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Swami Ashutoshanand Giri Ji: घर में सुख-समृद्धि लाने के लिए क्या करें? स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी ने बताया उपाय

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज
सार

Sanatan Tradition: जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, धर्म और मर्यादा का पालन करते हैं तथा किसी भी प्रकार के अन्याय का विरोध करते हैं, तब उस घर में भगवान की कृपा बनी रहती है।
 

Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj
Spiritual Knowledge: स्वामी आशुतोषानंद गिरि ने अपने प्रवचन में समझाया कि घर में सुख-समृद्धि केवल धन से नहीं आती, बल्कि परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम, सम्मान, सहयोग और धर्म के पालन से आती है। उन्होंने एक छोटी-सी कथा के माध्यम से बताया कि यदि घर के लोग ही एक-दूसरे के विरोध में खड़े हो जाएँ, तो परिवार का सुख और शांति समाप्त हो जाती है। इसलिए सबसे पहले परिवार में एकता और विश्वास बनाए रखना आवश्यक है।

स्वामी जी ने एक उदाहरण दिया कि एक लकड़हारा कुल्हाड़ी लेकर पेड़ को काटने पहुंचा। पेड़ ने पूछा कि मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, फिर तुम मुझे क्यों काट रहे हो?" कुल्हाड़ी ने उत्तर दिया कि तुमने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा, लेकिन मेरे पीछे तुम्हारी ही जाति की लकड़ी लगी हुई है। उसी के सहारे मैं तुम्हें काट पा रहा हूं।" इस कथा का संदेश यह है कि किसी भी परिवार, समाज या राष्ट्र को सबसे अधिक नुकसान तब होता है, जब उसके अपने ही लोग उसके विरुद्ध खड़े हो जाते हैं। बाहरी शत्रु उतना नुकसान नहीं पहुंचा सकते, जितना अपने लोगों की फूट पहुंचा देती है।

परिवार में नारी का सम्मान आवश्यक

स्वामी जी ने कहा कि जिस घर में महिलाओं का सम्मान नहीं होता, वहां सुख-समृद्धि टिक नहीं सकती। यदि किसी महिला पर अत्याचार हो रहा हो और घर की दूसरी महिलाएं भी उसके समर्थन में न खड़ी हों, तो वह परिवार धीरे-धीरे अशांति की ओर बढ़ने लगता है। दादी, मां, चाची, बुआ, मौसी और परिवार की सभी महिलाओं का कर्तव्य है कि वे अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएं और परिवार में प्रेम तथा न्याय का वातावरण बनाए रखें।

सनातन परंपरा में हर मार्ग का महत्व

सनातन संस्कृति बहुत विशाल है। हर व्यक्ति की रुचि, क्षमता और स्वभाव अलग होता है। कोई योग में आनंद पाता है, कोई ज्ञान में, कोई सत्संग में, कोई भजन-कीर्तन में और कोई सेवा में। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई मार्ग बड़ा है और कोई छोटा। भगवान की दृष्टि में सभी मार्ग समान हैं, यदि उनमें सच्ची श्रद्धा और निष्ठा हो। स्वामी जी ने कहा कि कुछ संत ध्यान और समाधि का मार्ग अपनाते हैं, कुछ अध्ययन करते हैं, कुछ प्रवचन देते हैं और कुछ समाज सेवा में जीवन लगा देते हैं। सभी अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं। इसलिए किसी की साधना को छोटा नहीं समझना चाहिए।

द्रौपदी की मर्यादा रक्षा का प्रसंग

इसके बाद स्वामी जी ने द्रौपदी और श्रीकृष्ण का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब श्रीकृष्ण दूर द्वारका में थे। लेकिन जैसे ही द्रौपदी ने पूरे विश्वास के साथ भगवान को पुकारा, उन्होंने उसकी लाज की रक्षा की। यह घटना बताती है कि जो व्यक्ति धर्म और मर्यादा की रक्षा करता है, संकट के समय भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।

पांडवों को लेकर भगवान का संदेश

स्वामी जी ने आगे बताया कि भगवान ने यह भी कहा कि यदि किसी स्त्री का अपमान हो रहा हो और उसके अपने परिवार के लोग चुप रहें, तो यह भी बहुत बड़ा अपराध है। केवल अपराध करने वाला ही दोषी नहीं होता, बल्कि अन्याय देखकर मौन रहने वाला भी जिम्मेदार माना जाता है। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि परिवार के हर सदस्य का कर्तव्य है कि वह अन्याय के विरुद्ध खड़ा हो।

भारतीय नारी की भावना

उन्होंने कहा कि भारतीय नारी अपने सुहाग को सबसे अधिक महत्व देती है। वह वर्ष भर अनेक व्रत और पूजा अपने पति की लंबी आयु, सुख और परिवार की खुशहाली के लिए करती है। उसके लिए केवल वस्त्र या आभूषण नहीं, बल्कि पति का साथ और परिवार की सुरक्षा सबसे बड़ा धन होता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में सुहाग और वैवाहिक जीवन को विशेष सम्मान दिया गया है।

सुख-समृद्धि का सच्चा उपाय

स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज ने अंत में कहा कि घर में सुख-समृद्धि लाने का सबसे बड़ा उपाय है परिवार में प्रेम, एकता, नारी का सम्मान, धर्म का पालन और एक-दूसरे के प्रति सहयोग की भावना। जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, धर्म और मर्यादा का पालन करते हैं तथा किसी भी प्रकार के अन्याय का विरोध करते हैं, तब उस घर में भगवान की कृपा बनी रहती है और वहीं सच्चा सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।

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