Mahakumbh 2025: महाकुंभ की शुरुआत कल से यानी 13 जनवरी पौष पूर्णिमा से हो रही है। इसमें देश-विदेश से लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की आने की उम्मीद है। साथ ही देश के प्रमुख अखाड़े के साधु-संत भी पहुंच चुके हैं। महाकुंभ में अखाड़े का बहुत ही ज्यादा महत्व है।
Mahakumbh 2025: महाकुंभ की शुरुआत कल से यानी 13 जनवरी पौष पूर्णिमा से हो रही है। इसमें देश-विदेश से लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की आने की उम्मीद है। साथ ही देश के प्रमुख अखाड़े के साधु-संत भी पहुंच चुके हैं। महाकुंभ में अखाड़े का बहुत ही ज्यादा महत्व है। बता दें कि महाकुंभ में सबसे पहले अखाड़े के साधु-संत ही शाही स्नान करते हैं इसके बाद ही अन्य श्रद्धालु स्नान करते हैं। लेकिन आपके मन में ये विचार जरूर आया होगा कि अखाड़े की स्थापना कब और कैसे हुई थी और इनक अखाड़ों के इष्ट देव कौन होते हैं। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
अखाड़ों की स्थापना
अखाड़ा मठों का एक विशिष्ट अंग है। बता दें कि अखाड़ों की शुरुआत 8वीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी। अखाड़ों का जन्म परिस्थितियों की देन है। इन सभी बातों को श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता श्री महंत नारायण गिरि जी महाराज ने बताई। महाराज जी ने ये भी बताया कि अखाड़ों का यह स्वरूप 12वीं शताब्दी के पूर्व नहीं थे। जितने भी नागा साधु अखाड़े के मध्य काल में अकबर से औरंगजेब के काल के बीच शनैः-शनैः विकसित हुए। महंत जी ने बताया कि अखाड़ा शब्द संस्कृत के अखण्ड शब्द से ही विकृत रूप है। इसका अर्थ होता है खण्डरहित अथवा साधुओं का संगठित समुदाय होता है।
अखाड़ों की विशेषताएं
बता दें कि देश के प्रमुख अखाड़ों की अपनी पृथक परंपराएं और विशेषताएं है। इन अखाड़ों के अपने-अपने अलग-अलग रीति-रिवाज एवं संकल्प होते हैं। बता दें कि दस संघ यानी दशनामी सन्यासी अखाड़े के कर्म प्रधान इस जगत का त्याग कर के गृह हीन, धार्मिक, भ्रमणशील, भिक्षुक-जीवन की स्वीकृति का अनुष्ठान करते हैं। इसके साथ ही संन्यास का प्रचलन पुरातन मानव के अंतरतम में ईश्वरवादी भावना के अरुणोदय काल से ही चला आ रहा है बता दें कि पुराने समय में आर्ष ग्रंथ वेद में भी जटाधारी गेरुआ चीर धारण करने वालों की उपमा आकाश स्थित सूर्य देव से ही दी जाती थी।
जानें अखाड़ों की स्थापना और उनके इष्टदेव
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देश के प्रमुख सभी अखाड़े की स्थापना और इनके इष्टदेव अलग-अलग होते हैं। तो आइए इस खबर में जानते हैं कि किस अखाड़े के कौन से इष्ट देव है। श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा- बता दें कि श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़े की स्थापना संवत 603 जेष्ठ कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि और दिन शुक्रवार को हुई थी। इस अखाड़े की स्थापना हरद्वार भारती ने किया था। श्री पंच दशनाम अखाड़े के इष्ट देव श्री भैरव जी महराज हैं। बता दें कि श्री पंचायती अटल अखाड़े की स्थापना संवत 603 मार्ग शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि दिन रविवार को हुई थी। इस अखाड़े के इष्ट देव श्री गजानन जी महाराज है। श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी - इस अखाड़े की स्थापना श्री शुभकरनी जी महाराज द्वारा संवत 805 मार्गशीर्ष माह के दशमी तिथि दिन गुरुवार को हुई थी। इस अखाड़े के इष्टदेव श्री कपिल मुनि जी महाराज है। वहीं तपोनिधि आनंद अखाड़ा पंचायती की स्थापना संवत 912 ई. के ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि दिन रविवार को इस अखाड़े की स्थापना हुई थी। इस अखाड़े के इष्ट देव सूर्य नारायण जी हैं। श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी- बता दें कि श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी की स्थापना संवत 180 कार्तिक कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि दिन सोमवार को हुई थी। यह अखाड़ा देश के माण्डवी नामक स्थान पर हुई थी। इस अखाड़े के स्वामी कार्तिकेय जी महाराज हैं। श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े की स्थापना संवत 1202 कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि दिन मंगलवार को उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में हुआ था। इस अखाड़े का इष्ट देव दत्तात्रेय जी महाराज है। वहीं श्री पंचदशनाम पंच अग्नि अखाड़े की स्थापना 1992 ई. आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि सन 1136 में हुई थी। इस अखाड़े का इष्ट देव गायत्री जी हैं। साथ ही इनका प्रधान केंद्र काशी को माना गया है। बड़ा उदासीन और नया उदासीन अखाड़े की स्थापना 1788 ई. व 1902 ई. में हुई थी। बड़ा उदासीन अखाड़े के इष्टदेव चंद्र भगवान हैं और नया उदासीन अखाड़े के भी इष्ट देव चंद्र देव भगवान ही हैं। यह भी पढ़ें- Mahakumbh Mela 2025: प्रयागराज के बाद कब और कहां लगेगा महाकुंभ मेला, जानें शाही स्नान की तिथियां
यह भी पढ़ें- Mahakumbh 2025: महाकुंभ में क्या होता है अखाड़े का महत्व, जानें इसकी मान्यताएं