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Shani Jayanti: शनि जयंती पर करें इस विधि से पूजा, शनि देव को लगाएं इन चीजों का भोग

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Lord Shani Dev: शनि देव सूर्य देव और छाया माता के पुत्र हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, शनि देव का जन्म ज्येष्ठ अमावस्या को हुआ था।

Shani Jayanti:
Shani Jayanti: शनि जयंती हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो भगवान शनि देव के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह दिन कर्म, न्याय और अनुशासन के देवता शनि महाराज की पूजा के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को शनि जयंती मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह 16 मई, शनिवार को पड़ रही है, जब अमावस्या तिथि प्रातः 5:11 बजे से शुरू होकर अगले दिन तक रहेगी। इस दुर्लभ संयोग में शनिवार और अमावस्या दोनों शनि देव से जुड़े होने के कारण पूजा का महत्व और बढ़ जाता है।

इस दिन विधिवत पूजा करने से शनि दोष, साढ़े साती और महादशा के कष्टों से मुक्ति मिल सकती है। भक्तों का विश्वास है कि शनि देव प्रसन्न होकर जीवन में स्थिरता, न्याय और सफलता प्रदान करते हैं। आइए जानते हैं शनि जयंती की महत्ता, पूजा विधि और भोग की सामग्री के बारे में...

शनि जयंती का महत्व और कथा

शनि देव सूर्य देव और छाया माता के पुत्र हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, शनि देव का जन्म ज्येष्ठ अमावस्या को हुआ था। वे कर्मफल के आधार पर जीवों को फल देते हैं। शनि की दृष्टि कठोर मानी जाती है, लेकिन सच्ची भक्ति और सत्कर्म से वे आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं।

शनि जयंती पर पूजा करने का विशेष महत्व है क्योंकि इस दिन शनि की ऊर्जा अत्यधिक सक्रिय रहती है। इस अवसर पर किए गए उपाय शनि के प्रकोप को शांत करते हैं और सकारात्मक फल प्रदान करते हैं। कई ज्योतिष शास्त्रों में इसे साढ़े साती या शनि महादशा से पीड़ित लोगों के लिए उत्तम अवसर बताया गया है। इस दिन व्रत रखने, दान करने और मंत्र जाप से पुण्य की प्राप्ति होती है।

 

 Shani dev : 

शनि जयंती पूजा की तैयारी

पूजा से पहले कुछ तैयारी जरूरी है। प्रातःकाल स्नान कर साफ-सुथरे कपड़े पहनें। यदि संभव हो तो काले या नीले रंग के वस्त्र धारण करें, क्योंकि ये शनि देव को प्रिय हैं। पूजा स्थल को साफ करें और शनि देव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। पूजा सामग्री में शामिल रखें काला तिल, सरसों का तेल, काली उड़द दाल, गुड़, फूल, धूप, दीपक और नैवेद्य।

मंदिर में पूजा करने वाले भक्त शनि मंदिर या नवग्रह मंदिर जा सकते हैं। घर पर पूजा करने वालों को दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठना चाहिए। पूजा शुरू करने से पहले गणेश जी की पूजा अवश्य करें।

शनि जयंती की पूजा विधि

सबसे पहले संकल्प लें कि आप शनि देव की प्रसन्नता के लिए पूजा कर रहे हैं। फिर कलश स्थापना करें। शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाएं, जिसे तैलाभिषेक कहा जाता है। तेल चढ़ाने से शनि देव की क्रूर दृष्टि शांत होती है।

काले तिल, काली उड़द और गुड़ चढ़ाएं। नीले या काले फूल अर्पित करें। दीपक जलाएं और अगरबत्ती लगाएं। शनि चालीसा, शनि स्तोत्र या शनि मंत्र का जाप करें। प्रमुख मंत्र है ओं शं शनैश्चराय नमः। इसे 108 बार या अधिक जपना शुभ है।

कुछ भक्त पीपल के वृक्ष की पूजा भी करते हैं, क्योंकि शनि देव पीपल से जुड़े माने जाते हैं। पूजा के अंत में आरती करें और प्रसाद वितरित करें। शाम के समय पूजा अधिक प्रभावी मानी जाती है।

 

Shani Jayanti:

शनि देव को लगाएं इन चीजों का भोग

काले तिल के लड्डू: काले तिल को गुड़ के साथ मिलाकर बनाए गए लड्डू शनि देव को अत्यंत प्रिय हैं। ये स्वास्थ्य और शक्ति प्रदान करते हैं।

काली उड़द दाल की खिचड़ी: सादी खिचड़ी बनाकर गुड़ के साथ चढ़ाएं। यह भोग सादगी और अनुशासन का प्रतीक है।

मीठी पूड़ी या गुलगुले: गुड़ मिलाकर बनाई पूड़ियां या गुलगुले शनि देव को प्रसन्न करते हैं।

गुलाब जामुन या काला जाम: काले रंग के मिठाई का भोग भी उत्तम है।

इनके अलावा काले चने, गुड़ और सरसों के तेल से संबंधित वस्तुएं भी चढ़ाई जा सकती हैं। भोग लगाते समय शुद्ध मन और मौन रखें। भोग लगाने के बाद थोड़ी देर रखकर फिर प्रसाद रूप में ग्रहण करें।

भोग लगाने का नियम यह है कि सभी वस्तुएं शुद्ध और सात्विक हों। मांसाहारी या तामसिक चीजें बिल्कुल न चढ़ाएं।

शनि जयंती पर उपाय और दान

पूजा के साथ कुछ उपाय करने से लाभ बढ़ता है। शनि देव को तेल का दान करें। गरीबों को काला कंबल, जूते, लोहे की वस्तुएं, काले तिल और उड़द दान करें। काले कुत्ते या गाय को भोजन कराएं।

हनुमान जी की पूजा भी शनि दोष निवारण में सहायक है। दक्षिणमुखी हनुमान की पूजा करें और तेल चढ़ाएं। शनि जयंती पर व्रत रखना भी शुभ है। व्रत में फलाहार या एक समय भोजन कर सकते हैं।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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