Vaishnav Diksha: आज उस दीक्षा और पंच संस्कार को 36 वर्ष पूरे हो गए हैं। पीछे मुड़कर देखने पर यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि गुरु-कृपा, आचार्य परंपरा और भगवान की विशेष अनुकंपा का प्रतीक दिखाई देती है।
Diksha Tithi Mystery: अयोध्या की महिमा जितनी भी कही जाए, उतनी ही कम है। यह पावन नगरी भगवान श्रीराम की जन्मभूमि होने के साथ-साथ संतों, आचार्यों और भक्तों की तपोभूमि भी रही है। आज का दिन इसी आध्यात्मिक परंपरा और गुरु-कृपा के कारण विशेष महत्व रखता है। आज एक ऐसा सुंदर संयोग बना है, जिसे स्मरण करते हुए मन श्रद्धा और कृतज्ञता से भर जाता है।
आज हमारे परमाचार्य, परम पूज्य गुरु रामानुजाचार्य वेदांत मार्तंड श्री स्वामी रामनारायणाचार्य जी महाराज की 41वीं पुण्यतिथि है। वे हमारे पूज्य गुरुदेव के भी गुरु थे। आज ही के दिन उन्होंने इस नश्वर संसार से विदा लेकर भगवान के परमधाम, वैकुंठ की ओर प्रस्थान किया था। उनके जीवन, साधना और आचार्य परंपरा ने अनेक भक्तों को भगवान की भक्ति और शरणागति का मार्ग दिखाया।
इसी दिन हुआ पंच संस्कार
इस दिन का महत्व केवल परमाचार्य की पुण्यतिथि तक सीमित नहीं है। इसी पावन तिथि से लगभग 36 वर्ष पूर्व, वर्ष 1990 में श्रावण शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को इस दास का वैष्णव दीक्षा संस्कार हुआ था। पूज्य स्वामी जी महाराज के द्वारा पंच संस्कार प्रदान किए गए और इसी के साथ जीवन को भगवान की भक्ति तथा गुरु-परंपरा के प्रति समर्पित करने का अवसर प्राप्त हुआ।
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अधूरी इच्छा भी बनी गुरु-कृपा
दास की इच्छा थी कि पंच संस्कार स्वयं परमाचार्य जी महाराज से प्राप्त हों और उन्हीं से समाश्रयण का सौभाग्य मिले। लेकिन परमाचार्य जी का परमपद गमन पहले ही हो चुका था। उनके स्थान पर वर्तमान आचार्य चरण विराजमान थे। उन्हीं की कृपा और आशीर्वाद से पंच संस्कार संपन्न हुआ। यही बात इस संयोग को और भी विशेष बना देती है कि जिस दिन परमाचार्य जी की पुण्यतिथि आती है, उसी तिथि पर दास को वैष्णव संस्कार प्राप्त हुआ था।
36 वर्षों की गुरु-कृपा
आज उस दीक्षा और पंच संस्कार को 36 वर्ष पूरे हो गए हैं। पीछे मुड़कर देखने पर यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि गुरु-कृपा, आचार्य परंपरा और भगवान की विशेष अनुकंपा का प्रतीक दिखाई देती है। जीवन में गुरु से प्राप्त संस्कार मनुष्य को आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं और उसे भगवान की शरण में स्थिर करते हैं।
तिथि बनी स्मरण और समर्पण का अवसर
इस प्रकार आज का दिन परमाचार्य जी महाराज की पुण्यतिथि के स्मरण के साथ-साथ अपने वैष्णव जीवन के 36 वर्षों को याद करने का भी अवसर है। यह सुंदर संयोग मन में यही भाव जगाता है कि गुरु और आचार्य की कृपा से मिला संस्कार जीवन की सबसे बड़ी आध्यात्मिक संपत्ति है। इस पावन अवसर पर परमाचार्य जी महाराज के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए यही प्रार्थना है कि गुरु-परंपरा की कृपा सदैव बनी रहे और जीवन भगवान की भक्ति, सेवा तथा समर्पण में निरंतर आगे बढ़ता रहे।