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Rishi Panchami 2026: 15 या 16 सितंबर कब है ऋषि पंचमी, जानिए शुभ तिथि, मूहूर्त, पूजा नियम और धार्मिक महत्व

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Rishi Panchami Tithi: ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों और माता अरुंधती की श्रद्धापूर्वक पूजा, व्रत, कथा श्रवण, दान और सात्विक आचरण का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऋषि पंचमी व्यक्ति को आत्मशुद्धि, संयम और सदाचार की राह पर चलने की प्रेरणा देती है।
 

Rishi Panchami Tithi
Rishi Panchami Puja Muhurat: हिंदू धर्म में ऋषि पंचमी का व्रत विशेष धार्मिक महत्व रखता है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा करने और व्रत रखने की परंपरा है। खासतौर पर महिलाओं के बीच इस व्रत को लेकर विशेष आस्था देखने को मिलती है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत करने से व्यक्ति को आत्मशुद्धि का लाभ मिलता है और जाने-अनजाने हुए पापों से मुक्ति की कामना की जाती है।

इस साल लोगों के बीच यह सवाल बना हुआ है कि ऋषि पंचमी 15 सितंबर को मनाई जाएगी या 16 सितंबर को। पंचांग के अनुसार इस वर्ष ऋषि पंचमी का व्रत 15 सितंबर 2026, मंगलवार को रखा जाएगा। पंचमी तिथि 15 सितंबर की सुबह शुरू होकर 16 सितंबर की सुबह तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार व्रत और पूजा 15 सितंबर को करना शुभ माना जाएगा।

पंचांग के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 15 सितंबर 2026 को सुबह 7 बजकर 44 मिनट से शुरू होगी और 16 सितंबर को सुबह 8 बजकर 59 मिनट तक रहेगी। 15 सितंबर को सूर्योदय के समय पंचमी तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए इसी दिन ऋषि पंचमी का व्रत और पूजन किया जाएगा। 16 सितंबर को सुबह तक पंचमी तिथि जरूर रहेगी, लेकिन पर्व का मुख्य व्रत 15 सितंबर को ही माना जाएगा। ऋषि पंचमी हरतालिका तीज के दो दिन बाद और गणेश चतुर्थी के एक दिन बाद आती है। इस वजह से भाद्रपद शुक्ल पक्ष के इन प्रमुख व्रत और त्योहारों का धार्मिक क्रम भी आपस में जुड़ा हुआ माना जाता है।

ऋषि पंचमी 2026 का शुभ पूजा मुहूर्त

ऋषि पंचमी के दिन पूजा के लिए मध्याह्न का समय शुभ माना जाता है। 15 सितंबर 2026 को पूजा का समय लगभग सुबह 11 बजकर 02 मिनट से दोपहर 1 बजकर 30 मिनट तक रहेगा। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और स्थानीय समय के अंतर के कारण पूजा मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। इसलिए पूजा करने वाले श्रद्धालुओं को अपने शहर के पंचांग के अनुसार मुहूर्त देखना बेहतर रहेगा। यदि स्थानीय पंचांग में थोड़ा अंतर दिखाई दे तो अपने क्षेत्र की परंपरा और पंचांग को प्राथमिकता दी जा सकती है।

ऋषि पंचमी पर किनकी होती है पूजा?

ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ ऋषि का स्मरण किया जाता है। इनके साथ माता अरुंधती की पूजा भी की जाती है। सप्तऋषियों को भारतीय सनातन परंपरा में ज्ञान, तप, संयम और धर्म के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसलिए इस दिन उनकी पूजा के माध्यम से श्रद्धालु ज्ञान, सदाचार और पवित्र जीवन की कामना करते हैं।

ऋषि पंचमी की पूजा विधि

  • ऋषि पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना शुभ माना जाता है। 
  • इसके बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थल को साफ करें। 
  • श्रद्धालु व्रत का संकल्प लेकर सप्तऋषियों और माता अरुंधती का ध्यान करें।
  • पूजा के दौरान कलश स्थापित करके उस पर नारियल रखें। 
  • इसके बाद सप्तऋषियों का स्मरण करते हुए उन्हें जल, अक्षत, फूल, फल और नैवेद्य अर्पित करें। 
  • धूप और दीप जलाकर श्रद्धा से पूजा करें। 
  • इसके बाद ऋषि पंचमी की कथा सुनी या पढ़ी जाती है और अंत में आरती करें।
कई स्थानों पर पूजा की विधि स्थानीय परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसलिए परिवार में चली आ रही धार्मिक परंपरा का पालन करना भी उचित माना जाता है।

ऋषि पंचमी व्रत के नियम 

ऋषि पंचमी के दिन सात्विक जीवनशैली अपनाने की परंपरा है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार उपवास करते हैं। कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार या सात्विक भोजन के साथ व्रत करते हैं। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर कठिन उपवास करने के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार व्रत करना बेहतर है। इस दिन मन, वचन और कर्म से संयम रखने पर विशेष जोर दिया जाता है। किसी का अपमान न करना, क्रोध से बचना और जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना भी धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है। पूजा-पाठ के साथ दान और सेवा करने की परंपरा भी कई परिवारों में प्रचलित है।

ऋषि पंचमी का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऋषि पंचमी का व्रत आत्मशुद्धि और प्रायश्चित से जुड़ा हुआ है। पुराने समय से ही इस दिन सप्तऋषियों का पूजन कर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की परंपरा चली आ रही है। माना जाता है कि इस व्रत से व्यक्ति को अपने जीवन में शुद्धता, संयम और सदाचार अपनाने की प्रेरणा मिलती है। विशेष रूप से महिलाओं के लिए ऋषि पंचमी का व्रत महत्वपूर्ण माना गया है। परंपरागत मान्यता में इसे रजस्वला धर्म से जुड़े दोषों के प्रायश्चित और शुद्धि से जोड़ा गया है। हालांकि इन मान्यताओं को धार्मिक परंपरा के रूप में समझना चाहिए, इन्हें आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जाता।

इस दिन दान और सेवा का भी महत्व

ऋषि पंचमी के दिन पूजा के साथ दान-पुण्य करने की परंपरा है। जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना, वस्त्र देना या अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपयोगी वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से दान का उद्देश्य केवल वस्तु देना नहीं, बल्कि दूसरों की सहायता और सेवा की भावना विकसित करना भी है। इस दिन श्रद्धालु अपने जीवन में अच्छे कर्म करने और गलत आदतों को छोड़ने का संकल्प भी ले सकते हैं। यही ऋषि पंचमी की परंपरा का एक महत्वपूर्ण संदेश माना जाता है।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

 

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