Lord Jagannath Mythological Story: भगवान जगन्नाथ का धाम पुरी केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के प्रमुख वैष्णव तीर्थों में गिना जाता है। यहां विराजमान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाएं अन्य मंदिरों की मूर्तियों से बिल्कुल अलग हैं। ये प्रतिमाएं पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि पवित्र नीम की लकड़ी से बनाई जाती हैं। यही कारण है कि समय-समय पर इन प्रतिमाओं का परिवर्तन किया जाता है। इस दिव्य और अत्यंत गोपनीय धार्मिक अनुष्ठान को 'नवकलेवर' कहा जाता है।
नवकलेवर केवल प्रतिमा बदलने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह श्रीजगन्नाथ मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण और रहस्यमयी परंपराओं में से एक मानी जाती है। यह आयोजन सामान्यतः 12 से 19 वर्षों के बीच उस समय होता है, जब आषाढ़ मास में अधिकमास आता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उसी वर्ष भगवान स्वयं नया शरीर धारण करते हैं। इस दौरान मंदिर के भीतर कई ऐसे अनुष्ठान संपन्न होते हैं, जिन्हें केवल परंपरागत सेवायत ही देख सकते हैं।
क्या है नवकलेवर की परंपरा?
'नवकलेवर' दो शब्दों से मिलकर बना है- 'नव' अर्थात नया और 'कलेवर' अर्थात शरीर। यानी भगवान का नया शरीर धारण करना। स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण तथा श्रीजगन्नाथ परंपरा से जुड़े प्राचीन ग्रंथों में इस अनुष्ठान का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि जैसे जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करती है, उसी प्रकार भगवान जगन्नाथ भी निश्चित समय आने पर अपनी पुरानी काष्ठ प्रतिमा का त्याग कर नई प्रतिमा में विराजमान होते हैं। पुरी में यह आयोजन अत्यंत शुभ और दुर्लभ माना जाता है। लाखों श्रद्धालु केवल नवकलेवर के दर्शन के लिए वर्षों तक प्रतीक्षा करते हैं।
हर 12 साल में ही क्यों बदलती है प्रतिमा?
आम धारणा यह है कि भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा हर 12 वर्ष में बदली जाती है, लेकिन धार्मिक परंपरा के अनुसार इसका वास्तविक आधार 12 वर्ष नहीं, बल्कि अधिकमास है। जब पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास में दो आषाढ़ पड़ते हैं, अर्थात अधिक आषाढ़ आता है, तभी नवकलेवर का आयोजन किया जाता है। यह योग सामान्यतः लगभग 12 से 19 वर्षों के बीच बनता है, इसलिए कई बार 12 वर्ष बाद तो कई बार 19 वर्ष बाद भी यह अनुष्ठान संपन्न होता है। चूंकि भगवान की प्रतिमाएं नीम की लकड़ी से निर्मित होती हैं, इसलिए निर्धारित समय आने पर नई प्रतिमाओं का निर्माण धार्मिक विधि-विधान के अनुसार किया जाता है।
नवकलेवर की शुरुआत कैसे होती है?
नवकलेवर की प्रक्रिया अक्षय तृतीया से प्रारंभ मानी जाती है। इसी दिन मंदिर प्रशासन और सेवायत विशेष पूजा के बाद 'बनजागा यात्रा' के लिए प्रस्थान करते हैं। इस दल में दैतापति सेवक, ब्राह्मण, विश्वकर्मा शिल्पी और अन्य परंपरागत सेवक शामिल होते हैं। सबसे पहले वे मां मंगला के मंदिर में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि मां मंगला स्वयं स्वप्न में यह संकेत देती हैं कि भगवान की नई प्रतिमाओं के लिए उपयुक्त पवित्र नीम वृक्ष कहां स्थित हैं। इसके बाद खोज दल उन वृक्षों की तलाश में निकलता है।
दारु यानी पवित्र नीम वृक्ष की खोज कैसे की जाती है?
भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा बनाने के लिए किसी भी सामान्य नीम के पेड़ का चयन नहीं किया जाता। जिस लकड़ी से प्रतिमा बनाई जाती है, उसे 'दारु ब्रह्म' कहा जाता है। हर देवता के लिए अलग-अलग वृक्ष खोजा जाता है और प्रत्येक वृक्ष में विशेष धार्मिक लक्षण होना आवश्यक माना जाता है। भगवान जगन्नाथ के वृक्ष में सामान्यतः शंख, चक्र, गदा और पद्म जैसे प्राकृतिक चिह्न दिखाई देना शुभ माना जाता है। वृक्ष के पास कोई नदी, तालाब, श्मशान, शिव मंदिर या चींटियों का टीला होना भी परंपरा का हिस्सा माना जाता है। वृक्ष पर पक्षियों का घोंसला न हो और उसमें कोई बड़ी क्षति भी न हो। बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन चक्र के लिए भी अलग-अलग धार्मिक लक्षणों वाले वृक्ष निर्धारित किए जाते हैं। इन सभी संकेतों की पुष्टि होने के बाद ही वृक्ष को भगवान की प्रतिमा निर्माण के योग्य माना जाता है।
दारु काटने की धार्मिक प्रक्रिया
वृक्ष चयन के बाद वहां कई दिनों तक यज्ञ और वैदिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इसके बाद विशेष क्रम में वृक्ष को काटा जाता है। परंपरा के अनुसार सबसे पहले सोने की कुल्हाड़ी से प्रतीकात्मक प्रहार किया जाता है। उसके बाद चांदी की कुल्हाड़ी और अंत में लोहे की कुल्हाड़ी से वृक्ष काटा जाता है। पूरी प्रक्रिया वैदिक मंत्रों और पूजा-अर्चना के बीच संपन्न होती है। कटे हुए दारु को विशेष रथों के माध्यम से अत्यंत श्रद्धा के साथ श्रीजगन्नाथ मंदिर लाया जाता है।
मंदिर के भीतर कैसे बनती हैं नई प्रतिमाएं?
पवित्र दारु को मंदिर परिसर के 'कोइली बैकुंठ' नामक स्थान पर ले जाया जाता है। यहीं पर परंपरागत विश्वकर्मा शिल्पी नई प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं। प्रतिमा निर्माण का कार्य पूरी तरह गोपनीय होता है। इस दौरान बाहरी व्यक्ति का प्रवेश पूरी तरह निषिद्ध रहता है। केवल परंपरागत सेवायत और अधिकृत शिल्पी ही इस कार्य में शामिल होते हैं। निर्धारित समय सीमा के भीतर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की नई प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं।
सबसे रहस्यमयी अनुष्ठान – ब्रह्म परिवर्तन
नवकलेवर का सबसे महत्वपूर्ण और रहस्यपूर्ण चरण 'ब्रह्म परिवर्तन' माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान की पुरानी प्रतिमाओं के भीतर एक दिव्य तत्व विराजमान रहता है, जिसे 'ब्रह्म पदार्थ' या 'ब्रह्म' कहा जाता है। इसकी वास्तविक प्रकृति क्या है, यह आज भी अत्यंत गोपनीय है। आधी रात के समय यह अनुष्ठान संपन्न किया जाता है। उस समय पूरे मंदिर की रोशनी बुझा दी जाती है। मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं और केवल दैतापति सेवक ही भीतर उपस्थित रहते हैं।
कहा जाता है कि ब्रह्म परिवर्तन करने वाले सेवायत की आंखों पर पट्टी बांधी जाती है और हाथों में कपड़ा लपेट दिया जाता है, ताकि वह सीधे उस दिव्य तत्व का स्पर्श या दर्शन न कर सके। पूर्ण गोपनीयता के साथ पुरानी प्रतिमाओं से ब्रह्म तत्व निकालकर नई प्रतिमाओं में स्थापित किया जाता है। इस अनुष्ठान के बारे में मंदिर परंपरा के अनुसार कोई भी सेवायत सार्वजनिक रूप से विस्तृत जानकारी नहीं देता। यही कारण है कि इसे जगन्नाथ परंपरा का सबसे रहस्यमयी धार्मिक आयोजन माना जाता है।
पुरानी प्रतिमाओं का क्या होता है?
ब्रह्म परिवर्तन के बाद पुरानी प्रतिमाओं को सामान्य मूर्ति की तरह नहीं रखा जाता। उन्हें मंदिर परिसर के कोइली बैकुंठ में पूरे धार्मिक विधि-विधान के साथ समाधि दी जाती है। यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है और यहीं भगवान के पुराने कलेवर को विश्राम दिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार पुरानी प्रतिमाओं में से ब्रह्म तत्व निकल जाने के बाद उनका सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार किया जाता है।
नवकलेवर के दौरान भगवान क्यों नहीं देते दर्शन?
ब्रह्म परिवर्तन से पहले भगवान जगन्नाथ बीमार होने की परंपरा का पालन करते हैं। इसे 'अनसर' या 'अनवासर' काल कहा जाता है। इस अवधि में भगवान के दर्शन बंद रहते हैं। मान्यता है कि स्नान पूर्णिमा पर विशेष अभिषेक के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और विश्राम करते हैं। इस दौरान उनकी सेवा विशेष औषधियों और धार्मिक विधियों से की जाती है। नवकलेवर वर्ष में यह अवधि और भी अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इसी समय नई प्रतिमाओं का निर्माण और ब्रह्म परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी होती है।
नवयौवन दर्शन और रथयात्रा