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Krishna Janmashtami: कंस को कैसे मिली थी श्रीकृष्ण के जन्म की सूचना? जानें पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Krishna Janmashtami: मथुरा के राजा उग्रसेन के पुत्र कंस का अपनी बहन देवकी से बहुत स्नेह था। जब देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ, तब कंस स्वयं रथ चलाकर अपनी बहन और बहनोई को विदा करने जा रहा था। 

Krishna Janmashtami
Krishna Janmashtami: भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की कथा जितनी अद्भुत है, उतनी ही रहस्यमयी कंस को मिली उस सूचना की कहानी भी है। मथुरा का राजा कंस अपनी बहन देवकी से बहुत स्नेह करता था, लेकिन विवाह के बाद एक ऐसी आकाशवाणी हुई, जिसने उसके जीवन की दिशा ही बदल दी। आकाशवाणी में कहा गया कि देवकी की आठवीं संतान ही कंस के वध का कारण बनेगी। इसके बाद कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया और उनकी संतानों को जन्म लेते ही मारना शुरू कर दिया। लेकिन जब आठवीं संतान के रूप में स्वयं भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया, तब कंस को तुरंत यह जानकारी नहीं मिल सकी।

आखिर कंस को कैसे पता चला कि देवकी की आठवीं संतान का जन्म हो चुका है? क्या उसे उसी रात श्रीकृष्ण के जन्म की खबर मिल गई थी? और जन्म के बाद ऐसा क्या हुआ कि कंस स्वयं कारागार पहुंच गया? आइए जानते हैं पूरी पौराणिक कथा...

देवकी के विवाह में हुई आकाशवाणी

मथुरा के राजा उग्रसेन के पुत्र कंस का अपनी बहन देवकी से बहुत स्नेह था। जब देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ, तब कंस स्वयं रथ चलाकर अपनी बहन और बहनोई को विदा करने जा रहा था। उसी समय आकाशवाणी हुई। आकाशवाणी में कंस को चेतावनी दी गई कि देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी। यह सुनते ही कंस के मन में भय उत्पन्न हो गया। वह उसी समय देवकी को मारने के लिए तैयार हो गया।

वसुदेव ने उसे समझाया कि देवकी से उसे कोई भय नहीं है, क्योंकि भविष्यवाणी तो उसकी आठवीं संतान के बारे में हुई है। उन्होंने कंस से देवकी को जीवनदान देने का वचन लिया और कहा कि देवकी से जन्म लेने वाली प्रत्येक संतान को वह स्वयं उसके पास लाकर सौंप देंगे। वसुदेव के इस वचन के बाद कंस ने तत्काल देवकी को नहीं मारा, लेकिन उसने दोनों को कारागार में बंद कर दिया।

एक-एक करके मार दीं छह संतानें

समय बीतने पर देवकी ने पहली संतान को जन्म दिया। वसुदेव अपने वचन के अनुसार नवजात शिशु को कंस के पास ले गए। कंस ने पहले उस बालक को छोड़ दिया, क्योंकि आकाशवाणी में आठवीं संतान के हाथों उसके वध की बात कही गई थी। लेकिन बाद में नारद मुनि ने कंस को देवताओं की योजना और उसके पिछले जन्म से जुड़ी बातों के बारे में बताया। इसके बाद कंस का भय और बढ़ गया।

कंस ने देवकी और वसुदेव की संतानों को जन्म लेते ही मारना शुरू कर दिया। देवकी की पहली छह संतानों का वध कंस ने कर दिया। सातवीं संतान के समय भगवान विष्णु की योगमाया ने ऐसी लीला की कि देवकी का गर्भ मानो खाली हो गया। वास्तव में देवकी के गर्भ में स्थित शेषनाग के अंश भगवान शेष को योगमाया ने वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुंचा दिया। यही बालक आगे चलकर बलराम कहलाए। अब देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समय निकट आ गया था।

देवकी के गर्भ में आए भगवान

जब देवकी ने आठवीं बार गर्भ धारण किया, तब कंस को यह भय सताने लगा कि अब वही संतान जन्म लेने वाली है जिसके हाथों उसकी मृत्यु बताई गई है। उसने कारागार की सुरक्षा और भी कड़ी कर दी। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से पहले देवकी और वसुदेव कारागार में बंद थे। चारों ओर पहरा था और कंस के सैनिक हर समय निगरानी करते थे। ऐसी स्थिति में भी भगवान की दिव्य लीला को कोई रोक नहीं सकता था। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की अर्धरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया। उनके प्रकट होते ही कारागार दिव्य प्रकाश से भर गया।

चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए श्रीकृष्ण

भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले देवकी और वसुदेव के सामने अपना दिव्य चतुर्भुज रूप प्रकट किया। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे। उनके शरीर पर पीतांबर था और वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न दिखाई दे रहा था। भगवान को इस रूप में देखकर देवकी और वसुदेव समझ गए कि उनके सामने कोई सामान्य बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु प्रकट हुए हैं।

भगवान ने वसुदेव और देवकी को उनके पूर्व जन्म और अपनी दिव्य लीला के विषय में बताया। इसके बाद उन्होंने वसुदेव से कहा कि वे उन्हें गोकुल ले जाएं और वहां नंद बाबा के घर जन्मी कन्या को लेकर वापस कारागार में लौट आएं। भगवान की आज्ञा मिलते ही वसुदेव उन्हें लेकर कारागार से निकलने के लिए तैयार हुए।

कारागार के द्वार अपने आप खुल गए

उस समय भगवान की योगमाया से कारागार के सभी प्रहरी गहरी निद्रा में सो गए। जिन द्वारों पर भारी ताले लगे थे, वे अपने आप खुल गए। वसुदेव ने श्रीकृष्ण को टोकरी में रखा और उन्हें लेकर मथुरा से गोकुल की ओर चल पड़े। उस रात यमुना नदी उफान पर थी। वसुदेव जब यमुना के पास पहुंचे तो उन्होंने बालक श्रीकृष्ण को सिर के ऊपर उठाकर नदी पार करनी शुरू की। इसी दौरान शेषनाग ने अपने फनों को फैलाकर श्रीकृष्ण और वसुदेव को वर्षा से बचाया।

वसुदेव किसी तरह यमुना पार करके गोकुल पहुंचे। वहां नंद भवन में यशोदा माता ने एक कन्या को जन्म दिया था। योगमाया की लीला से यशोदा को यह ज्ञात नहीं था कि उनके यहां बालिका का जन्म हुआ है और उसी समय भगवान श्रीकृष्ण उनके घर पहुंच चुके हैं। वसुदेव ने श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुलाया और उनकी नवजात कन्या को लेकर वापस मथुरा के कारागार में आ गए।

कंस को मिली जन्म की सूचना

जब वसुदेव कारागार में वापस पहुंचे, तब योगमाया के प्रभाव से कारागार के द्वार फिर बंद हो गए और पहरेदारों की नींद खुल गई। देवकी के पास उस समय वही कन्या थी जिसे वसुदेव गोकुल से लेकर आए थे। जैसे ही पहरेदारों ने नवजात शिशु के रोने की आवाज सुनी, उन्होंने कंस को इसकी सूचना दे दी। कंस को पता चला कि देवकी ने आठवीं संतान को जन्म दे दिया है। यह समाचार मिलते ही कंस तुरंत कारागार की ओर दौड़ा। उसके मन में यही भय था कि देवकी की आठवीं संतान ही उसके वध का कारण बनेगी।

कन्या को भी मारना चाहता था कंस

कंस कारागार में पहुंचा और उसने देवकी से उस नवजात कन्या को छीन लिया। देवकी ने कंस से विनती की कि यह बालिका है और इससे उसे कोई भय नहीं है। लेकिन कंस पर भय और क्रोध हावी था। उसने देवकी की बात नहीं मानी। कंस ने उस कन्या को पत्थर पर पटककर मारने के लिए जैसे ही उसे ऊपर उठाया, वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई।

योगमाया ने कंस को बताया रहस्य

वह कन्या आकाश में दिव्य रूप धारण करके प्रकट हुई। उसके हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र थे और वह देवी के रूप में दिखाई दे रही थी। उसने कंस से कहा कि जिसे वह मारना चाहता था, वह जन्म ले चुका है और वह कहीं और पहुंच चुका है। देवी के इस वचन से कंस स्तब्ध रह गया। उसे समझ आ गया कि देवकी की आठवीं संतान उसके हाथ नहीं लगी। श्रीकृष्ण का जन्म हो चुका था और वे मथुरा से निकलकर गोकुल पहुंच चुके थे।

यही वह क्षण था जब कंस को पहली बार यह जानकारी मिली कि जिस बालक से उसे सबसे अधिक भय था, वह जन्म ले चुका है और उसकी आंखों के सामने होते हुए भी उसके हाथ नहीं आया। इसके बाद कंस ने मथुरा और आसपास के क्षेत्रों में जन्मे नवजात बालकों की खोज करवानी शुरू कर दी। उसे हर समय यही भय सताने लगा कि देवकी की आठवीं संतान कहीं न कहीं जीवित है। दूसरी ओर गोकुल में नंद बाबा के घर श्रीकृष्ण का बाल रूप में पालन-पोषण शुरू हो चुका था।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।) 

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