Lord Krishna: श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। द्वापर युग में जब मथुरा पर राजा कंस का शासन था, तब इसी नगरी के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। यह वही समय था जब कंस के अत्याचारों से मथुरा की प्रजा भयभीत थी और देवकी-वसुदेव भी उसके कारागार में बंद थे। ऐसे में एक सवाल अक्सर उठता है कि आखिर भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ने मथुरा को ही अपनी जन्मभूमि क्यों बनाया? कंस की नगरी में ही भगवान के जन्म लेने के पीछे कौन-सी पौराणिक कथा जुड़ी है? आइए जानते हैं श्रीकृष्ण के मथुरा में जन्म लेने की पूरी कथा।
मथुरा पर था कंस का शासन
पौराणिक कथाओं के अनुसार, मथुरा में राजा उग्रसेन का शासन था। उनके पुत्र कंस ने बलपूर्वक अपने पिता को सिंहासन से हटाकर स्वयं मथुरा का राजा बन गया था। कंस शक्तिशाली और पराक्रमी था, लेकिन उसके स्वभाव में क्रूरता बढ़ती जा रही थी। उसके शासन में मथुरा की प्रजा भय के वातावरण में रहने लगी थी। कंस की बहन देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ था। विवाह के बाद जब कंस स्वयं अपनी बहन देवकी को विदा करने के लिए रथ लेकर जा रहा था, तभी आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र कंस के वध का कारण बनेगा।
आकाशवाणी सुनकर कंस के होश उड़ गए। उसने उसी समय देवकी और वसुदेव को बंदी बनाने का निर्णय लिया। कंस ने देवकी के सामने ही वसुदेव को धमकी दी कि वह देवकी की संतान को जीवित नहीं छोड़ेगा। वसुदेव ने कंस को समझाया कि उसे देवकी से भय नहीं होना चाहिए और उनकी प्रत्येक संतान उसे सौंप दी जाएगी।
देवकी की संतानों का वध
कथा के अनुसार, देवकी की पहली संतान के जन्म के बाद वसुदेव ने अपना वचन निभाते हुए उस बालक को कंस के पास पहुंचा दिया। कंस ने पहले उस बालक को छोड़ दिया, लेकिन बाद में नारद मुनि से उसे यह जानकारी मिली कि देवकी की आठवीं संतान ही उसका अंत करेगी। इसके बाद कंस ने देवकी और वसुदेव की संतानों को जन्म लेते ही मारना शुरू कर दिया। एक-एक करके देवकी की छह संतानों का कंस ने वध कर दिया। सातवीं संतान के समय भगवान विष्णु की योगमाया के प्रभाव से गर्भ में स्थित शेषनाग के अंश को देवकी से रोहिणी के गर्भ में पहुंचा दिया गया। यही बालक आगे चलकर बलराम के नाम से प्रसिद्ध हुए। इसके बाद देवकी के गर्भ से स्वयं भगवान विष्णु के श्रीकृष्ण रूप में अवतार लेने का समय आया।
मथुरा में अवतार का कारण
पौराणिक मान्यता के अनुसार, पृथ्वी पर जब अधर्म और अत्याचार बढ़ गया था, तब देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की थी। पृथ्वी ने भी गौ का रूप धारण करके देवताओं के साथ भगवान विष्णु से अपनी पीड़ा कही थी। तब भगवान विष्णु ने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे स्वयं यदुवंश में अवतार लेकर पृथ्वी का भार कम करेंगे। इसी क्रम में भगवान विष्णु ने देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लेने का निर्णय किया। वसुदेव भी पूर्व जन्म में भगवान के प्रति विशेष भक्ति और तप से जुड़े हुए थे। देवकी और वसुदेव को भगवान के माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त होना भी इसी दिव्य कथा का हिस्सा माना जाता है।
मथुरा ही क्यों बनी जन्मभूमि
श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में होना केवल संयोग नहीं माना जाता। मथुरा यदुवंश की प्रमुख नगरी थी और देवकी-वसुदेव भी इसी राजवंश से जुड़े थे। कंस ने इसी नगरी पर अधिकार कर रखा था और अपने अत्याचारों से प्रजा को परेशान कर रहा था। ऐसे में भगवान का जन्म उसी स्थान पर हुआ जहां कंस का शासन था। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का अवतार कंस के अंत और मथुरा को उसके अत्याचार से मुक्त कराने के लिए भी हुआ था। इसलिए जिस नगरी में कंस ने भय का शासन स्थापित कर रखा था, वहीं भगवान का जन्म होना कथा का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है।
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात
जब श्रीकृष्ण के जन्म का समय आया, तब भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी। आधी रात का समय था। मथुरा की जेल में देवकी और वसुदेव बंदी थे। चारों ओर पहरेदार तैनात थे और कारागार के द्वार बंद थे। इसी समय देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि जन्म के समय भगवान ने अपने दिव्य चतुर्भुज रूप में देवकी और वसुदेव को दर्शन दिए। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे। भगवान ने माता देवकी और पिता वसुदेव को अपने दिव्य स्वरूप का परिचय दिया और बताया कि वे उनके पुत्र के रूप में अवतरित हुए हैं। भगवान ने उन्हें यह भी निर्देश दिया कि वे उन्हें तत्काल गोकुल ले जाएं और वहां नंद बाबा के घर जन्मी कन्या को लेकर वापस मथुरा लौट आएं।
वसुदेव लेकर चले गोकुल
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के साथ ही कारागार के सभी बंधन अपने आप खुल गए। पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए और जेल के द्वार भी खुल गए। वसुदेव ने नवजात श्रीकृष्ण को टोकरी में रखा और उन्हें लेकर मथुरा से गोकुल की ओर चल पड़े। उस समय यमुना नदी में जल का प्रवाह तेज था। वसुदेव जब यमुना के पास पहुंचे तो उन्होंने श्रीकृष्ण को सिर पर रखी टोकरी में सुरक्षित रखा और नदी पार करने लगे। धार्मिक कथा के अनुसार, भगवान की योगमाया से यमुना का मार्ग सुगम हो गया। शेषनाग ने भी अपने फन फैलाकर श्रीकृष्ण और वसुदेव को वर्षा से बचाया।
वसुदेव पहुंचे नंद भवन
वसुदेव गोकुल में नंद बाबा के घर पहुंचे। वहां उस समय यशोदा माता के यहां एक कन्या का जन्म हुआ था। वसुदेव ने श्रीकृष्ण को वहां सुला दिया और उस कन्या को अपने साथ लेकर मथुरा के कारागार में लौट आए। मथुरा पहुंचते ही कारागार के द्वार फिर बंद हो गए और वसुदेव-देवकी उसी तरह बंधन में आ गए। थोड़ी देर बाद कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिली। वह तुरंत कारागार में पहुंचा और नवजात कन्या को देवकी से छीन लिया।
कंस के हाथ से छूट गई योगमाया
कंस ने उस कन्या को भी देवकी की आठवीं संतान समझकर मारने का प्रयास किया। लेकिन जैसे ही उसने उसे पत्थर पर पटकना चाहा, वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई। वह देवी के रूप में प्रकट हुई और कंस से कहा कि जिसे वह मारना चाहता है, वह जन्म ले चुका है और सुरक्षित स्थान पर पहुंच चुका है। यह सुनकर कंस समझ गया कि देवकी की आठवीं संतान उसके हाथ से निकल चुकी है। दूसरी ओर श्रीकृष्ण गोकुल पहुंच चुके थे, जहां उनका पालन-पोषण नंद बाबा और यशोदा माता के घर हुआ।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)