Kartika Kalashtami 2026: कार्तिक मास में भगवान शिव के रौद्र स्वरूप भगवान काल भैरव की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। कालाष्टमी का व्रत काल भैरव को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करने तथा व्रत कथा का पाठ करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और भय से मुक्ति मिलती है। भगवान काल भैरव को काशी का कोतवाल भी कहा जाता है। मान्यता है कि वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें नकारात्मक शक्तियों से बचाते हैं। ऐसे में क्या आप जानते हैं कि काल भैरव की पूजा में व्रत कथा का पाठ क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है और इस दिन कौन-सी कथा पढ़नी चाहिए? आइए जानते हैं कालाष्टमी की व्रत कथा और उसका धार्मिक महत्व...
काल भैरव की उत्पति की कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर विवाद हुआ कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। विवाद बढ़ने पर देवताओं ने भगवान शिव से इसका समाधान करने का आग्रह किया। तभी भगवान शिव ने एक दिव्य ज्योतिर्मय स्तंभ का रूप धारण किया और दोनों देवताओं से उसका आदि और अंत खोजने को कहा। भगवान विष्णु स्तंभ का अंत खोजने के लिए नीचे की ओर गए, जबकि भगवान ब्रह्मा ऊपर की ओर चले गए। काफी प्रयास करने के बाद भी दोनों को उस स्तंभ का छोर नहीं मिला।
कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने अपनी असफलता स्वीकार कर ली, लेकिन भगवान ब्रह्मा ने अपने श्रेष्ठ होने का दावा करते हुए असत्य कह दिया कि उन्होंने स्तंभ का अंत देख लिया है। भगवान शिव उनके इस असत्य से क्रोधित हो गए। इसी समय भगवान शिव के रौद्र स्वरूप से काल भैरव प्रकट हुए। उन्होंने भगवान ब्रह्मा के अहंकार को दंडित किया। इस घटना के बाद भगवान काल भैरव को न्याय, दंड और धर्म की रक्षा करने वाले देवता के रूप में पूजा जाने लगा।
काल भैरव से जुड़ी अन्य कथा
एक अन्य प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान काल भैरव को ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए लंबे समय तक भटकना पड़ा था। भगवान ब्रह्मा के एक सिर को काटने के कारण उनके हाथ में ब्रह्मा का कपाल रह गया था। वे जहां भी जाते, वह कपाल उनके हाथ से अलग नहीं होता था। अंततः जब वे काशी पहुंचे, तो उन्हें इस दोष से मुक्ति मिली। मान्यता है कि काशी में भगवान काल भैरव का विशेष स्थान है और वे वहां आने वाले भक्तों की रक्षा करते हैं। इसी कारण काशी में उनके दर्शन को महत्वपूर्ण माना जाता है।
कालाष्टमी पर का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कालाष्टमी के दिन भगवान काल भैरव की व्रत कथा सुनने और पढ़ने से मन में साहस तथा विश्वास बढ़ता है। भक्त इस दिन भगवान से अपने जीवन की परेशानियों, भय और बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई पूजा से भगवान काल भैरव प्रसन्न होते हैं और भक्तों को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। इस दिन कथा का पाठ करते समय भगवान शिव और काल भैरव का स्मरण करना शुभ माना जाता है।
कालाष्टमी पर कैसे करे पूजा?
कालाष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान काल भैरव का ध्यान करके व्रत का संकल्प लें। पूजा के स्थान पर भगवान काल भैरव की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। उन्हें फूल, धूप, दीप और फल अर्पित करें। अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान शिव की पूजा भी कर सकते हैं। इसके बाद काल भैरव की व्रत कथा पढ़ें और उनकी आरती करें। कई भक्त इस दिन काल भैरव के मंत्रों का जाप भी करते हैं। धार्मिक परंपराओं में काले कुत्ते को भोजन कराना भी काल भैरव की सेवा से जोड़कर देखा जाता है।
व्रत में किन बातों का रखें ध्यान?