Kajari Teej: कजरी तीज का पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए खास माना जाता है। इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं, मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं और कई जगहों पर झूला झूलने की परंपरा भी निभाई जाती है। सावन के बाद आने वाले इस पर्व पर झूले, लोकगीत और महिलाओं की सामूहिक खुशियां इसकी पहचान बन जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कजरी तीज पर झूला झूलने की परंपरा आखिर शुरू कैसे हुई? इसके पीछे सिर्फ सावन की हरियाली और मौसम की खूबसूरती है या फिर इसका कोई धार्मिक संबंध भी है? आइए जानते हैं कजरी तीज पर झूला झूलने की परंपरा और इसके पीछे जुड़ी मान्यताओं के बारे में...
कजरी तीज पर झूला झूलने की परंपरा
कजरी तीज के मौके पर कई जगहों पर पेड़ों पर झूले लगाए जाते हैं। महिलाएं और युवतियां सज-धजकर इन झूलों पर झूलती हैं और कजरी गीत गाती हैं। खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में यह परंपरा आज भी काफी उत्साह के साथ निभाई जाती है। दरअसल, कजरी तीज सावन-भाद्रपद के उस समय आती है जब मौसम में हरियाली छाई रहती है। बारिश के बाद पेड़-पौधों की डालियां हरी-भरी हो जाती हैं और वातावरण में ठंडक रहती है। ऐसे में पेड़ों पर झूला डालकर झूलना मौसम और लोकजीवन से जुड़ी एक पुरानी परंपरा बन गई।
मां पार्वती से जुड़ी है मान्यता
कजरी तीज का धार्मिक संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। लंबे समय तक तप करने के बाद भगवान शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी वजह से कजरी तीज पर महिलाएं मां पार्वती की पूजा करती हैं और अपने वैवाहिक जीवन में सुख-शांति तथा पति की लंबी आयु की कामना करती हैं। झूला झूलने की परंपरा को भी इसी पर्व के उल्लास और माता पार्वती की आराधना से जोड़कर देखा जाता है।
हरियाली और झूले का खास संबंध
कजरी तीज के समय चारों तरफ हरियाली दिखाई देती है। पेड़ों की मजबूत डालियों पर रस्सी या कपड़े से झूले तैयार किए जाते हैं। माना जाता है कि प्रकृति के इस सुंदर रूप के बीच झूला झूलना पर्व की खुशी को बढ़ाता है। पुराने समय में महिलाओं के लिए यह त्योहार अपनी सहेलियों और परिवार की दूसरी महिलाओं के साथ समय बिताने का भी अवसर होता था। वे झूला झूलते हुए कजरी गीत गाती थीं। इन गीतों में प्रेम, विरह, मायके की याद और सावन की भावनाओं को शब्द दिए जाते थे।
कजरी गीतों के साथ झूलने की परंपरा
कजरी तीज पर झूला झूलने की परंपरा केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रही है। इसके साथ कजरी लोकगीतों की भी खास परंपरा जुड़ी हुई है। महिलाएं झूले पर बैठकर सामूहिक रूप से कजरी गीत गाती हैं। इन गीतों में अक्सर सावन के मौसम, पति के प्रति प्रेम, मायके की याद और जीवन की भावनाओं का वर्णन मिलता है। यही वजह है कि कई क्षेत्रों में कजरी तीज को लोकगीत और लोकसंस्कृति से जोड़कर भी देखा जाता है।
मायके में झूला झूलने की परंपरा
कजरी तीज से जुड़ी एक खास सामाजिक परंपरा यह भी है कि शादीशुदा महिलाएं इस पर्व पर मायके जाती हैं। पुराने समय में बेटियों का अपने मायके जाना और परिवार के साथ त्योहार मनाना इस पर्व का अहम हिस्सा माना जाता था। मायके में सहेलियों और परिवार की महिलाओं के साथ झूला झूलना, गीत गाना और त्योहार मनाना महिलाओं के लिए खुशी का अवसर होता था। इसी वजह से कजरी तीज के झूले को मायके की याद और सावन की खुशियों से भी जोड़ा जाता है।
झूला क्यों माना जाता है खास?
कजरी तीज पर झूला झूलने की कोई एक निश्चित धार्मिक विधि नहीं बताई गई है, लेकिन लोकपरंपरा में इसे पर्व के उत्सव का हिस्सा माना गया है। झूले की गति और सावन का खुशनुमा वातावरण इस त्योहार को आनंद और उमंग से भर देता है। कई क्षेत्रों में माना जाता है कि कजरी तीज के दिन महिलाओं का एक साथ झूला झूलना और कजरी गीत गाना देवी-देवताओं की आराधना के साथ लोकपरंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम है।
आज भी कायम है परंपरा
समय बदलने के साथ त्योहार मनाने के तरीके जरूर बदले हैं, लेकिन कजरी तीज पर झूला झूलने की परंपरा आज भी कई इलाकों में कायम है। शहरों में भी इस अवसर पर महिलाएं सामूहिक रूप से झूला कार्यक्रम आयोजित करती हैं। इस तरह कजरी तीज का झूला सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सावन की हरियाली, महिलाओं की भावनाओं, लोकगीतों और मां पार्वती की आराधना से जुड़ी एक पुरानी लोकपरंपरा है। यही वजह है कि कजरी तीज आते ही पेड़ों पर पड़ने वाले झूले और उनकी आवाज के साथ गूंजते कजरी गीत आज भी इस पर्व की खास पहचान बने हुए हैं।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)