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Sankashti Ganesh Chaturthi: क्यों मनाई जाती है संकष्टी गणेश चतुर्थी? जानें व्रत का महत्व और पूजन विधि

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी
सार

sankashti ganesh chaturthi 2025: हिंदू धर्म में संकष्टी गणेश चतुर्थी एक पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है, जो भगवान गणेश को समर्पित है। यह हर मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है

संकष्टी गणेश चतुर्थी
sankashti ganesh chaturthi 2025: हिंदू धर्म में संकष्टी गणेश चतुर्थी एक पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है, जो भगवान गणेश को समर्पित है। यह हर मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है और इस वर्ष 2025 में ज्येष्ठ मास की संकष्टी गणेश चतुर्थी 14 जून, शनिवार को पड़ रही है। भक्त इस दिन विघ्नहर्ता गणपति की पूजा करते हैं, ताकि जीवन की बाधाएं दूर हों और सुख-समृद्धि की प्राप्ति हो। आइए जानते हैं इस त्यौहार का महत्व और पूजा विधि...

संकष्टी गणेश चतुर्थी का महत्व 

संकष्टी चतुर्थी का नाम 'संकट' और 'हर्ता' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'संकटों को हरने वाला दिन।' हिंदू मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश विघ्नहर्ता और सिद्धिदाता हैं, जो सभी बाधाओं को दूर करते हैं और कार्यों में सफलता प्रदान करते हैं। इस दिन व्रत और पूजा करने से आर्थिक संकट, पारिवारिक समस्याएं और अन्य कठिनाइयां दूर होती हैं। यह पर्व विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो नए कार्य शुरू करने, शिक्षा में प्रगति या जीवन में स्थिरता की कामना करते हैं। शनिवार को पड़ने वाली संकष्टी को और भी शुभ माना जाता है, क्योंकि यह शनि देव के प्रभाव को कम करने में मदद करता है।

क्यों मनाई जाती है संकष्टी गणेश चतुर्थी? 

संकष्टी गणेश चतुर्थी हर महीने शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है, जबकि कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को 'विनायक चतुर्थी' कहते हैं। इस दिन भक्त भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए व्रत रखते हैं और उनकी पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस तिथि पर गणपति की भक्ति से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं, क्योंकि गणेश जी प्रथम पूज्य हैं और किसी भी शुभ कार्य से पहले उनकी पूजा अनिवार्य है। यह पर्व भक्तों को धैर्य, विश्वास और आध्यात्मिक शक्ति का महत्व सिखाता है। ज्येष्ठ मास की संकष्टी चतुर्थी गर्मी के मौसम में आती है और भक्त इस दिन गणेश जी से सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।

पूजा विधि

प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें। पूजा स्थल को साफ करें।
एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और भगवान गणेश की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
एक घी या तेल का दीपक जलाएं और अगरबत्ती प्रज्वलित करें।
'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जाप करते हुए गणेश जी को फूल, दूर्वा, और मोदक अर्पित करें। उन्हें लाल चंदन, सिंदूर और फल चढ़ाएं।
दिनभर उपवास रखें या एक समय भोजन करें और संकष्टी चतुर्थी की कथा पढ़ें या सुनें।
शाम को चंद्रमा के उदय के बाद उन्हें अर्घ्य (जल चढ़ाना) दें, क्योंकि संकष्टी पर चंद्र दर्शन शुभ माना जाता है।
'जय गणेश जय गणेश' आरती गाएं और मोदक, लड्डू या अन्य प्रसाद बांटें।
'ॐ गं गणपतये नमः' या 'वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा' का 108 बार जाप करें।
चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलें, सात्विक भोजन- बिना लहसुन-प्याज के ग्रहण करें।

संकष्टी गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा 

संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक कथा भगवान गणेश की शक्ति और भक्तों के प्रति उनकी करुणा को दर्शाती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों के बीच एक बार भयंकर युद्ध छिड़ गया। देवता पराजित हो रहे थे और उनकी रक्षा के लिए कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। तब देवराज इंद्र और अन्य देवताओं ने भगवान शिव और माता पार्वती से प्रार्थना की कि वे उन्हें इस संकट से उबारें। माता पार्वती ने अपने पुत्र गणेश से इस विपदा को दूर करने की विनती की।
उस समय गणेश जी अपने वाहन मूषक पर सवार होकर युद्ध भूमि की ओर बढ़े। उनका विशाल शरीर, वक्रतुण्ड और तेजस्वी रूप देखकर राक्षस भयभीत हो गए। सिंधुरासुर नामक शक्तिशाली राक्षस ने गणेश जी पर आक्रमण करने का प्रयास किया। सिंधुरासुर ने अपनी माया से अंधेरा फैलाया और देवताओं को भ्रमित कर दिया, लेकिन गणेश जी ने अपनी बुद्धि और शक्ति से उस माया को नष्ट कर दिया। उन्होंने अपनी सूंड से सिंधुरासुर को पकड़ा और उसे धरती पर पटक दिया, जिससे उसकी शक्ति खत्म हो गई। असुर पराजित हुआ और देवताओं की रक्षा हुई। देवताओं ने गणेश जी की इस विजय को 'संकट हर चतुर्थी' के रूप में मनाने का संकल्प लिया।

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