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God Idol: क्या पत्थर की मूर्ति में होते हैं भगवान? जानें क्या कहते हैं स्वामी चिन्मयानंद बापू

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी चिन्मयानंद बापू
सार

Spiritual Thoughts: भगवान किसी सीमित आकार या वस्तु में बंधे नहीं हैं। मूर्ति, मंदिर या नाम केवल माध्यम हैं, असली संबंध मन और श्रद्धा का होता है। भगवान बाहर नहीं, बल्कि देखने वाले के भाव और दृष्टि में प्रकट होते हैं।
 

Swami Chinmayanand Bapu
Spiritual Knowledge: भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में यह प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या पत्थर की मूर्ति में भगवान होते हैं या नहीं। कई लोग मंदिर जाकर मूर्ति को सिर्फ एक पत्थर या आकृति मान लेते हैं, जबकि भक्त उसे ईश्वर का स्वरूप मानकर पूजते हैं। इसी विषय को सरल और भावपूर्ण तरीके से समझाते हुए संत स्वामी चिन्मयानंद बापू जी के विचारों में यह बात सामने आती है कि भगवान बाहर नहीं, बल्कि देखने वाले के भाव और दृष्टि में प्रकट होते हैं।

रामायण में वर्णन मिलता है कि जब हनुमानजी लंका गए थे, तो उन्होंने वहाँ कई अद्भुत दृश्य देखे। वहाँ राक्षसी वातावरण के बीच भी कहीं न कहीं भगवान श्रीराम के नाम की उपस्थिति थी। यह प्रसंग यह संकेत देता है कि ईश्वर का नाम और उसकी सत्ता किसी एक स्थान तक सीमित नहीं रहती। लंका जैसी जगह में भी भक्ति और प्रभु का स्मरण मौजूद था। इससे यह समझ आता है कि भगवान का नाम और उनका प्रभाव हर जगह फैल सकता है, यदि कोई उसे अनुभव करना चाहे।

नाम और भक्ति की शक्ति

हनुमानजी के अनुभव से यह बात स्पष्ट होती है कि भगवान केवल मूर्ति में नहीं, बल्कि नाम, स्मरण और भक्ति में भी प्रकट होते हैं। “राम” नाम जहाँ लिखा है, वहाँ केवल अक्षर नहीं होते, बल्कि उस भाव की शक्ति होती है जो भक्त के मन को जोड़ती है। कई लोग मंदिर जाते हैं, मूर्ति देखते हैं, लेकिन उनके भीतर भक्ति का भाव नहीं होता। ऐसे में वे भगवान को महसूस नहीं कर पाते। इसका कारण भगवान की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि देखने वाले की दृष्टि और मन की अवस्था होती है।

मूर्ति और श्रद्धा का संबंध

मूर्ति पूजा को लेकर समाज में अलग-अलग विचार मिलते हैं। कुछ लोग इसे केवल पत्थर मानते हैं, जबकि श्रद्धालु इसे भगवान का साकार रूप मानते हैं। स्वामी चिन्मयानंद बापू जी के अनुसार मूर्ति स्वयं भगवान नहीं होती, लेकिन वह भगवान को याद करने का माध्यम बन जाती है। जैसे कोई तस्वीर हमें किसी प्रिय व्यक्ति की याद दिलाती है, वैसे ही मूर्ति भक्त के मन में ईश्वर की भावना जगाती है। जब श्रद्धा होती है, तब वही मूर्ति दिव्यता का अनुभव कराती है।

देखने का दृष्टिकोण ही वास्तविकता 

यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि संसार को देखने का नजरिया ही अनुभव को बदल देता है। यदि मन में श्रद्धा और विश्वास है, तो पत्थर की मूर्ति भी भगवान का रूप लगती है, लेकिन यदि मन में केवल संदेह है, तो जीवित चेतना भी केवल वस्तु जैसी प्रतीत होती है। इसलिए कहा जाता है कि भगवान हर जगह हैं, लेकिन उन्हें देखने के लिए “भक्त की आंख” चाहिए। बिना भाव के सब कुछ सामान्य दिखाई देता है।

दृष्टि और भावना में प्रकट होते हैं भगवान

अंत में यह समझना जरूरी है कि भगवान किसी सीमित आकार या वस्तु में बंधे नहीं हैं। मूर्ति, मंदिर या नाम केवल माध्यम हैं, असली संबंध मन और श्रद्धा का होता है। स्वामी चिन्मयानंद बापू जी का संदेश यही है कि भगवान बाहर नहीं छिपे हैं, बल्कि हमारी दृष्टि और भावना में प्रकट होते हैं। जब मन शुद्ध और भावपूर्ण होता है, तब हर पत्थर में भी दिव्यता दिखाई देने लगती है।

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