What is 84 Lakh Yoni: सनातन शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, यह संसार चेतना के विकास की एक विशाल प्रयोगशाला है, जहाँ आत्मा अलग-अलग शरीरों से गुजरते हुए आगे बढ़ती है।
84 Lakh Yoni Mystery: सनातन शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, यह संसार चेतना के विकास की एक विशाल प्रयोगशाला है, जहाँ आत्मा अलग-अलग शरीरों से गुजरते हुए आगे बढ़ती है। इस यात्रा को समझने के लिए ऋषियों-मुनियों ने जीवों को उनकी उत्पत्ति, निवास और शारीरिक बनावट के आधार पर बहुत ही वैज्ञानिक ढंग से वर्गीकृत किया है।
जीव इस संसार में किस प्रकार प्रकट होते हैं, इसके आधार पर इन्हें मुख्य रूप से दो और फिर चार दिव्य श्रेणियों में बांटा गया है:
विकास की दो मुख्य धाराएं
योनिज प्राणी: वे जीव जो दो अलग-अलग जीवों (नर और मादा) के संयोग से जन्म लेते हैं।
आयोनिज प्राणी: वे सूक्ष्म जीव जो बिना किसी संयोग के, स्वयं ही (जैसे अमीबा) विभाजित या विकसित होकर प्रकट होते हैं।
जन्म के चार मूल स्रोत (चतुर्विध जीव)
जरायुज (गर्भज): वे जीव जो माता के गर्भ से एक झिल्ली (प्लेसेंटा) में लिपटे हुए जन्म लेते हैं, जैसे मनुष्य और अधिकांश चौपाये पशु।
अंडज: वे प्राणी जो अंडे के माध्यम से संसार में आते हैं, जैसे पक्षी, छिपकली और मछलियां।
स्वेदज: मल-मूत्र, पसीने, नमी या गंदगी से स्वतः उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीव, कीट-पतंगे।
उद्भिज: पृथ्वी का सीना फाड़कर बाहर निकलने वाले जीव, यानी समस्त वनस्पति जगत (पेड़-पौधे, लताएं)।
2. निवास स्थान के आधार पर विभाजन
प्रकृति ने जीवों को रहने के लिए तीन अलग-अलग लोक या माध्यम दिए हैं:
जलचर: सागर, नदियों और जलाशयों के भीतर सांस लेने वाले जीव।
थलचर: धरती की सतह पर रेंगने, दौड़ने या चलने वाले प्राणी।
नभचर: आकाश की ऊंचाइयों में विहार करने वाले पंखधारी जीव।
3. पद्म पुराण का दिव्य गणित: 84 लाख का सटीक आंकड़ा
पद्म पुराण के एक प्रसिद्ध श्लोक के अनुसार, इस संसार में चेतना के कुल 84 लाख पड़ाव हैं। यदि हम इन्हें अलग-अलग कुलों में बांटकर देखें, तो यह संख्या इस प्रकार सामने आती है:
स्थावर (पेड़-पौधे और वनस्पति): 20 लाख प्रकार
स्थलीय पशु (थलचर): 30 लाख प्रकार
कीड़े-मकौड़े और सरीसृप (कृमि): 11 लाख प्रकार
आकाश के पक्षी (नभचर): 10 लाख प्रकार
पानी के जीव-जंतु (जलचर): 9 लाख प्रकार
मानव, देवता, दैत्य और दानव: 4 लाख प्रकार
इन सभी को मिलाने पर सृष्टि की कुल 84 लाख योनियों का चक्र पूरा होता है।
4. प्राचीन भारतीय विज्ञान: शारीरिक बनावट के आधार पर भेद
'प्राचीन भारत में विज्ञान और शिल्प' ग्रंथ में जीवों के पैरों और पंजों की बनावट (Anatomy) के आधार पर बहुत ही सुंदर वर्गीकरण मिलता है:
एक शफ (एक खुर वाले): वे पशु जिनके पैर में केवल एक ही खुर होता है, जैसे घोड़ा, गधा, खच्चर, जंगली भैंसा और हिरण।
द्विशफ (दो खुर वाले): वे पशु जिनके खुर बीच से दो भागों में बंटे होते हैं, जैसे गाय, भैंस, बकरी और कृष्णमृग।
पंच अंगुल (पंजों वाले): पांच उंगलियों और नाखूनों (पंजों) वाले शिकारी या अन्य पशु, जैसे सिंह, बाघ, हाथी, भालू, कुत्ता और सियार।
5. आत्मा का विकासक्रम और कर्मों की गति
मनुष्य का जन्म कोई संयोग नहीं, बल्कि एक लंबी आत्मिक यात्रा का परिणाम है। एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, आत्मा नीचे से ऊपर की ओर इस क्रम में यात्रा करती है:
प्रथम चरण: आत्मा अपने सफर की शुरुआत में सबसे पहले 30 लाख बार वृक्ष और वनस्पतियों के रूप में जन्म लेती है।
द्वितीय चरण: चेतना थोड़ी जागृत होती है और वह 9 लाख बार जलचरों के रूप में जीवन जीती है।
तृतीय चरण: इसके बाद 10 लाख बार कीड़े-मकौड़ों (कृमि) की योनि मिलती है।
चतुर्थ चरण: विकास की अगली कड़ी में 11 लाख बार पक्षी योनि में जन्म होता है।
पंचम चरण: फिर 20 लाख बार पशु योनि का सफर तय करना पड़ता है।
अंतिम पढ़ाव: पशु योनि के अंत में, अपने कर्मों के शुद्धिकरण के बाद आत्मा 'गौ' (गाय) का शरीर प्राप्त करती है। इसके बाद ही उसे अनमोल 'मानव देह' मिलती है।
मनुष्य रूप में आने के बाद भी आत्मा को 4 लाख बार मानव की ही अलग-अलग नस्लों/भैदों में जन्म लेना पड़ता है, जिसके बाद वह देव या पितृ योनि की ओर बढ़ती है।
6. पतन का विज्ञान: दुर्गति और जेनेटिक्स का नियम
कठोपनिषद में यमराज नचिकेता को समझाते हैं कि यह यात्रा हमेशा ऊपर की ओर ही नहीं जाती, इसमें 'रिवर्स गियर' (उल्टा क्रम) भी लग सकता है।
कर्मों का तराजू: मृत्यु के बाद जीवात्मा अपने साथ शुभ और अशुभ कर्मों के संस्कार लेकर निकलती है। यदि पुण्य और पाप बराबर हैं, तो पुनः मनुष्य का चोला मिलता है। यदि पुण्य कम और पाप भारी हैं, तो आत्मा नीचे गिरकर पशु-पक्षी बनती है। और यदि पाप की सीमा अत्यधिक पार हो जाए, तो आत्मा 'स्थावर' यानी पेड़, पौधे या तिनके जैसे जड़ शरीरों में कैद हो जाती है। इसे ही शास्त्रों में 'दुर्गति' कहा गया है।
इच्छा और जेनेटिक्स (जींस का आकर्षण): मृत्यु के अंतिम क्षण में मनुष्य की जो इच्छाएं या मानसिक भाव होते हैं, वे उसके सूक्ष्म शरीर में एक विशेष ऊर्जा (Vibrations) पैदा करते हैं। यह ऊर्जा प्रकृति के उन जीवों के जीन्स (Genes) की तरफ आकर्षित होती है जो उसकी अंतिम इच्छा से मेल खाते हैं। आत्मा उसी गर्भ या योनि की ओर खींच चली जाती है। यदि इस चक्र में चूक हो जाए, तो फिर से 84 लाख योनियों के लंबे सफर पर निकलना पड़ता है।
संदर्भ:
1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तुलना: आधुनिक जीव विज्ञान (Modern Biology) के अनुसार पृथ्वी पर लगभग 8.7 मिलियन (यानी 87 लाख) जीव प्रजातियां मौजूद हैं (कैटलॉग ऑफ लाइफ/कैलीफोर्निया एकेडमी ऑफ साइंसेज की रिपोर्ट)। प्राचीन भारतीय गणना (84 लाख) इसके बेहद करीब है, जो उस समय के ऋषियों के सूक्ष्म निरीक्षण को दर्शाती है।
2. 'मनुस्मृति' (अध्याय 1) और 'वेदांत सूत्र' के भाष्यों में जीवों के प्रकट होने के इन तरीकों का वर्णन मिलता है, जहाँ बिना मैथुन के उत्पन्न होने वाले जीवों को 'आयोनिज' कहा गया है।
3. छान्दोग्य उपनिषद (6.3.1): इसमें मुख्य रूप से अंडज, जीवज (जरायुज) और उद्भिज का वर्णन है।
4. ऐतरेय उपनिषद (3.1.3): इसमें स्पष्ट रूप से चारों का उल्लेख मिलता है- "अण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि च..."
5. मनुस्मृति (अध्याय 1, श्लोक 43-46): यहाँ भी इन चारों श्रेणियों की विस्तार से व्याख्या की गई है।
6. 'चरक संहिता' (सूत्रस्थान) और 'सुश्रुत संहिता' के 'अन्नपानविधि' अध्याय में और प्राचीन भारत में विज्ञान और शिल्प- पेज 107-110 (लेखक:
7. महामहोपाध्याय डॉ. रघुवीर या समकालीन विद्वान) पर शारीरिक बनावट के आधार पर भेद बताए गए हैं।
8. गरुड़ पुराण' (प्रेत कल्प) और 'श्रीमद्भागवत महापुराण' के तृतीय स्कंध (कपिल देव जी का उपदेश) में मिलता है, जहाँ जीव के गर्भाधान और अलग-अलग योनियों में भटकने का विवरण है। 'गौ' (गाय) को वैतरणी पार कराने वाली और सात्विकता का प्रतीक माना गया है, इसलिए उसे मनुष्य जन्म से ठीक पहले का पड़ाव माना जाता है।
9. कठोपनिषद (अध्याय 2, वल्ली 2, मंत्र 7) के अनुसार, मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार पुनः पशु-पक्षी या जड़ (वृक्ष आदि) योनि में जा सकता है। "योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥" अर्थ: अपने-अपने कर्मों और ज्ञान (सुने हुए भावों) के अनुसार कई जीवात्माएं तो नया शरीर धारण करने के लिए (मनुष्य या पशु आदि की) योनि में प्रवेश करती हैं और कई अत्यधिक पापी जीव 'स्थाणु' (स्थावर यानी वृक्ष, ठूंठ या पत्थर जैसी जड़ अवस्था) को प्राप्त होते हैं।
10. जींस' (Genes) शब्द आधुनिक विज्ञान का है, जबकि प्राचीन शास्त्र 'संस्कार', 'वासना' या 'सूक्ष्म शरीर' की बात करते हैं। भगवद्गीता (अध्याय 8, श्लोक 6) में भगवान कृष्ण कहते हैं... "यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥" भावार्थ : हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है॥6॥