Chandrama : चंद्रमा का घटना और बढ़ना, जिसे हम चंद्र कलाएं कहते हैं, आकाश में दिखने वाला एक बेहद खूबसूरत और वैज्ञानिक चमत्कार है। सनातन परंपरा में चंद्र देव को मन और औषधियों का कारक माना गया है
Chandrama : चंद्रमा का घटना और बढ़ना, जिसे हम चंद्र कलाएं कहते हैं, आकाश में दिखने वाला एक बेहद खूबसूरत और वैज्ञानिक चमत्कार है। सनातन परंपरा में चंद्र देव को मन और औषधियों का कारक माना गया है, वहीं विज्ञान के नजरिए से यह सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की आपसी स्थिति का खेल है।आइए समझते हैं कि चंद्र देव की यह कलाएं कैसे बदलती हैं और इसके पीछे का विज्ञान और महत्व क्या है।
कलाएं क्यों बदलती हैं ?
1.चंद्रमा द्वारा पृथ्वी की परिक्रमा: चंद्रमा लगभग 29.5 दिनोंमें पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है।
2. दृष्टिकोण : जैसे-जैसे चंद्रमा पृथ्वी के चक्कर लगाता है, पृथ्वी से हमें उसका सूर्य के प्रकाश से चमकने वाला हिस्सा अलग-अलग कोणों से दिखाई देता है। चंद्रमा का आधा हिस्सा हमेशा सूर्य की रोशनी से चमकता रहता है, लेकिन पृथ्वी से हम हर समय उस पूरे चमकते हुए हिस्से को नहीं देख पाते।
चंद्र मास के दो पक्ष: शुक्ल और कृष्ण पक्ष
एक चंद्र मास को दो पखवाड़ों या पक्षों में बांटा जाता है, जिनमें कुल मिलाकर 16 कलाएं मानी गई हैं 1. शुक्ल पक्ष - बढ़ता चंद्रमा
यह अवधि अमावस्या के अगले दिन से शुरू होकर पूर्णिमा तक चलती है। इसमें चंद्रमा का आकार रोज थोड़ा-थोड़ा बढ़ता जाता है।
अमावस्या: इस स्थिति में चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य के बीच में होता है। चंद्रमा का अंधकार वाला हिस्सा हमारी तरफ होता है, इसलिए आसमान में चंद्र देव दिखाई नहीं देते।
बाल चंद्र : अमावस्या के 2-3 दिन बाद, एक पतली सी चमकदार लकीर के रूप में चंद्रमा दिखाई देते हैं। इसे देखना बेहद शुभ माना जाता है।
प्रथम चतुर्थांश : जब चंद्रमा अपनी कक्षा का एक चौथाई हिस्सा पूरा कर लेता है, तब पृथ्वी से हमें उसका आधा हिस्सा चमकता हुआ दिखाई देता है।
गिब्बस :आधा से ज्यादा और पूरे से कम। इस दौरान चंद्रमा का आकार एक कूबड़ जैसा दिखता है।
पूर्णिमा : जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच में आ जाती है। इस समय चंद्रमा का पूरा प्रकाशित हिस्सा हमारे सामने होता है। चंद्र देव अपनी सभी 16 कलाओं से युक्त होकर पूरी रात चमकते हैं। 2. कृष्ण पक्ष — घटता चंद्रमा
पूर्णिमा के अगले दिन से लेकर अमावस्या तक के समय को कृष्ण पक्ष कहते हैं। इसमें चंद्रमा का आकार धीरे-धीरे घटने लगता है।
घटता गिब्बस : पूर्णिमा के बाद चंद्रमा का आकार एक छोर से थोड़ा कटना शुरू हो जाता है।
अंतिम चतुर्थांश : चंद्रमा एक बार फिर आधा दिखाई देता है, लेकिन इस बार उसका उलटा हिस्सा चमक रहा होता है।
घटता बाल चंद्र : अमावस्या के ठीक पहले, चंद्रमा फिर से एक पतली दरांती के आकार में आ जाता है, जो केवल सुबह के समय पूर्व में दिखाई देता है।इसके बाद चक्र दोबारा अमावस्या पर पहुंच जाता है और यह यात्रा निरंतर चलती रहती है।