shani scared of these people: शनिदेव के बारे में तो सभी जानते हैं कि उनकी दृष्टि राजा को रंक तो रंक को राजा बना देती है।
shani scared of these people: शनिदेव के बारे में तो सभी जानते हैं कि उनकी दृष्टि राजा को रंक तो रंक को राजा बना देती है। सूर्यदेव और छाया के पुत्र भगवान शनिदेव की वक्री दृष्टि ने कई देवी और देवताओं को परेशानी में डाला है। शनिदेव की वक्र दृष्टि के कारण भगवान शिव को जंगल जंगल भटकना पड़ा, उनके भक्त रावण के कुल का नाश हो गया। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार शनिदेव की दृष्टि के कारण ही भगवान गणेशजी का सिर धड़ से अलग हो गया था। शनिदेव के कारण इंद्र को अपना राजपाट खोना पड़ा था। हालांकि शनिदेव इन 9 लोगों से डरते हैं और इनके भक्तों को वे कभी परेशान नहीं करते हैं।
इन 9 लोगों से डरते हैं शनिदेव (Shanidev is afraid of these 9 people)
कहते हैं कि शनिदेव अपने पिता सूर्यदेव, माता छाया, पत्नी चित्ररथ से डरते हैं। उनकी पत्नी ने ही उन्हें शाप दिया था कि आपकी दृष्टि जिस पर भी गिरेगी उसका नाश हो जाएगा। कहते हैं कि उनकी पत्नी के मंत्रों का जाप करने से शनि दोष दूर होता है। इसके अलावा भगवान शिव, भगवान कृष्ण, माता कालिका, हनुमानजी और ऋषि पिप्पलाद से शनिदेव को डर लगता है। इसके अलावा वे पीपल के वृक्ष से भी डरते हैं क्योंकि पीपल के वृक्ष में सभी देवी और देवताओं का निवास होता है। उपरोक्त में 5 प्रमुख के शनिदेव से संबंध के बारे में जानिए विस्तार से।
शनिदेव को हनुमान जी ने रावण की कैद से मुक्त कराया था, लेकिन एक बार शनिदेव हनुमान जी के पास आते हैं और कहते हैं कि मैं आपको सावधान करने आया हूं कि कृष्ण लीला के समापन के बाद कलियुग का प्रारंभ हो चुका है। इस कलियुग में देवता धरती पर नहीं रह सकते क्योंकि जो भी धरती पर है उस पर मेरी साढ़ेसाती का असर होगा। इस पर हनुमानजी कहते हैं जो भी देवता या मनुष्य राम की शरण में रहता है उस पर तो काल का भी प्रभाव नहीं रहता। इसलिए आप मुझे छोड़कर कहीं और जाइये। इस पर शनिदेव कहते हैं कि आपके ऊपर मेरी साढ़ेसाती अभी से प्रभावी हो रही है। इसलिए आज और अभी मैं शरीर पर आ रहा हूं इसे कोई टाल नहीं सकता। तब हनुमानजी कहते हैं ठीक है आ जाइये।
इतना कहकर शनिदेव हनुमान जी के माथे पर बैठ गए। माथे पर बैठते ही हनुमानजी को खुजली आई तो उन्होंने एक पर्वत उठाकर अपने माथे पर रख लिया। तब उस पर्वत से दबकर घबराकर शनिदेव बोले की ये क्या कर रहे हो आप? यह सुनकर हनुमानजी ने कहा कि आप अपना काम कीजिए मुझे मेरा काम करने दीजिये। मैं अपने स्वभाव से विवश हूं। मैं इसी प्रकार खुजली मिटाता हूं। ऐसा कहकर हनुमानजी एक और पर्वत अपने सिर पर रख लेते हैं। जिससे शनिदेव और दब जाते हैं और हैरान परेशान होकर कहते हैं आप इन पर्वतों को उतारिए मैं समझौता करने के लिए तैयार हूं। हनुमानजी कुछ नहीं सुनते हैं और तीसरा बड़ा पर्वत उठाकर अपने सिर पर रख देते हैं। इस बोझ से शनिदेव चिल्लाने लगते हैं और कहते हैं- मुझे छोड़ दो मैं आपके कभी नजदीक भी नहीं आऊंगा। लेकिन फिर भी हनुमानजी उनकी पुकार को सुना अनसुना करके चौथा पर्वत रख देते हैं तब शनिदेव त्राहिमाम त्राहिमाम करते हुए हनुमान जी से प्रार्थना करते हैं मैं आप तो क्या आपके भक्तों के भी समीप कभी नहीं आऊंगा कृपया कर मुझे छोड़ दें।... यह सुनकर हनुमानजी शनिदेव को पीड़ा से मुक्त कर देते हैं।
पिप्पलाद जी ने देवताओं से पूछा- क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्म से पूर्व ही मुझे छोड़कर चले गए? जन्म होते ही मेरी माता भी सती हो गई और बाल्यकाल में ही मैं अनाथ होकर कष्ट झेलने लगा। यह सुनकर देवताओं ने बताया शनि ग्रह की दृष्टि के कारण ही ऐसा कुयोग बना है। पिप्पलाद यह सुनकर बड़े क्रोधित हुए और कहने लगे की यह शनि नवजात शिशुओं को भी नहीं छोड़ता है। उसे इतना अहंकार है। तब एक दिन जब उनका सामना शनि से हुआ तो महर्षि से अपने ब्रह्मदंड उठाया और उससे शनि पर प्रहार किया। शनिदेव इस ब्रह्मदंड का प्रहार नहीं सह सकते थे इसलिए वे डर के मारे भागे। तीनों लोक की परिक्रमा करने के बाद भी ब्रह्मदंड ने शनिदेव का पीछा नहीं छोड़ा और अंत में उनके पैर पर आकर लगा जिससे शनिदेव लंगड़े हो गए।
देवताओं ने पिप्पलाद मुनि से शनिदेव को क्षमा करने के लिए विनय किया। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ने शनि को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक किसी को कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने मात्र से शनि की पीड़ा दूर हो जाती है। हालांकि बाद में शनि पीड़ा से मुक्ति के लिए ऋषि पिप्पलाद ने शनि स्तोत्र की रचना की जिसे पिप्पलाद ऋषि कृत शनि स्तोत्र कहते हैं। इसको पढ़ने से भी शनि दोष से मुक्ति मिलती है।
माता कालिका पर भी शनिदेव की दृष्टि का कोई असर नहीं होता उल्टे शनिदेव माता से भयभीत रहते हैं। वो माता कालिका के आदेशों का पालन करते हैं। कालिका माता को शनिदेव अपनी माता मानते हैं। माता दुर्गा और उनके जितने भी स्वरूप हैं उन सभी से और उनके सच्चे भक्तों से शनिदेव दूर ही रहते हैं। उन पर कभी भी वक्र दृष्टि नहीं डालते हैं।
शनिदेव महादेव के रुद्र रूप और भैरव रूप से डरते हैं। शनिदेव ने महादेव की तपस्या करके ही दंडनायक का पद प्राप्त किया था। महादेव ने ही उन्हें वरदान दिया था। शनिदेव लोगों को उनके बुरे कर्मों की सजा देते हैं और अच्छे कर्मों का पुरस्कार देते हैं। भगवान शिव ने नौ ग्रहों में शनिदेव को न्याय का देवता बनाया है। शनिदेव उस जातक का कुछ नहीं बिगाड़ सकते जिसके कर्म अच्छे हैं और यह भी कहते हैं कि अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चंडाल का, काल भी उसका क्या बिगाड़े जो भक्त हो महाकाल का।
कथा के अनुसार मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था तब स्वर्ग से सभी देवताओं के साथ शनिदेव की कृष्ण के बाल रूप को देखने मथुरा आए थे। नंद बाबा को जब यह पता चला तो उन्होंने भयवश शनिदेव को दर्शन कराने से मना कर दिया। नंद बाबा को लगा कि शनिदेव की दृष्टि पड़ते ही कहीं कृष्ण के साथ कुछ अमंगल न हो जाए। तब मानसिक रूप से शनिदेव ने भगवान श्रीकृष्ण से दर्शन देने की विनती की तो कृष्ण ने शनिदेव को कहा कि वे नंदगांव के पास के वन में जाकर तपस्या करें, वहीं मैं उन्हें दर्शन दूंगा। बाद में शनिदेव की तपस्या से भगवान श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए और कोयल के रूप में उन्होंने शनिदेव को दर्शन दिया। मान्यता है कि जो इस वन की परिक्रमा करके शनिदेव की पूजा करेगा वहीं कृष्ण की कृपा पाएंगे। उस पर से शनिदेव का प्रकोप भी हट जाएगा।