माध्यम से रक्षा सूत्र बांधते हुए रक्षा की भावना व्यक्त की जाती है।
क्या तीन बार बांधना जरूरी है?
रक्षाबंधन पर राखी को तीन बार ही लपेटना जरूरी है, ऐसा कोई एक निश्चित नियम सभी परंपराओं में नहीं मिलता। राखी का मुख्य भाव भाई-बहन के बीच प्रेम, रक्षा और मंगलकामना से जुड़ा है। यदि परिवार में राखी या रक्षा सूत्र को तीन बार लपेटकर बांधने की परंपरा है, तो उसी विधि से बांधा जा सकता है। वहीं साधारण राखी को एक बार कलाई पर बांधकर गांठ लगाना भी सामान्य परंपरा है, इसलिए रक्षाबंधन पर तीन बार लपेटने की परंपरा को शुभ और प्रचलित धार्मिक रीति के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसे अनिवार्य धार्मिक नियम मानना उचित नहीं है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)