Vat Savitri Poornima : वट सावित्री पूर्णिमा सनातन धर्म में विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहार है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह व्रत ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को रखा जाता है।
Vat Savitri Poornima : वट सावित्री पूर्णिमा सनातन धर्म में विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहार है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह व्रत ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को रखा जाता है। मुख्य रूप से यह व्रत उत्तर भारत के कई हिस्सों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश) में अमावस्या को 'वट सावित्री व्रत' के रूप में मनाया जाता है, वहीं महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा को 'वट सावित्री पूर्णिमा' के रूप में बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है।यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह वैवाहिक जीवन में प्रेम, समर्पण, दृढ़ इच्छाशक्ति और पति की दीर्घायु के लिए की जाने वाली कामना का प्रतीक है। आइए विस्तार से जानते हैं कि वट सावित्री पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है और इसका धार्मिक, सामाजिक व वैज्ञानिक महत्व क्या है।
वट सावित्री पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है वट सावित्री पूर्णिमा मनाने के पीछे सबसे प्रमुख और लोकप्रिय कारण महासती सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा है। महाभारत और अन्य पुराणों में वर्णित यह कथा भारतीय संस्कृति में पतिव्रता धर्म और संकल्प की शक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण है।
सावित्री और सत्यवान का विवाह मद्र देश के राजा अश्वपति की कन्या सावित्री अत्यंत गुणवान और तेजस्वी थीं। उन्होंने अपने वर के रूप में द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को चुना। सत्यवान के पिता का राज्य छिन चुका था और वे जंगल में अंधे माता-पिता के साथ कुटिया में रहते थे। विवाह से पहले देवर्षि नारद ने सावित्री को सचेत किया कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। इसके बावजूद, सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं और उन्होंने सत्यवान से विवाह कर लिया।
यमराज और सावित्री का संवाद
जब सत्यवान की मृत्यु का दिन आया, तो वह जंगल में लकड़ी काटने गए और अचानक अस्वस्थ होकर गिर पड़े। सावित्री उन्हें अपनी गोद में लेकर एक विशाल वट वृक्ष के नीचे बैठ गईं। कुछ ही समय में साक्षात मृत्यु के देवता यमराज सत्यवान के प्राण लेने पहुंचे। यमराज जैसे ही सत्यवान के सूक्ष्म शरीर को लेकर दक्षिण दिशा की ओर बढ़े, सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं।यमराज ने उन्हें रोकने का बहुत प्रयास किया और कहा कि मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है, इसलिए वह वापस लौट जाएं। लेकिन सावित्री ने अपनी बुद्धिमत्ता, मधुर वाणी और पतिव्रता धर्म की शक्ति से यमराज को प्रभावित किया।
सत्यवान का पुनर्जन्म
सावित्री के साहस और ज्ञान से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को छोड़कर कोई भी तीन वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने चतुराई से वरदान मांगे:
पहला वरदान: उनके ससुर (द्युमत्सेन) की आंखों की रोशनी वापस आ जाए।
दूसरा वरदान: उनके ससुर का खोया हुआ राज्य और वैभव वापस मिल जाए।
तीसरा वरदान:सावित्री को सौ पुत्रों की माता बनने का सौभाग्य प्राप्त हो।
यमराज ने बिना सोचे-समझे 'तथास्तु' कह दिया। वरदान देने के बाद जब यमराज आगे बढ़े, तो सावित्री ने उन्हें विनम्रतापूर्वक याद दिलाया कि एक पतिव्रता स्त्री होने के नाते, वे अपने पति सत्यवान के बिना सौ पुत्रों की माता कैसे बन सकती हैं? यमराज को अपनी भूल का अहसास हुआ और वे सावित्री की बुद्धिमत्ता और निष्ठा के आगे नतमस्तक हो गए। विवश होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिए। सावित्री वापस उसी वट वृक्ष के पास आईं, जहां सत्यवान का शव रखा था। वट वृक्ष की अनुकंपा और सावित्री के तपोबल से सत्यवान फिर से जीवित हो उठे। तभी से, अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए महिलाएं ज्येष्ठ पूर्णिमा (और अमावस्या) के दिन वट वृक्ष की पूजा करती हैं और व्रत रखती हैं।
वट वृक्ष का पूजन क्यों होता है ? हिंदू शास्त्रों के अनुसार, वट वृक्ष में साक्षात त्रिमूर्ति का वास माना जाता है। इसकी जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं व पत्तों में भगवान शिव का निवास होता है। इसके अलावा, पुनर्जीवित हुए सत्यवान के शरीर को इसी वृक्ष ने छाया और सुरक्षा प्रदान की थी। वट वृक्ष की आयु सैकड़ों वर्ष होती है। इसकी शाखाओं से निकलने वाली जटाएं जमीन में जाकर नए तने का रूप ले लेती हैं, जिससे यह पेड़ कभी नष्ट नहीं होता। इसीलिए इसे 'अक्षय वट' भी कहा जाता है। महिलाएं इस वृक्ष की पूजा कर यह प्रार्थना करती हैं कि उनका सुहाग भी इस वृक्ष की तरह ही दीर्घायु और स्थिर रहे। पूजा के दौरान महिलाएं वट वृक्ष के चारों ओर सूत का कच्चा धागा लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं। यह धागा वैवाहिक रिश्ते की मजबूती और पति-पत्नी के बीच कभी न टूटने वाले बंधन को दर्शाता है।