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Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj: कब हुआ था स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज जी का जन्म, जानें यहां...

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Mahamandleshwar Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj: श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज का जन्म बिहार राज्य के विश्वास पुर गांव में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे भक्ति और प्रखर त्याग से ओतप्रोत थे।

Mahamandleshwar Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj
Mahamandleshwar Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj: श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज का जन्म बिहार राज्य के विश्वास पुर गांव में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे भक्ति और प्रखर त्याग से ओतप्रोत थे। उनका त्याग इतना प्रबल था कि सच्चे ज्ञान की खोज में उन्होंने घर, परिवार और भौतिक अध्ययन को छोड़ दिया और स्वामी राम बालक दास जी के मार्गदर्शन में महर्षि शाही स्वामी जी ने साधना के रहस्य को जानकर संत सेवा और योग साधना में लीन हो गए। 

14 वर्षों तक लगातार किए वेदांत का अध्यन

श्रुति के कथन "ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः" और विवेकानंद के कथन "मनुष्य का मस्तिष्क अनंत ज्ञान का भंडार है" से प्रभावित होकर उन्होंने अनंत ज्ञान की खोज शुरू कर दी। परन्तु आपकी शिक्षा पूर्ण न होने के कारण आप हरिद्वार पहुँच गए जहाँ आपने पुरानी झाड़ी सप्त सरोवर में स्वामी भरतानंद जी महाराज से लघु सिद्धांत कुमौदि तर्क संग्रह एवं सांख्य दर्शन का अध्ययन किया तथा पुनः उच्च शिक्षा के लिए काशी आ गए जहां पूज्य गुरुदेव की कृपा से आपने कैलाश मठ में रहकर 14 वर्षों तक लगातार न्याय व्याकरण एवं वेदान्त का अध्ययन किया। 

शास्त्रार्थ में स्वर्ण पदक से हैं सम्मानित

अध्ययन के दौरान आपको कई बार शास्त्रार्थ प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। तथा एक बार तो आपने भारत में प्रथम स्थान भी प्राप्त किया। नेट (जेआरएफ) उत्तीर्ण करने के पश्चात आप कोलकाता में स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हुए, परन्तु आपका मन वैराग्य की ओर प्रवृत्त था और मार्च 2014 में शिवरात्रि के दिन आपने काशी में वैराग्य धारण कर लिया, एक सन्यासी को नया जीवन मिलता है। 

स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज इन कथाओं का करते हैं प्रसार

इसीलिए शिवरात्रि के दिन आपका जन्मदिन मनाया जाता है। संन्यास के पश्चात आपने अपने कर्तव्य का परित्याग नहीं किया, अपितु अधिक उत्साह एवं महान उत्तरदायित्व के साथ आपने पूज्य गुरुदेव की हार्दिक अभिलाषा से सम्पूर्ण नर-नारायण की सेवा करने की भावना से कथा क्षेत्र को धर्म प्रचार का सशक्त माध्यम माना। तब से लेकर अब तक आप सम्पूर्ण भारतवर्ष में श्री राम कथा, श्रीमद्भागवत कथा, देवी भागवत कथा, श्री गीता ज्ञान यज्ञ एवं शिव महापुराण की कथाओं की धारा का निरंतर प्रसार कर रहे हैं।

शास्त्र में क्या है गुरु का महत्व

शास्त्रों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर, ईश्वर के विभिन्न स्वरूपों के रूप में स्वीकार किया गया है। गुरु ब्रह्मा हैं, क्योंकि वे शिष्यों को गढ़ते हैं, उन्हें नया जन्म देते हैं। गुरु विष्णु भी हैं, क्योंकि वे शिष्य की रक्षा करते हैं। गुरु स्वयं महेश्वर भी हैं, क्योंकि वे शिष्य के सभी दोषों का नाश करते हैं। संत कबीर कहते हैं, "हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रूठे नहीं ठौर" अर्थात् जब ईश्वर रुष्ट होते हैं, तो शरण ही रक्षा कर सकती है, परन्तु जब गुरु रुष्ट होते हैं, तो कहीं भी शरण मिलना संभव नहीं होता। "सद्गुरु की महिमा अनंत है, गुरु ने अनंत उपकार किए हैं। गुरु के पास अनंत आंखें हैं और उन्होंने अनंत दर्शन कराए हैं।

गुरु की महिमा अनंत है। उन्होंने अपने शिष्य पर अनंत उपकार किए हैं। उन्होंने अपने शिष्य की सांसारिक इच्छाओं से बंद आंखें ज्ञान के दीपक से खोली हैं और अनंत ब्रह्म तत्व का दर्शन कराया है। ऐसे गुरु को हम नमन करते हैं।

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