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Masik Durga Ashtami: ज्येष्ठ मासिक दुर्गाष्टमी व्रत का कैसे करें पारण? जानें संपूर्ण विधि और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Jyeshtha Masik Durga Ashtami: ज्येष्ठ मास में आने वाली दुर्गाष्टमी तिथि देवी शक्ति की आराधना के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन मां दुर्गा के समक्ष श्रद्धा और भक्ति से पूजा करने पर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है। 

Jyeshtha Masik Durga Ashtami Parana: 
Jyeshtha Masik Durga Ashtami Parana: सनातन धर्म में मासिक दुर्गाष्टमी का विशेष महत्व माना गया है। प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मां दुर्गा की उपासना के लिए समर्पित दुर्गाष्टमी मनाई जाती है। ज्येष्ठ मास की मासिक दुर्गाष्टमी भी भक्तों के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। इस दिन श्रद्धालु मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं, व्रत रखते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करने की कामना करते हैं।

दुर्गाष्टमी व्रत का पालन करने वाले भक्तों के लिए पारण का भी विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत का समापन विधिपूर्वक पारण करके ही किया जाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि नियमों के अनुसार पारण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और मां दुर्गा की कृपा बनी रहती है।

ज्येष्ठ मासिक दुर्गाष्टमी का धार्मिक महत्व

ज्येष्ठ मास में आने वाली दुर्गाष्टमी तिथि देवी शक्ति की आराधना के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन मां दुर्गा के समक्ष श्रद्धा और भक्ति से पूजा करने पर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार दुर्गाष्टमी के दिन देवी की उपासना करने से नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम होता है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।

कई श्रद्धालु इस दिन निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं और पूरे दिन देवी मंत्रों का जाप तथा दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। अष्टमी तिथि पर देवी को लाल पुष्प, चुनरी, सिंदूर और श्रृंगार सामग्री अर्पित करने का भी विशेष महत्व बताया गया है।

दुर्गाष्टमी व्रत में पारण का क्या महत्व है?

व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि उसका समापन भी धार्मिक नियमों के अनुसार होना चाहिए। व्रत के अंत में पारण किया जाता है, जो उपवास की पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बिना पारण के व्रत अधूरा माना जाता है। इसलिए अष्टमी व्रत रखने वाले श्रद्धालु नवमी तिथि में या निर्धारित पारण काल में विधिपूर्वक व्रत का समापन करते हैं। पारण के दौरान देवी का स्मरण करते हुए उन्हें धन्यवाद अर्पित किया जाता है और फिर भोजन ग्रहण किया जाता है।

ज्येष्ठ मासिक दुर्गाष्टमी व्रत का पारण कब करें?

दुर्गाष्टमी व्रत का पारण सामान्यतः अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद और नवमी तिथि के प्रारंभ होने पर किया जाता है। पारण का समय स्थानीय पंचांग और तिथि की स्थिति के अनुसार निर्धारित किया जाता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को पारण से पहले अपने क्षेत्र के प्रामाणिक पंचांग या ज्योतिषीय गणना के अनुसार शुभ समय की जानकारी अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए। पारण सदैव तिथि और धार्मिक नियमों का ध्यान रखते हुए किया जाना चाहिए।

र्गाष्टमी व्रत पारण की संपूर्ण विधि

पारण वाले दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के बाद स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूजा स्थल की सफाई करें और मां दुर्गा का स्मरण करें। पारण से पहले देवी को पुष्प, अक्षत, रोली, सिंदूर और नैवेद्य अर्पित करें। यदि व्रत के दौरान अखंड दीप जलाया गया हो तो देवी की आरती कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।

मां दुर्गा के समक्ष बैठकर दुर्गा मंत्रों का जाप करें। इसके बाद व्रत में हुई किसी त्रुटि के लिए क्षमा याचना करें और देवी से परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। पारण से पूर्व देवी को खीर, हलवा, फल, मिश्री या अपनी श्रद्धा के अनुसार सात्विक भोग अर्पित करें। भोग लगाने के बाद कुछ समय तक ध्यान और प्रार्थना करें।

कई स्थानों पर दुर्गाष्टमी या नवमी के अवसर पर कन्या पूजन की परंपरा भी निभाई जाती है। श्रद्धालु छोटी कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनका पूजन करते हैं और उन्हें भोजन तथा दक्षिणा अर्पित करते हैं। पूजा पूर्ण होने के बाद सबसे पहले जल ग्रहण करें। इसके पश्चात फल या सात्विक भोजन लेकर व्रत का पारण करें। पारण के समय तामसिक भोजन से बचने की परंपरा बताई गई है।

पारण के समय किन बातों का रखें ध्यान?

व्रत समाप्त करने के बाद केवल सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए। भोजन में फल, दूध, खीर, साबूदाना, कुट्टू या सामान्य सात्विक व्यंजन शामिल किए जा सकते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पारण के दिन मन, वचन और कर्म की शुद्धता बनाए रखनी चाहिए। इस दिन क्रोध, कटु वचन और विवाद से दूर रहने का प्रयास किया जाता है।
पारण के दौरान और उसके बाद भी मां दुर्गा का स्मरण तथा उनके मंत्रों का जाप शुभ माना जाता है। इससे व्रत की आध्यात्मिक भावना बनी रहती है।

दुर्गाष्टमी पर मां दुर्गा को क्या अर्पित करें?

ज्येष्ठ मासिक दुर्गाष्टमी पर मां दुर्गा को लाल रंग के पुष्प, लाल चुनरी, सिंदूर, नारियल, लौंग, इलायची, फल और मिठाई अर्पित की जा सकती है। देवी को सुहाग की सामग्री चढ़ाने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है। श्रद्धा और भक्ति के साथ अर्पित की गई पूजा सामग्री को देवी स्वीकार करती हैं, ऐसी धार्मिक मान्यता है।

दुर्गाष्टमी व्रत से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मासिक दुर्गाष्टमी का व्रत करने से देवी शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। भक्त इस दिन विशेष पूजा, उपवास और जप-पाठ के माध्यम से मां दुर्गा को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। व्रत के अंत में विधिपूर्वक पारण करने से पूजा और उपवास की प्रक्रिया पूर्ण मानी जाती है, इसलिए ज्येष्ठ मासिक दुर्गाष्टमी का व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए पारण की सही विधि का पालन करना विशेष महत्वपूर्ण माना गया है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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