Vat Savitri Purnima 2025: ज्येष्ठ सावित्री व्रत को वट सावित्री व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व है। यह व्रत उत्तर भारत में ज्येष्ठ मास की अमावस्या और कुछ क्षेत्रों जैसे महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह पर्व सावित्री और सत्यवान की अमर प्रेम कथा और सावित्री के पतिव्रता धर्म के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, जिसमें महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। आइए, ज्येष्ठ सावित्री व्रत 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व, पौराणिक कथा और पूजा विधि के बारे में जानते हैं।
ज्येष्ठ सावित्री व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ सावित्री व्रत मुख्य रूप से ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को उत्तर भारत में मनाया जाता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा व्रत के रूप में मनाया जाता है। जून में मनाई जाने वाली ज्येष्ठ सावित्री व्रत की तिथि और शुभ मुहूर्त जान लीजिए...
तिथि
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 11 जून 2025 को सुबह 8:54 बजे।
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 12 जून 2025 को सुबह 6:47 बजे।
शुभ मुहूर्त
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:00 बजे से 12:50 बजे तक।
विजय मुहूर्त: दोपहर 2:40 बजे से 3:30 बजे तक।
ज्येष्ठ सावित्री व्रत क्यों मनाया जाता है?
ज्येष्ठ सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और वैवाहिक सुख की कामना के लिए रखा जाता है। यह व्रत सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा से प्रेरित है, जिसमें सावित्री ने अपने तप, बुद्धिमत्ता और पतिव्रता धर्म के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। इस व्रत को करवा चौथ के समान महत्वपूर्ण माना जाता है और यह पति-पत्नी के प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक है।
वट वृक्ष की पूजा इस व्रत का मुख्य हिस्सा है, क्योंकि मान्यता है कि वट वृक्ष में त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु और शिव का वास होता है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं और कच्चा सूत लपेटकर अपने पति की दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं। यह व्रत न केवल धार्मिक, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता का भी प्रतीक है, क्योंकि यह वट वृक्ष जैसे दीर्घायु और पवित्र वृक्ष के महत्व को उजागर करता है।
ज्येष्ठ सावित्री व्रत का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
यह व्रत पति की अकाल मृत्यु के भय को दूर करता है और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति लाता है।
यह व्रत संतान सुख की कामना रखने वाली महिलाओं के लिए भी शुभ माना जाता है।
वट वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और डालियों में शिव का वास माना जाता है। इसकी पूजा से त्रिदेवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
यह व्रत आत्मसंयम, भक्ति और तप को प्रोत्साहित करता है, जिससे मन और आत्मा की शुद्धि होती है।
यह पर्व उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश) और महाराष्ट्र, गुजरात जैसे राज्यों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी के अटूट बंधन और पतिव्रता धर्म की महत्ता को दर्शाता है।
पौराणिक कथा: सावित्री और सत्यवान
ज्येष्ठ सावित्री व्रत की कथा सावित्री और सत्यवान के प्रेम और सावित्री के पतिव्रता धर्म से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, मद्रदेश के राजा अश्वपति और उनकी पत्नी मालवी को लंबे समय तक कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर तप और सावित्री देवी की उपासना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर सावित्री देवी ने उन्हें एक कन्या का वरदान दिया, जिसका नाम सावित्री रखा गया। सावित्री सुंदर, बुद्धिमान और धर्मपरायण थी। जब वह विवाह योग्य हुई तो उसने वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना।
नारद मुनि ने सावित्री के पिता को चेतावनी दी कि सत्यवान अल्पायु है और विवाह के एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। यह जानने के बाद भी सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही और सत्यवान से विवाह कर लिया। वह अपने सास-ससुर और पति की सेवा में तत्पर रहने लगी। मृत्यु की निर्धारित तिथि पर सावित्री सत्यवान के साथ जंगल गई। वहां सत्यवान लकड़ियां काटते समय अचानक मूर्छित होकर गिर पड़े। सावित्री ने उन्हें वट वृक्ष के नीचे लिटाया, तभी यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए। सावित्री उनके पीछे-पीछे चल पड़ी और अपने पति के प्राण वापस करने की प्रार्थना करने लगी। यमराज ने उसे लौटने को कहा, लेकिन सावित्री की दृढ़ता और पतिव्रता धर्म से प्रभावित होकर उन्होंने उसे तीन वर मांगने को कहा।
सावित्री ने पहले वर में अपने ससुर का खोया हुआ राज्य, दूसरे में सास-ससुर की नेत्र ज्योति और तीसरे में सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वर मांगा। यमराज ने सभी वरदानों को स्वीकार किया, लेकिन सावित्री ने तर्क दिया कि सौ पुत्रों का वरदान बिना पति के पूर्ण नहीं हो सकता। सावित्री की बुद्धिमत्ता और भक्ति से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान को जीवनदान दे दिया। सावित्री वट वृक्ष के नीचे लौटी, जहां सत्यवान जीवित हो उठे। इस घटना के बाद से वट सावित्री व्रत मनाया जाने लगा।
ज्येष्ठ सावित्री व्रत की पूजा विधि
ब्रह्म मुहूर्त में उठें। तिल और आंवले के साथ पवित्र स्नान करें। लाल या पीले रंग की साड़ी पहनें और सोलह श्रृंगार करें।
घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें और भगवान विष्णु, सावित्री-सत्यवान और वट वृक्ष की पूजा का संकल्प लें।
बांस की टोकरी में सात प्रकार के अनाज, लाल चुनरी, मौली, रोली, चावल, हल्दी, फूल, पंचामृत, फल, मिठाई, बांस का पंखा, गंगाजल, मिट्टी का घड़ा, सुपारी, पान, सिंदूर और वट सावित्री व्रत कथा की पुस्तक तैयार करें।
वट वृक्ष के पास जाएं और गंगाजल छिड़ककर उसे पवित्र करें।
वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें। सावित्री, सत्यवान और यमराज की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
धूप, दीप, फूल, हल्दी, कुमकुम और अक्षत अर्पित करें।
कच्चे सूत (मौली) को वट वृक्ष के तने पर 7, 21 या 108 बार लपेटते हुए परिक्रमा करें।
सावित्री-सत्यवान की कथा पढ़ें या सुनें। इसके बाद वट वृक्ष और सावित्री-सत्यवान की आरती करें।
पूजा के बाद बांस के पंखे से पति को हवा करें, जैसा कि सावित्री ने सत्यवान को किया था।
पूजा के बाद भीगे चने, वस्त्र और दक्षिणा ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान करें। सास और बुजुर्गों से आशीर्वाद लें।
अगले दिन (27 मई 2025) उदया तिथि में व्रत का पारण करें। पहले जल, फिर फल और अंत में सात्विक भोजन ग्रहण करें।
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