विज्ञापन
Home  dharm  bhagvan ram ne kyo aur kaha ki thi shivling ki sthapna janiye katha

Bhagvan Ram: रामेश्वरम में भगवान राम ने क्यों स्थापित किया था शिवलिंग? जानिए पूरा रहस्य

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Bhagvan Ram : त्रेतायुग में भगवान श्री राम द्वारा शिवलिंग की स्थापना की कथा रामायण और हिंदू धर्मग्रंथों में एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण अध्याय है। भगवान राम ने जिस स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की थी, उसे आज हम रामेश्वरम  के नाम से जानते हैं

Bhagvan Ram:
Bhagvan Ram : त्रेतायुग में भगवान श्री राम द्वारा शिवलिंग की स्थापना की कथा रामायण और हिंदू धर्मग्रंथों में एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण अध्याय है। भगवान राम ने जिस स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की थी, उसे आज हम रामेश्वरम  के नाम से जानते हैं। यह स्थान वर्तमान भारत के तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरम जिले में एक द्वीप पर स्थित है।धार्मिक दृष्टिकोण से यह स्थान इतना पवित्र है कि इसे हिंदुओं के पवित्र चार धामों (बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम) में से एक माना जाता है। आइए इस पावन घटना के पीछे की कथा, उसके महत्व और उससे जुड़े इतिहास को विस्तार से समझते हैं।

शिवलिंग स्थापना की पौराणिक कथा

यह घटना रावण वध के ठीक बाद की है। लंकापति रावण का वध करके और माता सीता को मुक्त कराकर जब भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान जी और वानर सेना के साथ वापस लौट रहे थे, तब उन्होंने भारत के दक्षिणी तट पर पड़ाव डाला।रामचरितमानस और अन्य पुराणों के अनुसार, यद्यपि रावण एक अत्याचारी और क्रूर राक्षस राजा था, लेकिन वह जन्म से एक ब्राह्मण भी था। वह महर्षि पुलस्त्य का पौत्र और ऋषि विश्रवा का पुत्र था। शास्त्रों के अनुसार, किसी ब्राह्मण का वध करने पर 'ब्रह्महत्या' का पाप लगता है।भगवान राम साक्षात विष्णु के अवतार थे, परंतु मानव रूप में लीला कर रहे थे। इसलिए वे स्थापित धार्मिक नियमों और मर्यादाओं का पालन करना चाहते थे। ऋषियों और मुनियों ने श्री राम को सलाह दी कि ब्रह्महत्या के इस दोष से मुक्ति पाने और आत्म-शुद्धि के लिए उन्हें महादेव शिव की आराधना करनी चाहिए और एक भव्य शिवलिंग की स्थापना कर उनका अभिषेक करना चाहिए।

दो शिवलिंगों की अद्भुत कथा

रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना को लेकर एक बेहद रोचक और भावुक कथा है, जो भगवान राम और उनके अनन्य भक्त हनुमान जी के बीच के संबंध को दर्शाती है।शिवलिंग की स्थापना के लिए एक शुभ मुहूर्त निश्चित किया गया। भगवान राम ने हनुमान जी को आज्ञा दी कि वे कैलाश पर्वत पर जाएं और महादेव से साक्षात आशीर्वाद लेकर एक उत्तम और पवित्र शिवलिंग ले आएं। हनुमान जी पवनवेग से कैलाश उड़ गए। परंतु, वहां पहुंचकर उन्हें महादेव के दर्शन तुरंत नहीं हुए। उन्होंने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय बीत गया और इधर पृथ्वी पर स्थापना का शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था।

जब मुहूर्त का समय बिल्कुल निकट आ गया और हनुमान जी वापस नहीं लौटे, तो माता सीता और सुग्रीव सहित सभी असमंजस में पड़ गए। मुहूर्त बीत जाने पर पूजा का फल नहीं मिलता। ऐसे में माता सीता ने अपनी दिव्य शक्ति और सूझबूझ से समुद्र तट की रेत  से एक सुंदर शिवलिंग का निर्माण किया। ठीक शुभ मुहूर्त पर भगवान राम ने इसी बालू के शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की और उसकी पूजा-अर्चना की। इस शिवलिंग को रामलिंग कहा गया।

हनुमान जी का आगमन

कुछ ही देर बाद हनुमान जी कैलाश से शिवलिंग लेकर रामेश्वरम पहुंचे। वहां पहले से ही शिवलिंग स्थापित देखकर हनुमान जी अत्यंत निराश और दुखी हो गए। उन्हें लगा कि उनकी सेवा में कोई कमी रह गई या प्रभु ने उन पर भरोसा नहीं किया।

अंतरयामी श्री राम ने अपने प्रिय भक्त के मन की व्यथा को तुरंत भांप लिया। हनुमान जी को सांत्वना देने के लिए श्री राम ने एक लीला रची। उन्होंने हनुमान जी से कहा, "हे अंजनीसुत! तुम दुखी मत हो। यदि तुम चाहते हो, तो इस बालू के शिवलिंग को हटाकर इसके स्थान पर अपने लाए हुए शिवलिंग को स्थापित कर दो।"

हनुमान जी को अपनी शक्ति पर गर्व था। उन्होंने सोचा कि वे अपनी पूंछ से लपेटकर इस छोटे से बालू के शिवलिंग को आसानी से उखाड़ देंगे। परंतु जैसे ही उन्होंने प्रयास किया, वह शिवलिंग टस से मस नहीं हुआ। हनुमान जी ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन शिवलिंग अपने स्थान पर अडिग रहा। अंत में, अत्यधिक बल लगाने के कारण हनुमान जी मूर्छित होकर गिर पड़े।

जब उन्हें होश आया, तो उन्हें अपनी भूल और प्रभु की महिमा का अहसास हुआ। उनका अहंकार चूर-चूर हो चुका था। तब भगवान राम ने हनुमान जी को गले लगाया और उनके द्वारा लाए गए शिवलिंग को भी ठीक 'रामलिंग' के पास ही स्थापित कर दिया। इस शिवलिंग को विश्वलिंग' कहा जाता है।

 श्री राम का वरदान

 हनुमान जी का मान रखने के लिए भगवान राम ने एक नया नियम बनाया। उन्होंने वरदान दिया कि जो भी भक्त रामेश्वरम आएगा, वह सबसे पहले हनुमान जी द्वारा लाए गए 'विश्वलिंग' की पूजा करेगा, और उसके बाद ही माता सीता द्वारा बनाए गए 'रामलिंग' की पूजा की जाएगी। आज भी रामेश्वरम मंदिर में इसी परंपरा का पालन किया जाता है।

रामेश्वरम का नामकरण और दर्शन

'रामेश्वरम' शब्द का संधि विच्छेद करने पर दो अर्थ निकलते हैं, जो हरि  और हर के बीच के अनन्य प्रेम को दर्शाते हैं:

1. रामस्य ईश्वरः (जो राम के ईश्वर हैं):अर्थात भगवान शिव।
2. रामः ईश्वरः यस्य सः (राम जिसके ईश्वर हैं):अर्थात भगवान राम, जिन्हें शिव अपना ईश्वर मानते हैं।

स्वयं भगवान राम ने रामचरितमानस में कहा है

 *"जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोकहि जइहहिं॥"
अर्थात, जो भी मनुष्य रामेश्वरम आकर इस शिवलिंग के दर्शन करेगा, वह जीवन के अंत में मेरे परमधाम को प्राप्त होगा।

आज इस स्थान पर एक विशाल और भव्य मंदिर खड़ा है, जिसे 'रामनाथस्वामी मंदिर' कहा जाता है। यह मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला, दुनिया के सबसे लंबे गलियारों  और मंदिर परिसर के भीतर स्थित 22 पवित्र कुओं (तीर्थम) के लिए प्रसिद्ध है। इन कुओं के पानी से स्नान करना अत्यंत पावन माना जाता है।

यह भी पढ़ें:- 
Ramayan Ki Kahani: रामायण की रचना क्यों हुई? जानें रामायण की मुख्य घटनाएं, कथा और धार्मिक महत्व 
Ramayana: कौन थे ऋषि जाबालि? रामायण में क्या थी उनकी भूमिका, पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
Hanuman Ji Story: कलियुग में कहां रहते हैं हनुमान जी? पौराणिक कथा से जानें इसका रहस्य 
 
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel