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Vakratunda Sankashti Chaturthi: वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी का व्रत कब रखा जाएगा? जानिए तिथि और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Vakratunda Sankashti Chaturthi: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश को प्रसन्न करने और जीवन की परेशानियों से मुक्ति की कामना के लिए रखा जाता है।

Vakratunda Sankashti Chaturthi
Vakratunda Sankashti Chaturthi: हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूजनीय देवता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणपति बप्पा की पूजा से की जाती है। मान्यता है कि भगवान गणेश की आराधना करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। हर महीने आने वाली संकष्टी चतुर्थी का व्रत भी भगवान गणेश को समर्पित होता है। कार्तिक मास में आने वाली वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी का विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन भक्त गणेश जी की पूजा करते हैं और चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत का पारण करते हैं। क्या आप जानते हैं कि साल 2026 में वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी का व्रत किस दिन रखा जाएगा और इस दिन का क्या महत्व है? आइए जानते हैं व्रत की सही तिथि और इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं...

कब है वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी 2026?

हिंदू पंचांग के अनुसार, वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी का व्रत 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान गणेश के वक्रतुंड स्वरूप की पूजा की जाती है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेते हैं और दिनभर अपनी श्रद्धा के अनुसार उपवास रखते हैं। शाम को भगवान गणेश की पूजा करने के बाद चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य देने की परंपरा है।

चतुर्थी तिथि का समय

पंचांग के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर 2026 को रात 1 बजकर 6 मिनट पर शुरू होगी और इसी दिन रात 10 बजकर 9 मिनट पर समाप्त होगी। चंद्रोदय का समय रात करीब 8 बजकर 17 मिनट है। 

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश को प्रसन्न करने और जीवन की परेशानियों से मुक्ति की कामना के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि गणपति बप्पा अपने भक्तों के विघ्न दूर करते हैं और उन्हें बुद्धि, विवेक तथा धैर्य प्रदान करते हैं। वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के वक्रतुंड स्वरूप की आराधना की जाती है। वक्रतुंड का अर्थ है घुमावदार सूंड वाले भगवान। भक्त इस दिन पूजा-अर्चना करके परिवार की सुख-शांति, खुशहाली और कार्यों में सफलता की कामना करते हैं।

कैसे करें भगवान गणेश की पूजा?

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करके भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। गणपति बप्पा के सामने दीपक जलाएं और उन्हें फूल, दूर्वा, फल तथा मोदक या लड्डू का भोग अर्पित करें। इसके बाद भगवान गणेश के मंत्रों का जाप करें और संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। शाम के समय गणेश जी की आरती करें। पूजा के बाद चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें जल से अर्घ्य दें और अपनी मनोकामना के लिए प्रार्थना करें।

चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा

संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्रमा के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। परंपरा के अनुसार, भक्त दिनभर उपवास रखने के बाद रात में चंद्रमा के उदय होने की प्रतीक्षा करते हैं। चंद्र दर्शन के बाद चंद्र देव को जल अर्पित किया जाता है और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है। चूंकि चंद्रोदय का समय अलग-अलग शहरों में बदल सकता है, इसलिए व्रत का पारण करने से पहले स्थानीय समय की जानकारी लेना जरूरी है।

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी पर क्या चढ़ाएं?

इस दिन भगवान गणेश को दूर्वा, लाल या पीले फूल, मोदक, लड्डू और मौसमी फल अर्पित किए जा सकते हैं। गणेश पूजा में दूर्वा को विशेष स्थान प्राप्त है। भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार भगवान को भोग लगाते हैं। पूजा के दौरान गणेश मंत्रों का जाप और व्रत कथा का श्रवण भी किया जाता है। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई आराधना से भक्तों को मानसिक शांति मिलती है और वे अपने जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने की शक्ति की कामना करते हैं।

करवा चौथ के दिन ही रखा जाएगा व्रत

साल 2026 में वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी और करवा चौथ दोनों 29 अक्टूबर को पड़ रहे हैं। दोनों व्रतों में चंद्रमा के दर्शन का महत्व है, लेकिन इनकी पूजा परंपराएं और धार्मिक उद्देश्य अलग-अलग हैं। वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित है, जबकि करवा चौथ में विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। जो श्रद्धालु दोनों व्रत रखते हैं, उन्हें अपनी पारिवारिक परंपराओं और पूजा-विधि के अनुसार दोनों व्रतों के नियमों का पालन करना चाहिए।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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