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Ambubachi Mela: क्या होता है अंबुबाची मेला? जानें मां कामाख्या से जुड़े इस पर्व का रहस्य और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Ambubachi Mela: मां कामाख्या मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहां देवी की कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। गर्भगृह में प्राकृतिक रूप से बनी एक शिला है, जिसे देवी का स्वरूप माना जाता है। 

Ambubachi Mela
Ambubachi Mela: असम के नीलांचल पर्वत पर स्थित मां कामाख्या शक्तिपीठ भारत के सबसे प्रसिद्ध और रहस्यमयी शक्ति तीर्थों में से एक माना जाता है। हर वर्ष यहां आयोजित होने वाला अंबुबाची मेला देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं, साधु-संतों और तांत्रिक साधकों को आकर्षित करता है। यह पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि देवी शक्ति की सृजनात्मक शक्ति और प्रकृति के विशेष चक्र से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है।

अंबुबाची मेले की सबसे विशेष बात यह है कि इस दौरान मां कामाख्या को रजस्वला माना जाता है। मान्यता है कि वर्ष में एक बार देवी स्वयं ऋतुमती होती हैं और इसी अवधि में मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। तीन दिनों तक कोई पूजा-अर्चना नहीं होती और चौथे दिन विशेष अनुष्ठानों के बाद मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए पुनः खोल दिए जाते हैं। यही कारण है कि अंबुबाची मेला देश के अन्य धार्मिक मेलों से अलग और विशिष्ट माना जाता है। अंबुबाची मेले का संबंध मां कामाख्या और शक्ति उपासना की प्राचीन परंपरा से जुड़ा हुआ है। इस पर्व के पीछे कई पौराणिक मान्यताएं और कथाएं प्रचलित हैं, जो इसे और भी अधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं।

अंबुबाची शब्द का अर्थ

‘अंबुबाची’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना माना जाता है। ‘अंबु’ का अर्थ जल और ‘बाची’ का अर्थ उत्पत्ति या प्रस्फुटन से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह वह समय होता है जब धरती माता और देवी शक्ति दोनों ही सृजन की अवस्था में मानी जाती हैं। इसी कारण इस पर्व को उर्वरता, सृजन और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

 

Kamakhya Mandir Ambubachi Mela

मां कामाख्या शक्तिपीठ का पौराणिक महत्व

अंबुबाची मेले को समझने के लिए सबसे पहले मां कामाख्या शक्तिपीठ की महिमा को जानना आवश्यक है। पुराणों के अनुसार जब राजा दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया, तब उन्होंने अपने दामाद भगवान शिव को उसमें आमंत्रित नहीं किया। इस अपमान से दुखी माता सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंचीं और वहां भगवान शिव का अपमान होते देख उन्होंने यज्ञ अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।

माता सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव अत्यंत क्रोधित और शोकाकुल हो गए। उन्होंने माता सती के शरीर को अपने कंधों पर उठाया और तांडव करने लगे। भगवान शिव के इस विकराल रूप से समस्त सृष्टि संकट में पड़ गई। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अनेक टुकड़े कर दिए।

मान्यता है कि जहां-जहां माता सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। नीलांचल पर्वत पर माता सती का योनिभाग गिरा था। इसी स्थान पर मां कामाख्या शक्तिपीठ की स्थापना हुई। यही कारण है कि यह शक्तिपीठ स्त्री शक्ति, सृजन और मातृत्व का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है।

मंदिर में नहीं है देवी की प्रतिमा

मां कामाख्या मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहां देवी की कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। गर्भगृह में प्राकृतिक रूप से बनी एक शिला है, जिसे देवी का स्वरूप माना जाता है। यह शिला सदैव जल से ढकी हुई रहती है। श्रद्धालु इसी प्राकृतिक शक्ति स्वरूप की पूजा करते हैं। माना जाता है कि यही स्थान माता सती के योनिभाग का प्रतीक है और इसी कारण कामाख्या शक्तिपीठ को तांत्रिक साधना का सबसे बड़ा केंद्र भी माना जाता है।

 

Kamakhya Mandir Ambubachi Mela

क्यों मनाया जाता है अंबुबाची मेला

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार वर्ष में एक बार आषाढ़ मास के दौरान मां कामाख्या रजस्वला होती हैं। यह अवधि सामान्यतः तीन दिनों की मानी जाती है। इन तीन दिनों में मंदिर के कपाट पूरी तरह बंद रहते हैं और किसी भी श्रद्धालु को दर्शन की अनुमति नहीं होती। मान्यता है कि इस दौरान देवी विश्राम करती हैं। मंदिर में नियमित पूजा-पाठ, भोग और अन्य धार्मिक गतिविधियां भी रोक दी जाती हैं। चौथे दिन विशेष शुद्धिकरण और वैदिक-तांत्रिक अनुष्ठानों के बाद मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। इसी अवसर पर विशाल अंबुबाची मेले का आयोजन होता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

अंबुबाची मेले से जुड़ा रहस्य

अंबुबाची मेले से जुड़ा सबसे बड़ा रहस्य मंदिर के गर्भगृह में स्थित उस प्राकृतिक शिला से जुड़ा है जिसे देवी का स्वरूप माना जाता है। लोकमान्यताओं के अनुसार जब मां कामाख्या रजस्वला होती हैं, तब गर्भगृह के भीतर बहने वाला जल हल्का लाल रंग धारण कर लेता है। इसी अवधि में देवी को विशेष रूप से एक लाल वस्त्र अर्पित किया जाता है।

तीन दिनों तक यह वस्त्र गर्भगृह में रखा जाता है। जब मंदिर के कपाट पुनः खोले जाते हैं तो यही वस्त्र श्रद्धालुओं को प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है। इसे ‘रक्त वस्त्र’ या ‘अंगवस्त्र’ कहा जाता है और श्रद्धालु इसे अत्यंत पवित्र मानते हैं।

अंबुबाची मेले में साधु-संतों का जमावड़ा

अंबुबाची मेले की एक अन्य विशेषता देशभर से आने वाले साधु-संतों और तांत्रिक साधकों का विशाल समागम है। मान्यता है कि इस अवधि में साधना और तांत्रिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व होता है। नागा साधु, अघोरी, तांत्रिक और विभिन्न संप्रदायों के संत इस अवसर पर मां कामाख्या की आराधना के लिए पहुंचते हैं। मेले के दौरान अनेक गुप्त साधनाएं और विशेष अनुष्ठान भी किए जाते हैं, जिनका उल्लेख तांत्रिक परंपराओं में मिलता है।

तांत्रिक साधना का प्रमुख केंद्र

मां कामाख्या मंदिर को प्राचीन काल से ही तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। अनेक तांत्रिक ग्रंथों में इस शक्तिपीठ का विशेष वर्णन मिलता है। मान्यता है कि यहां देवी शक्ति का निवास होने के कारण साधकों को विशेष सिद्धियों की प्राप्ति होती है। अंबुबाची मेले के दौरान साधना का महत्व और भी बढ़ जाता है, इसलिए देशभर के तांत्रिक इस समय यहां पहुंचकर देवी की उपासना करते हैं।

अंबुबाची मेले के दौरान होने वाले धार्मिक अनुष्ठान

मंदिर के कपाट बंद होने से पहले विशेष पूजा की जाती है। इसके बाद तीन दिनों तक देवी को विश्राम की अवस्था में माना जाता है। चौथे दिन मंदिर का शुद्धिकरण किया जाता है। वैदिक मंत्रोच्चार, तांत्रिक अनुष्ठान और विशेष पूजा संपन्न होने के बाद देवी के दर्शन प्रारंभ होते हैं। इस दिन को अत्यंत शुभ माना जाता है और हजारों श्रद्धालु घंटों प्रतीक्षा कर मां के दर्शन प्राप्त करते हैं।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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