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Vishnu Purana: कैसे हुई कल्पवृक्ष की उत्पत्ति? जानें देवताओं को दिव्य वृक्ष प्राप्त होने की पौराणिक कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Vishnu Purana: विष्णु पुराण के अनुसार एक समय महर्षि दुर्वासा भगवान विष्णु की आराधना से अत्यंत प्रसन्न होकर दिव्य पुष्पों की माला प्राप्त करते हैं। कुछ समय बाद उनकी भेंट देवराज इंद्र से होती है।

Vishnu Purana
Vishnu Purana: कल्पवृक्ष का उल्लेख हिंदू धर्म के अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। इसे ऐसा दिव्य वृक्ष माना गया है जो साधक या याचक की मनोकामनाओं को पूर्ण करने की क्षमता रखता है। विष्णु पुराण, भागवत पुराण और अन्य पौराणिक ग्रंथों में वर्णित समुद्र मंथन की कथा में कल्पवृक्ष की उत्पत्ति का विस्तार से वर्णन मिलता है। यह कोई साधारण वृक्ष नहीं था, बल्कि देवताओं को प्राप्त हुए उन चौदह दिव्य रत्नों में से एक था, जो क्षीरसागर के मंथन से प्रकट हुए थे।

पौराणिक मान्यता के अनुसार कल्पवृक्ष की प्राप्ति के पीछे देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन की लंबी कथा जुड़ी हुई है। यह कथा भगवान विष्णु की लीला, देवताओं की विपत्ति, महर्षि दुर्वासा के श्राप और अमृत प्राप्ति के प्रयास से आरंभ होती है। आइए जानते हैं कि कल्पवृक्ष की उत्पत्ति कैसे हुई और यह देवताओं तक किस प्रकार पहुंचा।

महर्षि दुर्वासा के श्राप से आरंभ हुई घटनाएं

विष्णु पुराण के अनुसार एक समय महर्षि दुर्वासा भगवान विष्णु की आराधना से अत्यंत प्रसन्न होकर दिव्य पुष्पों की माला प्राप्त करते हैं। कुछ समय बाद उनकी भेंट देवराज इंद्र से होती है। प्रसन्न होकर महर्षि दुर्वासा वह दिव्य माला इंद्र को आशीर्वाद स्वरूप प्रदान करते हैं। देवराज इंद्र उस समय अपने ऐश्वर्य और वैभव के कारण गर्व से भरे हुए थे। उन्होंने उस दिव्य माला का उचित सम्मान नहीं किया।

इंद्र ने माला अपने वाहन ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दी। ऐरावत ने सूंड से माला उतारकर भूमि पर फेंक दिया और वह पैरों तले रौंदी गई। महर्षि दुर्वासा ने इसे अपने अपमान के साथ-साथ भगवान विष्णु के प्रसाद का भी अनादर माना। क्रोधित होकर उन्होंने इंद्र को श्राप दिया कि उनका समस्त ऐश्वर्य, तेज और श्री नष्ट हो जाएगी। इस श्राप का प्रभाव केवल इंद्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समस्त देवताओं की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी।

देवताओं की दुर्बलता और असुरों का प्रभाव

महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण देवताओं का तेज समाप्त होने लगा। उनका बल, पराक्रम और वैभव कम हो गया। दूसरी ओर असुरों की शक्ति निरंतर बढ़ती गई। उन्होंने तीनों लोकों पर अधिकार करने का प्रयास शुरू कर दिया। देवताओं ने अनेक बार असुरों से युद्ध किया, लेकिन प्रत्येक बार उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। अंततः देवराज इंद्र सहित सभी देवता ब्रह्माजी के पास पहुंचे और अपनी विपत्ति सुनाई। ब्रह्माजी देवताओं को लेकर भगवान विष्णु के धाम पहुंचे। वहां उन्होंने भगवान विष्णु से देवताओं की रक्षा करने और उनके खोए हुए तेज को वापस दिलाने की प्रार्थना की।

भगवान विष्णु ने बताया समुद्र मंथन का उपाय

भगवान विष्णु ने देवताओं को बताया कि अमृत प्राप्त किए बिना उनकी शक्ति पूर्ण रूप से वापस नहीं आएगी। इसके लिए क्षीरसागर का मंथन करना आवश्यक होगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह कार्य केवल देवताओं के लिए संभव नहीं है, इसलिए असुरों को भी इस कार्य में सहभागी बनाना होगा। भगवान विष्णु ने देवताओं को सलाह दी कि वे असुरों से संधि करें और उन्हें अमृत प्राप्ति का लोभ देकर समुद्र मंथन के लिए तैयार करें। देवताओं ने भगवान की आज्ञा का पालन किया और असुरराज बलि सहित अन्य असुरों को इस कार्य के लिए सहमत कर लिया।

मंदराचल पर्वत बना मथानी

समुद्र मंथन के लिए विशाल मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया। नागराज वासुकि को रस्सी के रूप में प्रयोग किया गया। जब पर्वत समुद्र में डूबने लगा, तब भगवान विष्णु ने कूर्म अर्थात कच्छप अवतार धारण किया और अपनी विशाल पीठ पर मंदराचल पर्वत को धारण कर लिया। इसके बाद देवता और असुर दोनों मिलकर समुद्र मंथन करने लगे। मंथन का यह कार्य अत्यंत लंबे समय तक चलता रहा। मंथन के दौरान समुद्र से एक-एक करके अनेक दिव्य रत्न प्रकट होने लगे।

समुद्र मंथन से निकले दिव्य रत्न

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार समुद्र मंथन से अनेक अद्भुत और दिव्य वस्तुएं प्रकट हुईं। इनमें हलाहल विष, कामधेनु, उच्चैःश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, देवी लक्ष्मी, वारुणी, अप्सराएं, चंद्रमा, धन्वंतरि, अमृत कलश और अन्य दिव्य रत्न शामिल थे। इन्हीं दिव्य रत्नों में कल्पवृक्ष भी प्रकट हुआ। इसकी उत्पत्ति को अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना गया। जब यह दिव्य वृक्ष समुद्र से प्रकट हुआ तो उसकी अद्भुत आभा से चारों दिशाएं प्रकाशित हो उठीं।

कल्पवृक्ष का दिव्य स्वरूप

विष्णु पुराण और अन्य पौराणिक ग्रंथों में कल्पवृक्ष का स्वरूप अत्यंत अलौकिक बताया गया है। इसकी शाखाएं सदा हरी-भरी रहती थीं। इस पर सभी ऋतुओं में पुष्प और फल एक साथ लगे रहते थे। इसकी सुगंध दूर-दूर तक फैलती थी और इसके निकट का वातावरण सदैव आनंदमय बना रहता था। यह वृक्ष सामान्य नियमों से बंधा हुआ नहीं था। इसमें ऋतु परिवर्तन का प्रभाव नहीं पड़ता था। इसकी छाया शीतल और सुखद मानी गई है। इसकी शोभा देखकर देवता और असुर दोनों ही आश्चर्यचकित रह गए।

देवताओं को कैसे प्राप्त हुआ कल्पवृक्ष

समुद्र मंथन से निकले प्रत्येक दिव्य रत्न का किसी न किसी देवता अथवा पात्र को प्रदान किया गया। कल्पवृक्ष को देवताओं के लिए उपयुक्त माना गया। पौराणिक वर्णनों के अनुसार इसे देवराज इंद्र को सौंपा गया। भगवान विष्णु की आज्ञा से कल्पवृक्ष को देवलोक ले जाया गया, जहां उसे इंद्र के नंदन वन में स्थापित किया गया। नंदन वन पहले से ही दिव्य उद्यान था, लेकिन कल्पवृक्ष के वहां स्थापित होने के बाद उसकी शोभा और भी अधिक बढ़ गई। कहा जाता है कि इस दिव्य वृक्ष की उपस्थिति से नंदन वन सदैव पुष्पों और फलों से सुशोभित रहने लगा। देवगण समय-समय पर इस वृक्ष के दर्शन करते थे और इसकी दिव्यता का अनुभव करते थे।

नंदन वन में कल्पवृक्ष का स्थान

पौराणिक कथाओं में नंदन वन को देवलोक का सबसे सुंदर उद्यान बताया गया है। यह स्थान देवताओं, गंधर्वों और अप्सराओं का विहार स्थल माना जाता है। कल्पवृक्ष इसी दिव्य उपवन की प्रमुख शोभा बनकर स्थापित हुआ। कथा में वर्णन मिलता है कि नंदन वन में कल्पवृक्ष के अतिरिक्त अनेक दिव्य पुष्प और वृक्ष भी थे, किंतु कल्पवृक्ष का स्थान सबसे विशिष्ट माना गया। इसकी दिव्य आभा पूरे उद्यान को अलंकृत करती थी।

कल्पवृक्ष और इंद्र का संबंध

देवराज इंद्र को स्वर्ग का अधिपति माना जाता है। समुद्र मंथन के बाद जब उनका खोया हुआ वैभव पुनः स्थापित हुआ, तब कल्पवृक्ष भी उनके दिव्य वैभव का एक महत्वपूर्ण अंग बना। इंद्र के नंदन वन में स्थित यह वृक्ष देवताओं के ऐश्वर्य और समृद्धि का प्रतीक माना गया। पौराणिक कथाओं में कई स्थानों पर उल्लेख मिलता है कि देवगण इस दिव्य वृक्ष की छाया में एकत्रित होते थे और स्वर्गीय उत्सवों के अवसर पर इसकी शोभा विशेष रूप से वर्णित की गई है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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