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Mahakumbh 2025: महाकुंभ व 12 अंक क्या क्या है महत्व, जानें 12 नबंर का रहस्य

जीवांजलीPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Mahakumbh Mein 12 Ank Ka Mahatva: अंक बारह और महाकुंभ पर्व का आपस में घनिष्ठ संबंध है। अंक ज्योतिष के अनुसार अंक एक का स्वामी सूर्य, अंक दो का स्वामी चंद्रमा, इसी प्रकार अंक तीन का स्वामी बृहस्पति देव हैं।

Mahakumbh 2025
Mahakumbh Mein 12 Ank Ka Mahatva: अंक बारह और महाकुंभ पर्व का आपस में घनिष्ठ संबंध है। अंक ज्योतिष के अनुसार अंक एक का स्वामी सूर्य, अंक दो का स्वामी चंद्रमा, इसी प्रकार अंक तीन का स्वामी बृहस्पति देव हैं। अंक बारह को जोड़ने पर मूल अंक तीन आता है जो देवगुरु बृहस्पति का शुभ अंक है। बारह राशियां, बारह भाव, बारह लग्न, बारह तिलक, बारह आदित्य, बारह ज्योतिर्लिंग, बारह गणपति और भागवत महापुराण के बारह अध्याय हैं। हिंदी, अंग्रेजी और मुस्लिम माह भी बारह हैं।

महाकुंभ व 12 अंक का महत्व

महाकुंभ के साथ ही धर्म और मंत्रों का महत्व भी अंक बारह में छिपा है, जैसे भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए बारह अक्षरों का मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। हर शुभ कार्य के लिए बृहस्पति की कृपा अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।

ब्रह्मांड में 12 नंबर का महत्व

ज्योतिष की गणना के अनुसार संपूर्ण ब्रह्मांड को बारह राशियों में बांटा गया है। कुंडली में भी बारह भाव या 12 भाव व्यक्ति के भाग्य और उसके साथ होने वाली अच्छी-बुरी घटनाओं का आकलन करते हैं। सूर्य बारह महीनों में बारह राशियों का भ्रमण पूर्ण करता है तथा बृहस्पति बारह महीनों में एक राशि का भ्रमण पूर्ण करता है। अंक तीन की महिमा अद्वितीय है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, त्रिदेवों का आशीर्वाद ही पृथ्वी के अस्तित्व का मुख्य आधार है। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के बराबर होते हैं, इसलिए प्रत्येक स्थान पर बारह वर्ष के पश्चात महापर्व कुंभ का आयोजन होता है।

अमृत कलश के लिए 12 वर्षों तक चला था संग्राम

देवासुर संग्राम बारह वर्षों तक चला तथा अमृत बारह स्थानों पर गिरा, देवलोक में आठ स्थान तथा पृथ्वी पर चार स्थान। पृथ्वी पर चार स्थान हैं, प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन तथा नासिक। प्रत्येक स्थान पर बारह वर्ष के पश्चात कुंभ मेले के आयोजन का मुख्य आधार बृहस्पति की चाल से संबंधित है, क्योंकि बृहस्पति लगभग बारह महीने तक एक राशि में रहता है तथा लगभग बारह वर्षों में बारह राशियों का भ्रमण पूर्ण करता है तथा लगभग बारह वर्ष पश्चात उसी राशि में स्थित होता है, जहां वह बारह वर्ष पूर्व था।

गुरु बृहस्पति का 12 साल पर राशि परिवर्तन

बृहस्पति का बारह वर्ष पश्चात पुनः आना ही कुंभ का मुख्य आधार है। प्रत्येक बारह वर्ष बाद जब बृहस्पति वृषभ राशि में गोचर करता है तथा सूर्य और चंद्रमा मकर राशि में होते हैं, तब माघ मास में इस महापर्व पर प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर स्नान और दान करने से मोक्ष का द्वार खुलता है, ऐसी धार्मिक मान्यताएं हैं।

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