facebook pixel
विज्ञापन
Home›  dharm›  festivals›  govardhan puja aur diwali ke beech kya hai sambandh janiye khaas baatein

Govardhan Puja: गोवर्धन पूजा और दिवाली के बीच क्या है संबंध? जानें खास बातें

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Puja Rituals: दिवाली और गोवर्धन पूजा दोनों ही पर्व जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली का संदेश देते हैं। दिवाली पर जहां माता लक्ष्मी से धन-वैभव और सुख की कामना की जाती है, वहीं गोवर्धन पूजा हमें प्रकृति, पशुधन और अन्न के महत्व को समझाती है।

Govardhan Puja
Govardhan Puja Traditions: हिंदू धर्म में दिवाली का त्योहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। इसकी शुरुआत धनतेरस से होती है और भाई दूज के साथ इसका समापन होता है। दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा करने की परंपरा है। गोवर्धन पूजा को अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गोवर्धन पूजा और दिवाली के बीच क्या संबंध है? आखिर दिवाली के अगले दिन ही गोवर्धन पूजा क्यों की जाती है? आइए जानते हैं इस पर्व का धार्मिक महत्व और इससे जुड़ी खास बातें।

दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा

गोवर्धन पूजा का पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। यह तिथि दिवाली के अगले दिन आती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, दिवाली पर माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करके सुख-समृद्धि की कामना की जाती है, जबकि इसके अगले दिन गोवर्धन पूजा के माध्यम से प्रकृति, अन्न, पशुधन और पर्यावरण के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। इस पर्व का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की उस लीला से है, जिसमें उन्होंने ब्रजवासियों को इंद्रदेव के प्रकोप से बचाया था। यही कारण है कि दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।

श्रीकृष्ण ने क्यों उठाया था गोवर्धन पर्वत?

पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में गोकुल और वृंदावन के लोग अच्छी वर्षा और फसल के लिए इंद्रदेव की पूजा करते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को समझाया कि उनके जीवन का आधार गोवर्धन पर्वत, जंगल, गायें और प्रकृति हैं। इसलिए उन्हें प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए और गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। इसके बाद ब्रजवासियों ने इंद्रदेव की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इससे इंद्रदेव क्रोधित हो गए और उन्होंने ब्रज में मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। लगातार बारिश से लोगों का जीवन संकट में पड़ गया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी ब्रजवासियों को उसके नीचे आश्रय दिया। सात दिनों तक भगवान ने पर्वत को उठाए रखा। अंत में इंद्रदेव को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी।

गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का संबंध?

गोवर्धन पूजा के दिन अन्नकूट बनाने की परंपरा है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को कई प्रकार के पकवान, मिठाइयां, फल और सब्जियों से बने व्यंजन अर्पित किए जाते हैं। मान्यता है कि गोवर्धन पर्वत उठाने के बाद ब्रजवासियों ने भगवान श्रीकृष्ण के प्रति आभार जताने के लिए तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाया था। तभी से अन्नकूट महोत्सव मनाने की परंपरा शुरू हुई।

दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा का महत्व

दिवाली और गोवर्धन पूजा दोनों ही पर्व जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली का संदेश देते हैं। दिवाली पर जहां माता लक्ष्मी से धन-वैभव और सुख की कामना की जाती है, वहीं गोवर्धन पूजा हमें प्रकृति, पशुधन और अन्न के महत्व को समझाती है। इस दिन गायों की पूजा और सेवा करने की भी परंपरा है। इस प्रकार गोवर्धन पूजा दिवाली के उत्सव को एक विशेष आध्यात्मिक अर्थ देती है। यह पर्व सिखाता है कि जीवन में केवल धन ही नहीं, बल्कि प्रकृति, अन्न, जल और पशुओं का संरक्षण भी जरूरी है। ભગવાન श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला हमें अहंकार छोड़कर प्रकृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव रखने की प्रेरणा देती है।

ये भी पढ़ें -  गोवर्धन पूजा के दिन किन नियमों का पालन करना चाहिए? जानें जरूरी बातें और महत्व

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel