Meditation Tips: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मन को शांत रखना आसान नहीं है। काम का तनाव, लगातार सोचते रहना और मोबाइल की व्यस्तता के बीच कई लोग कुछ समय अपने मन को शांत करने के लिए ध्यान यानी मेडिटेशन का सहारा लेते हैं, लेकिन ध्यान शुरू करने से पहले अक्सर एक सवाल मन में आता है कि क्या ध्यान सीखने के लिए गुरु का होना जरूरी है? क्या कोई व्यक्ति खुद से ध्यान की शुरुआत कर सकता है? वहीं, अगर बिना गुरु के ध्यान किया जाए तो किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? क्या आपने कभी सोचा है कि ध्यान की शुरुआत आखिर किस तरह करनी चाहिए? आइए जानते हैं बिना गुरु के ध्यान साधना करने का सही तरीका और इससे जुड़ी जरूरी सावधानियां...
क्या बिना गुरु के ध्यान सीखा जा सकता है?
ध्यान की शुरुआती साधना बिना गुरु के भी की जा सकती है। सामान्य रूप से सांस पर ध्यान देना, कुछ समय शांत बैठना, अपने विचारों को देखना और मन को एक बिंदु पर टिकाने का अभ्यास व्यक्ति स्वयं कर सकता है। हालांकि, ध्यान की अलग-अलग विधियां होती हैं। कुछ साधनाएं सामान्य ध्यान से आगे बढ़कर विशेष योग, प्राणायाम, मंत्र साधना या आध्यात्मिक अभ्यास से जुड़ी होती हैं। ऐसी उन्नत साधनाओं में अनुभवी गुरु का मार्गदर्शन उपयोगी माना जाता है, इसलिए अगर कोई व्यक्ति पहली बार ध्यान शुरू कर रहा है तो उसे कठिन साधना या जटिल तकनीक अपनाने के बजाय सरल ध्यान से शुरुआत करनी चाहिए।
शुरुआत में सांस पर करें ध्यान
बिना गुरु ध्यान सीखने का सबसे आसान तरीका अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करना है। इसके लिए किसी शांत और साफ जगह पर आराम से बैठें। रीढ़ को सहज रूप से सीधा रखें और आंखें बंद कर लें। अब अपनी सांसों को सामान्य रूप से आने-जाने दें। सांस को जबरदस्ती लंबा या छोटा करने की कोशिश न करें। केवल इस बात पर ध्यान दें कि सांस अंदर जा रही है और फिर बाहर आ रही है। शुरुआत में मन बार-बार दूसरी बातों में चला जाएगा। ऐसा होना सामान्य है। जब भी ध्यान भटके, खुद को परेशान किए बिना दोबारा सांसों पर ध्यान ले आएं।
ध्यान का सही तरीका क्या है?
ध्यान करने के लिए सबसे पहले ऐसी जगह चुनें जहां कुछ समय तक आपको कोई परेशान न करे। सुबह का समय इसके लिए सुविधाजनक माना जाता है, लेकिन ऐसा कोई निश्चित नियम नहीं है कि केवल सुबह ही ध्यान किया जा सकता है। आरामदायक स्थिति में बैठकर आंखें बंद करें। शरीर को ढीला रखें और सांसों को सामान्य रहने दें। इसके बाद अपना ध्यान सांसों की गति पर लगाएं। शुरुआत में 5 से 10 मिनट तक ध्यान करना पर्याप्त हो सकता है। अभ्यास बढ़ने के साथ समय धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है। ध्यान के दौरान मन को जबरदस्ती विचारहीन बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
विचार आएं तो क्या करें?
ध्यान करते समय सबसे बड़ी परेशानी यही होती है कि मन शांत होने के बजाय और ज्यादा विचार करने लगता है। कभी काम की चिंता, कभी परिवार की बात और कभी पुरानी घटनाएं याद आने लगती हैं। ऐसी स्थिति में ध्यान छोड़ने की जरूरत नहीं है। ध्यान का मतलब यह नहीं है कि बैठते ही मन में कोई विचार नहीं आएगा। विचार आने पर उन्हें पकड़कर आगे बढ़ने के बजाय दोबारा अपना ध्यान सांसों पर ले आएं। धीरे-धीरे अभ्यास के साथ व्यक्ति अपने विचारों को बिना उनमें उलझे देखना सीख सकता है।
क्या मंत्र से ध्यान किया जा सकता है?
बिना गुरु के शुरुआती ध्यान में किसी सरल और श्रद्धा से जुड़े मंत्र का जाप भी किया जा सकता है। धार्मिक साधना करने वाले लोग अपनी आस्था के अनुसार मंत्र का मानसिक जाप करते हुए ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। मंत्र का जाप बहुत तेज आवाज में करने की आवश्यकता नहीं है। शुरुआत में धीमी आवाज में या मन ही मन जाप किया जा सकता है। इस दौरान ध्यान को मंत्र के उच्चारण और उसके अर्थ या भाव पर टिकाने का प्रयास किया जा सकता है। हालांकि, विशेष बीज मंत्र या ऐसी मंत्र साधनाएं जिनके लिए परंपरा में दीक्षा और विधि बताई गई हो, उन्हें बिना उचित मार्गदर्शन के शुरू करने से बचना चाहिए।
ध्यान के लिए गुरु कब जरूरी हो जाते हैं?
साधारण ध्यान के लिए हर व्यक्ति को गुरु की आवश्यकता हो, ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन जब साधना कठिन और गहरी होती जाती है तो सही मार्गदर्शन महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक ध्यान करना चाहता है, किसी विशेष आध्यात्मिक साधना को अपनाना चाहता है या प्राणायाम और अन्य योग तकनीकों को ध्यान के साथ जोड़ना चाहता है, तो किसी योग्य और अनुभवी शिक्षक या गुरु का मार्गदर्शन लेना बेहतर होता है। गुरु का महत्व केवल तकनीक बताने तक सीमित नहीं होता। अनुभवी मार्गदर्शक यह समझने में भी मदद कर सकता है कि साधना के दौरान आने वाली अलग-अलग परिस्थितियों में किस तरह आगे बढ़ना चाहिए।
ध्यान में किन गलतियों से बचें?
ध्यान शुरू करते समय कुछ सामान्य गलतियों से बचना जरूरी है। सबसे पहली गलती है शुरुआत में ही बहुत लंबे समय तक ध्यान करने की कोशिश करना। अगर शरीर और मन इसके अभ्यस्त नहीं हैं तो 5 से 10 मिनट से शुरुआत करना बेहतर है। दूसरी गलती है सांस को जबरदस्ती नियंत्रित करना। सामान्य ध्यान में सांस को स्वाभाविक रहने देना चाहिए।
तीसरी गलती है ध्यान के दौरान किसी विशेष अनुभव की उम्मीद करना। हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है। इसलिए किसी और के अनुभव से अपनी साधना की तुलना नहीं करनी चाहिए। इसके अलावा, असहज मुद्रा में लंबे समय तक बैठने या शरीर में दर्द होने के बावजूद जबरदस्ती ध्यान करते रहने से भी बचना चाहिए।
ध्यान करते समय इन बातों का रखें ध्यान
ध्यान के लिए शांत और हवादार स्थान चुनें। भोजन करने के तुरंत बाद ध्यान करने के बजाय कुछ समय का अंतर रखें। बहुत ज्यादा थकान या नींद आने की स्थिति में ध्यान करने पर मन बार-बार सोने की ओर जा सकता है। ध्यान के दौरान शरीर को अनावश्यक रूप से तनाव में न रखें। गर्दन, कंधे और चेहरे की मांसपेशियों को सहज रखें। अगर ध्यान करते समय घबराहट, अत्यधिक बेचैनी या कोई असामान्य परेशानी महसूस हो तो अभ्यास रोक देना चाहिए। ऐसी स्थिति बार-बार हो तो किसी योग्य योग शिक्षक या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी योग और आयुर्वेद से संबंधित सामान्य जानकारियों, परंपरागत मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी देना है। जीवांजलि इसकी पुष्टि नहीं करता है। किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्या या उपचार के लिए किसी योग्य चिकित्सक, योग विशेषज्ञ या आयुर्वेदाचार्य से परामर्श अवश्य लें।)