Vidyarambh Sanskar : हिंदू धर्म में किसी व्यक्ति के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक कई तरह के संस्कार निभाए जाते हैं। ऐसा ही एक संस्कार है विद्यारंभ संस्कार।
Vidyarambh Sanskar : हिंदू धर्म में किसी व्यक्ति के जीवन में जन्म से लेकर मृत्यु तक कई तरह के संस्कार निभाए जाते हैं। ऐसा ही एक संस्कार है विद्यारंभ संस्कार। यह एक शुभ समारोह है जो बच्चे की औपचारिक शिक्षा की शुरुआत का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में इसे बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है और इसे अक्षर अभ्यासम् के नाम से भी जाना जाता है। कर्नाटक और केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में इस उत्सव को एझुथिनिरुथु कहा जाता है।
विद्यारंभ संस्कार क्या है?
विद्यारंभ संस्कार भारतीय हिंदू परिवारों में सीखने की प्रक्रिया की शुरुआत के तौर पर मनाया जाने वाला एक रिवाज है। यह रस्म विजयादशमी के त्योहार पर निभाई जाती है। इस शुभ दिन पर, चार से पांच साल की उम्र के बच्चों को ज्ञान, संगीत, नृत्य और लोक कलाओं की दुनिया से परिचित कराया जाता है।
दक्षिण भारत में मनाया जाने वाला एक खास रिवाज
भारतीय परंपरा में बच्चे की शिक्षा शुरू करने के लिए एक खास रस्म बताई गई है जिसे विद्यारंभ संस्कार कहते हैं। संस्कृत में, विद्या शब्द का अर्थ है 'ज्ञान' और आरंभ का अर्थ है 'नई शुरुआत'। यह समारोह बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है, खासकर दक्षिण भारत में। इस दिन भगवान गणेश और देवी शारदा की पूजा की जाती है। इसके अलावा, बच्चे अपने शिक्षकों से आशीर्वाद लेते हैं और उन्हें गुरु दक्षिणा देते हैं। लोग अपने बच्चों को शिक्षा की दुनिया से परिचित कराने के लिए मंदिरों में भी जाते हैं। केरल के थुंचन परम्बु मंदिर और कर्नाटक के कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर में होने वाले *विद्यारंभ* समारोह खास तौर पर मशहूर हैं।
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विद्यारंभ की रस्म कैसे निभाई जाती है
विद्यारंभ के दिन, बच्चों को सुबह नहलाया जाता है और पारंपरिक कपड़े पहनाए जाते हैं। भगवान विष्णु, देवी सरस्वती और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इसके बाद, सीखने की प्रक्रिया शुरू होती है। विद्यारंभ समारोह के नाम से जानी जाने वाली यह रस्म किसी गुरु या पुजारी द्वारा संपन्न कराई जाती है। इस रस्म में, बच्चे से सबसे पहले रेत या चावल के दानों पर 'ॐ ह्रीं श्रीं गणपतये नमः' मंत्र लिखने के लिए कहा जाता है। माना जाता है कि रेत पर लिखना अभ्यास का प्रतीक है जबकि चावल के दानों पर लिखना ज्ञान प्राप्ति का प्रतीक है। इसके बाद, शिक्षक सोने के तार से बच्चे की जीभ पर वही मंत्र'ॐ ह्रीं श्रीं गणपतये नमः' लिखते हैं। मान्यता है कि औपचारिक शिक्षा शुरू होने से पहले सोने से बच्चे की जीभ पर मंत्र लिखने से देवी सरस्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस रस्म के पूरा होने पर, छात्र द्वारा अन्य बच्चों को पढ़ाई-लिखाई से जुड़ी चीज़ें जैसे स्लेट, पेंसिल आदि बांटने की परंपरा है।
विद्यारंभ संस्कार के लिए मंत्र
गणपति पूजा मंत्र - ॐ गणानां त्वा गणपति हवामहे, प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे, निधीनां त्वा निधिपति हवामहे, वसोमम। आहमजानि गभर्धमात्वमजासि गभर्धम्। ॐ गणपतये नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि॥
सरस्वती पूजा मंत्र - ॐ पावका नः सरस्वती, वाजेभिवार्जिनीवती। यज्ञं वष्टुधियावसुः।
विद्यारंभ संस्कार का महत्व
विद्यारंभ संस्कार के ज़रिए बच्चे की रुचि ज्ञान और सीखने की ओर मोड़ी जाती है। बच्चे में सामाजिक और नैतिक गुण विकसित करने के लिए प्रार्थनाएँ भी की जाती हैं। इस समारोह के दौरान बच्चे को कलम, स्याही की दवात और लिखने की तख्ती दी जाती है, जो लिखित भाषा से उनके औपचारिक परिचय की शुरुआत का प्रतीक है।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)