Raksha Bandhan 2026: धार्मिक मान्यता के अनुसार राखी बांधना एक शुभ धार्मिक कार्य है। इस दौरान बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उसके मंगल और सुरक्षा की कामना करती है।
Raksha Bandhan: रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के प्रेम और आपसी विश्वास से जुड़ा माना जाता है। इस दिन बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी सुख-समृद्धि व लंबी आयु की कामना करती हैं। हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले तिथि, नक्षत्र और शुभ मुहूर्त का ध्यान रखने की परंपरा है। इसी वजह से रक्षाबंधन पर राखी बांधने के समय का भी विशेष महत्व बताया गया है। खासतौर पर राहुकाल में राखी बांधने को शुभ नहीं माना जाता। आखिर राहुकाल क्या है और इस समय राखी बांधने से क्यों बचने की धार्मिक मान्यता है? क्या इसके पीछे राहु से जुड़ी कोई पौराणिक कथा है? आइए जानते हैं।
क्या होता है राहुकाल
ज्योतिष और हिंदू पंचांग में राहुकाल को दिन के ऐसे समय के रूप में बताया जाता है, जिस दौरान शुभ कार्य करने से बचने की परंपरा है। मान्यता है कि राहुकाल का संबंध राहु ग्रह से है। राहु को नवग्रहों में छाया ग्रह माना गया है और ज्योतिष में इसे अशुभ प्रभाव देने वाला ग्रह माना जाता है। हर दिन राहुकाल का समय अलग होता है। यह सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच के समय के आधार पर निर्धारित किया जाता है। इसलिए रक्षाबंधन के दिन भी राखी बांधने से पहले पंचांग में राहुकाल का समय देखा जाता है।
राहुकाल में राखी क्यों नहीं बांधते
धार्मिक मान्यता के अनुसार राखी बांधना एक शुभ धार्मिक कार्य है। इस दौरान बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उसके मंगल और सुरक्षा की कामना करती है। ऐसे में इस शुभ कार्य के लिए ऐसा समय चुना जाता है, जिसे धार्मिक दृष्टि से अनुकूल माना गया हो। राहुकाल को शुभ कार्यों के लिए अनुकूल समय नहीं माना जाता। इसी कारण रक्षाबंधन पर भी राहुकाल के दौरान राखी बांधने से बचने की परंपरा है। मान्यता है कि शुभ कार्य यदि शुभ मुहूर्त में किया जाए तो उसका धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
राहु से जुड़ी है पौराणिक कथा
राहुकाल को समझने के लिए समुद्र मंथन से जुड़ी पौराणिक कथा का उल्लेख मिलता है। मान्यता के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन से अमृत प्राप्त किया तो भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाना शुरू किया। इसी दौरान स्वरभानु नाम का एक असुर देवता का रूप धारण करके सूर्य और चंद्रमा के बीच बैठ गया और अमृत पी लिया। सूर्य देव और चंद्र देव को जब इसका पता चला तो उन्होंने भगवान विष्णु को इसकी जानकारी दी। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। चूंकि वह अमृत पी चुका था, इसलिए उसका अंत नहीं हुआ। उसका सिर राहु और धड़ केतु कहलाया। तभी से राहु और केतु को छाया ग्रह माना गया। धार्मिक मान्यताओं में राहु को सूर्य और चंद्रमा का विरोधी भी बताया गया है।
शुभ काम से क्यों जोड़ा जाता है राहुकाल
हिंदू धर्म में समय का विशेष महत्व माना गया है। किसी भी शुभ कार्य के लिए मुहूर्त देखने की परंपरा काफी पुरानी है। विवाह, गृह प्रवेश, पूजा, यात्रा और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए शुभ समय चुना जाता है। राहुकाल को इसके विपरीत ऐसा समय माना गया है, जिसमें नए या शुभ कार्यों की शुरुआत करने से बचना चाहिए। हालांकि रोजमर्रा के जरूरी काम करने पर सामान्य रूप से रोक नहीं मानी जाती। धार्मिक मान्यता मुख्य रूप से शुभ कार्यों के आरंभ से जुड़ी है।
राखी बांधने के लिए शुभ समय क्यों चुनते हैं
राखी केवल भाई की कलाई पर धागा बांधने की रस्म नहीं है, बल्कि हिंदू धार्मिक परंपरा में इसे रक्षा सूत्र के रूप में देखा जाता है। बहन भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसके मंगल की कामना करती है और भाई बहन की रक्षा का संकल्प लेता है। इसी वजह से इस पूजा और रस्म के लिए भी शुभ समय का ध्यान रखा जाता है। राहुकाल में राखी न बांधने की मान्यता भी इसी धार्मिक परंपरा का हिस्सा है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)