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Swami Yogeshwaracharya Ji Maharaj: भगवान के कितने हैं सहायक? स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज ने बताया रहस्य

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज
सार

Power of Devotion: भगवान के चरणों में समर्पण ही वह शक्ति है, जिसके कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान पाता है और परमात्मा के साथ अपने संबंध को अनुभव कर सकता है। यही भगवान की भक्ति का सबसे बड़ा रहस्य है।
 

Swami Yogeshwaracharya Ji Maharaj
Spiritual Knowledge: सनातन धर्म की आध्यात्मिक परंपरा में भगवान की लीला और उनकी शक्ति को समझना बहुत गहरा विषय माना गया है। स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज बताते हैं कि भगवान के दो प्रमुख सहायक होते हैं, जिनके माध्यम से संसार की व्यवस्था चलती है। ये दो सहायक हैं- एक जीव और दूसरा माया। भगवान अपनी इच्छा से इन दोनों के माध्यम से संसार में विभिन्न प्रकार की लीलाएं करते हैं और जीवों को उनके कर्मों के अनुसार अनुभव प्रदान करते हैं। भगवान सर्वशक्तिमान हैं, उन्हें किसी सहारे की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन अपनी दिव्य व्यवस्था को चलाने के लिए वे जीव और माया को माध्यम बनाते हैं। जीव भगवान की अंश रूप शक्ति है, जबकि माया भगवान की बाहरी शक्ति है, जो संसार के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज के अनुसार भगवान जीव को माया से घेरकर रखते हैं। सामान्य जीव जब संसार के आकर्षणों में फंस जाता है तो वह माया के प्रभाव को ही सत्य मानने लगता है। धन, मोह, अहंकार, इच्छाएं और सांसारिक संबंध उसे भगवान से दूर करने लगते हैं। माया का कार्य ही ऐसा है कि वह जीव को संसार में बांधे रखती है और उसे अपने वास्तविक स्वरूप को भूलने पर मजबूर करती है।

जीव स्वयं भगवान का अंश होने के कारण दिव्य शक्ति से जुड़ा हुआ है, लेकिन जब वह अपने मूल स्वरूप को भूल जाता है तो माया के प्रभाव में आ जाता है। यही कारण है कि मनुष्य जीवन में अनेक प्रकार के दुख, चिंता और भ्रम का अनुभव करता है।

भगवान के चरणों में आश्रय का महत्व

महाराज जी बताते हैं कि जो जीव परमात्मा भगवान श्रीमन नारायण के चरणों में आश्रित हो जाता है, उसके ऊपर माया का प्रभाव समाप्त होने लगता है। जब व्यक्ति अपने मन, वचन और कर्म से भगवान को अपना आधार मान लेता है और स्वयं को उनकी सेवा में समर्पित कर देता है, तब भगवान की कृपा उस जीव की रक्षा करती है। भगवान के चरणों में शरण लेने का अर्थ केवल पूजा करना नहीं है, बल्कि अपने जीवन को भगवान की इच्छा के अनुसार चलाना है। अपने अहंकार को छोड़कर प्रेम, भक्ति और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ना ही सच्ची शरणागति है।

भक्ति से दूर होती है माया की शक्ति

माया भगवान की शक्ति है, इसलिए वह भगवान के भक्तों को नुकसान नहीं पहुंचा सकती। जब जीव भगवान से जुड़ जाता है तो माया उसके लिए बाधा नहीं रहती, बल्कि भगवान की कृपा से वह जीव को और अधिक आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाने का माध्यम बन जाती है। जिस प्रकार सूर्य के सामने अंधकार टिक नहीं सकता, उसी प्रकार भगवान की भक्ति और स्मरण के सामने माया का प्रभाव कमजोर पड़ जाता है। जो व्यक्ति निरंतर भगवान का नाम स्मरण करता है, उनके गुणों का चिंतन करता है और सेवा भाव से जीवन व्यतीत करता है, वह धीरे-धीरे सांसारिक बंधनों से मुक्त होने लगता है।

जीवन में भगवान की भक्ति का संदेश

स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज का संदेश है कि मनुष्य को अपने जीवन में भगवान श्रीमन नारायण के प्रति पूर्ण विश्वास रखना चाहिए। संसार की परिस्थितियां चाहे जैसी हों, लेकिन यदि हृदय में भगवान का आश्रय है तो कोई भी शक्ति जीव को उसके आध्यात्मिक मार्ग से विचलित नहीं कर सकती। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने कर्म करते हुए भगवान को याद रखे, सेवा और भक्ति को जीवन का आधार बनाए और हर परिस्थिति में भगवान की कृपा पर विश्वास रखे। यही मार्ग जीव को माया के प्रभाव से बचाकर परम शांति और आनंद की ओर ले जाता है।

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