Valmiki Ramayana,Kishkindhakand,Sarg1 Part 6: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि हनुमान जी ने नागमाता सुरसा को प्रसन्न किया और सिंहिका का वध किया।
Valmiki Ramayana,Kishkindhakand,Sarg1 Part 6: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि हनुमान जी ने नागमाता सुरसा को प्रसन्न किया और सिंहिका का वध किया। इसके बाद,अपना प्रयोजन सिद्ध हो जाने से उन आकाशचारी प्राणियों ने हनुमान जी का बड़ा सत्कार किया। इसके बाद वे आकाश में चढ़कर गरुड़ के समान वेग से चलने लगे। सौ योजन के अन्त में प्रायः समुद्र के पार पहुँचकर जब उन्होंने सब ओर दृष्टि डाली, तब उन्हें एक हरीभरी वनश्रेणी दिखायी दी।
आकाश में उड़ते हुए ही शाखामृगों में श्रेष्ठ हनुमान् जी ने भाँति-भाँति के वृक्षों से सुशोभित लंका नामक द्वीप देखा। उत्तर तट की भाँति समुद्र के दक्षिण तट पर भी मलय नामक पर्वत और उसके उपवन दिखायी दिये। समुद्र, सागरतटवर्ती जलप्राय देश तथा वहाँ उगे हुए वृक्ष एवं सागरपत्नी सरिताओं के मुहानों को भी उन्होंने देखा।
मन को वश में रखने वाले बुद्धिमान् हनुमान जी ने अपने शरीर को महान् मेघों की घटा के समान विशाल तथा आकाश को अवरुद्ध करता-सा देख मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया, मेरे शरीर की विशालता तथा मेरा यह तीव्र वेग देखते ही राक्षसों के मन में मेरे प्रति बड़ा कौतूहल होगा—वे मेरा भेद जानने के लिये उत्सुक हो जायेंगे। ऐसा सोचकर मनस्वी हनुमान् अपने पर्वताकार शरीर को संकुचित करके पुनः अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो गये।
हनुमान जी बड़े ही सुन्दर और नाना प्रकार के रूप धारण कर लेते थे। अपने कर्तव्य का विचार करके छोटा-सा रूप धारण कर लिया। समुद्र के तटपर पहुँचकर वहाँ से उन्होंने एक श्रेष्ठ पर्वत के शिखर पर बसी हुई लंका को देखा। हनुमान उस समय अमरावती के समान सुशोभित लंकापुरी की शोभा देखने लगे।