Radhashtami 2026: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। सनातन धर्म में इस एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से भक्तों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। परिवर्तिनी एकादशी को भगवान विष्णु के वामन स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। इस दिन पूजा के दौरान कुछ विशेष नियमों का पालन करने की परंपरा है। क्या आपको पता है कि परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा किस तरह करनी चाहिए और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? आइए जानते हैं।
परिवर्तिनी एकादशी पर ऐसे करें पूजा की तैयारी
एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें। इसके बाद घर के पूजा स्थान की साफ-सफाई करें। पूजा की चौकी पर पीले या साफ कपड़े का आसन बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत और पूजा का संकल्प लें। पूजा के लिए भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी दल, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य और फल अर्पित किए जाते हैं। पूजा में तुलसी का विशेष महत्व माना जाता है। ध्यान रखें कि भगवान विष्णु को अर्पित करने के लिए तुलसी दल साफ और श्रद्धापूर्वक रखें।
भगवान विष्णु का ऐसे करें पूजन
सबसे पहले भगवान विष्णु का ध्यान करें। इसके बाद उन्हें जल अर्पित करें। यदि घर में शालिग्राम या भगवान विष्णु की प्रतिमा है तो धार्मिक परंपरा के अनुसार उनका अभिषेक किया जा सकता है। इसके बाद भगवान को चंदन, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें। भगवान विष्णु को पीले रंग के वस्त्र या पीले फूल अर्पित करने की परंपरा है। पूजा के दौरान धूप और दीप जलाएं। इसके बाद भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। आप ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप कर सकते हैं।
विष्णु जी को लगाएं भोग
पूजा के बाद भगवान विष्णु को सात्विक भोग लगाएं। भोग में फल, मिठाई, पंचामृत या अन्य सात्विक सामग्री रखी जा सकती है। एकादशी व्रत रखने वाले भक्त अपनी क्षमता और परंपरा के अनुसार फलाहार करते हैं। भगवान विष्णु को भोग लगाने के बाद कुछ समय के लिए शांत भाव से बैठकर उनका ध्यान करें। इसके बाद विष्णु सहस्रनाम, विष्णु स्तुति या एकादशी व्रत कथा का पाठ करना शुभ माना जाता है।
परिवर्तिनी एकादशी की कथा पढ़ें
परिवर्तिनी एकादशी की पूजा में व्रत कथा का पाठ भी महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस एकादशी से भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि से जुड़ी कथा का संबंध बताया जाता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। भगवान ने अपने दो पग में पृथ्वी और आकाश को नाप लिया और तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। इसी प्रसंग के कारण इस एकादशी को वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
पूजा के बाद करें आरती
पूजा और कथा के बाद भगवान विष्णु की आरती करें। आरती के समय परिवार के सभी सदस्य भगवान का ध्यान करते हुए श्रद्धापूर्वक आरती में शामिल हो सकते हैं। इसके बाद भगवान को प्रणाम कर अपनी मनोकामना के लिए प्रार्थना करें।
परिवर्तिनी एकादशी पर क्या करें
इस दिन भगवान विष्णु का ध्यान और नाम जाप करना शुभ माना जाता है। जरूरतमंद व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करना भी धार्मिक रूप से पुण्यकारी माना गया है। एकादशी के दिन सात्विक आहार और संयम का पालन करने की परंपरा है। भक्त भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की भी पूजा कर सकते हैं।
परिवर्तिनी एकादशी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता में एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। परिवर्तिनी एकादशी को विशेष रूप से भगवान विष्णु के वामन स्वरूप से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत करने तथा भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्त को पुण्य की प्राप्ति होती है। परिवर्तिनी एकादशी का महत्व भगवान विष्णु की शयन अवस्था से भी जोड़ा जाता है। चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में रहते हैं और परिवर्तिनी एकादशी के समय उनके करवट बदलने की धार्मिक मान्यता प्रचलित है। इसी कारण इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा के साथ तुलसी अर्पित करते हैं, व्रत रखते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार दान-पुण्य करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि एकादशी व्रत भगवान विष्णु की भक्ति और आत्मसंयम का अवसर प्रदान करता है।
यह भी पढ़ें-
(
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)