Kajari Teej: कजरी तीज का पर्व मुख्य रूप से माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की थी।
Kajari Teej: सावन के बाद भाद्रपद मास में आने वाली कजरी तीज सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखने वाला व्रत है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु और दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं और भगवान शिव तथा माता पार्वती की पूजा करती हैं। कजरी तीज को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। खास तौर पर इस व्रत का संबंध माता पार्वती की कठोर तपस्या और भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की कथा से जोड़ा जाता है। आखिर कजरी तीज क्यों मनाई जाती है और इसके पीछे कौन सी पौराणिक कथा बताई गई है? आइए जानते हैं।
कब मनाई जाती है कजरी तीज
हिंदू पंचांग के अनुसार कजरी तीज भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इसे कजली तीज, कजरी तीज और सातुड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर भारत के कई राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में इस पर्व को श्रद्धा के साथ मनाने की परंपरा है। कजरी तीज के दिन महिलाएं सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। कई स्थानों पर नीम की पूजा करने की भी परंपरा है। महिलाएं इस दिन तीज माता की कथा सुनती हैं और शाम के समय पूजा-अर्चना के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं।
कजरी तीज का धार्मिक महत्व
कजरी तीज का पर्व मुख्य रूप से माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या, अटूट श्रद्धा और संकल्प के बाद भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी कारण तीज के व्रत को माता पार्वती के तप और भगवान शिव के साथ उनके दिव्य विवाह से जोड़कर देखा जाता है। विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की कामना से यह व्रत रखती हैं, जबकि कई स्थानों पर अविवाहित कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से तीज का व्रत करती हैं।
कजरी तीज से जुड़ी माता पार्वती की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती पूर्व जन्म में राजा दक्ष की पुत्री सती थीं। सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था, लेकिन उनके पिता राजा दक्ष भगवान शिव को पसंद नहीं करते थे। एक बार राजा दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया और उसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन भगवान शिव और माता सती को नहीं बुलाया।
माता सती बिना निमंत्रण के अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गईं। वहां उन्होंने देखा कि भगवान शिव का अपमान किया जा रहा है। अपने पति का अपमान सहन न कर पाने के कारण माता सती ने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद भगवान शिव अत्यंत दुखी हो गए। माता सती ने अगले जन्म में हिमालयराज के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और उनका नाम पार्वती रखा गया। बाल्यकाल से ही माता पार्वती के मन में भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा थी। उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या शुरू कर दी।
माता पार्वती की तपस्या अत्यंत कठिन थी। उन्होंने कई वर्षों तक कठोर व्रत और साधना की। तपस्या के दौरान उन्होंने अन्न का त्याग तक कर दिया और भगवान शिव का निरंतर ध्यान किया। माता पार्वती की इस कठोर साधना का उद्देश्य केवल भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना था। धार्मिक कथाओं में बताया गया है कि माता पार्वती की तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने माता पार्वती की इच्छा स्वीकार कर ली। इसके बाद दोनों का विवाह हुआ। इसी कथा के कारण तीज के व्रत को माता पार्वती की भक्ति, तपस्या और भगवान शिव के साथ उनके विवाह से जोड़ा जाता है।
कजरी तीज की कथा में क्यों आता है चंद्रमा का प्रसंग
कजरी तीज की पूजा में चंद्रमा को भी विशेष महत्व दिया जाता है। कई क्षेत्रों में महिलाएं पूरे दिन व्रत रखने के बाद रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने की यह परंपरा विशेष रूप से कजरी तीज के लोकाचार का हिस्सा है। धार्मिक मान्यताओं में चंद्रमा को मन और शीतलता का कारक माना गया है। इसलिए तीज के अवसर पर चंद्रमा की पूजा और अर्घ्य देने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है। अलग-अलग क्षेत्रों में कजरी तीज की पूजा विधि और कथा में कुछ स्थानीय अंतर देखने को मिलते हैं।
कजरी तीज पर की जाती है शिव-पार्वती की पूजा
कजरी तीज के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विशेष विधान माना जाता है। महिलाएं सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और पूजा स्थल को साफ करके शिव-पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करती हैं। इसके बाद भगवान शिव को जल, दूध, बेलपत्र और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करने की भी परंपरा है। कई स्थानों पर महिलाएं मेहंदी लगाती हैं, नए वस्त्र और आभूषण पहनती हैं तथा तीज के लोकगीत गाती हैं। पूजा के दौरान कजरी तीज की कथा सुनने की परंपरा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
कजरी तीज में नीम की पूजा की परंपरा
कजरी तीज की पूजा में कई क्षेत्रों में नीम के पेड़ का भी विशेष महत्व माना जाता है। महिलाएं नीम की टहनी या पेड़ की पूजा करती हैं और उसके आसपास दीपक जलाती हैं। कुछ स्थानों पर नीम की पत्तियों से प्रतीकात्मक रूप से तीज माता का स्वरूप बनाकर पूजा की जाती है। यह परंपरा मुख्य रूप से उत्तर भारत के ग्रामीण और पारंपरिक क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलती है। कजरी तीज के लोकपर्व स्वरूप में नीम पूजन और तीज के गीतों का विशेष स्थान रहा है।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)