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Digambar Ani Akhada: दिगंबर अनि अखाड़े में हुए 550 साल बाद चुनाव, जानें अखाड़े की अनूठी परंपरा

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Digambar Ani Akhada: महाकुंभ के दौरान सबसे बड़े वैष्णव दिगंबर अनी अखाड़े ने 550 साल पुरानी परंपरा को पीछे छोड़कर लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाया है। अब अनी अखाड़े में सभी पदों के लिए न सिर्फ चुनाव होंगे, बल्कि उनका कार्यकाल भी 12 साल तय कर दिया गया है।

Mahakumbh 2025
Digambar Ani Akhada: महाकुंभ के दौरान सबसे बड़े वैष्णव दिगंबर अनी अखाड़े ने 550 साल पुरानी परंपरा को पीछे छोड़कर लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाया है। अब अनी अखाड़े में सभी पदों के लिए न सिर्फ चुनाव होंगे, बल्कि उनका कार्यकाल भी 12 साल तय कर दिया गया है। अभी तक अखाड़े के पदाधिकारियों के लिए कोई निश्चित कार्यकाल नहीं था। अखाड़े के अध्यक्ष, महामंत्री व अन्य पदाधिकारी आजीवन इस पद पर बने रहते थे। 

अखिल भारतीय श्री पंच दिगंबर अनी अखाड़े को छोड़कर अनी निर्वाणी व निर्मोही अखाड़े में व्यवस्था संचालन के लिए हर 12 साल में पदाधिकारियों का चुनाव होता है, लेकिन दिगंबर अनी अखाड़े में यह व्यवस्था लागू नहीं थी। अखाड़े के पदाधिकारी आजीवन पद पर बने रहते थे। उनकी मृत्यु या अन्य किसी कारण से पद रिक्त होने पर ही नए सदस्य को कार्यकारिणी में जगह मिलती थी। 

पदाधिकारियों का कार्यकाल 12 वर्ष तय

अखाड़े में यह परंपरा करीब 550 वर्षों से चली आ रही थी। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्रीमहंत माधव दास मौनी बाबा बताते हैं कि पहली बार अखाड़े ने सभी पदाधिकारियों का कार्यकाल 12 वर्ष तय किया और अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, दो मंत्री, कोषाध्यक्ष और महंत पद के लिए चुनाव हुए।

इसमें वैष्णव दास (अयोध्या) को राष्ट्रीय अध्यक्ष, महामंत्री बलराम दास (उज्जैन), मंत्री जानकी दास (फरीदाबाद) और पुजारी सीताराम दास (छत्तीसगढ़) बनाए गए। इनका चुनाव सर्वसम्मति से हुआ। अब ये पदाधिकारी अगले 12 वर्षों तक अखाड़े की बागडोर संभालेंगे। अगले प्रयागराज कुंभ के दौरान फिर से चुनाव होंगे।

अखाड़े की अनूठी परंपरा

अखाड़े के पदाधिकारियों के अनुसार, दिगंबर अनी अखाड़े की स्थापना स्वामी चलनानंदाचार्य ने वर्ष 1475 में की थी। अखाड़े की धर्मध्वजा में पांच रंग (लाल, हरा, सफेद और काला) शामिल किए गए थे, ताकि अलग-अलग समूहों को जगह मिल सके। साधु और महंत राम और कृष्ण की पूजा करते हैं। अखाड़े के इमामदेव हनुमानजी महाराज हैं। साधु सफेद वस्त्र पहनते हैं और त्रिपुंड भी लगाते हैं।

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