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Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj: लोग क्यों नहीं कर पाते हैं भगवान का अनुभव, जानें क्या है कारण

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज
सार

Indian Spirituality: भगवान को पाने के लिए बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता और सच्चा भाव जरूरी है। जब मनुष्य अपने भीतर झांकता है और अपने हृदय को निर्मल बनाता है, तभी उसे भगवान की अनुभूति होने लगती है।
 

Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj
Spiritual Knowledge: स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज बताते हैं कि मनुष्य अक्सर भगवान को बाहर खोजता रहता है, जबकि भगवान का अनुभव करने के लिए सबसे पहले अपने भीतर झांकना जरूरी है। जैसे एक चोर किसी सेठ के धन को बाहर खोजता रहा, लेकिन उसे यह पता नहीं था कि असली धन उसी के बैग में रखा हुआ है। ठीक उसी तरह मनुष्य भी जीवनभर सुख, शांति और आनंद को संसार की वस्तुओं में खोजता रहता है, जबकि परम आनंद का खजाना उसके अपने हृदय में मौजूद होता है।

समुद्र मंथन के बाद जब अमृत निकला तो देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में अनेक असुर मारे गए। उन्हीं में कालनेमी नाम का एक शक्तिशाली असुर भी था। भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया था। बाद में शुक्राचार्य ने अपनी शक्ति से उसे फिर जीवित कर दिया। जीवित होने के बाद कालनेमी ने कठोर तपस्या की और ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने उससे वरदान मांगने को कहा। कालनेमी ने इच्छा व्यक्त की कि युद्ध में उसे कोई भी पराजित न कर सके और देवता, मानव तथा दानव सभी उसके सामने हार जाएं। 

ब्रह्मा जी ने कहा कि यह वरदान मिलेगा, लेकिन इसका समय निश्चित है। द्वापर युग के अंत में तुम्हारा जन्म होगा और उस समय तुम अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर सकोगे।  वही कालनेमी आगे चलकर कंस के रूप में जन्मा। कंस अत्यंत शक्तिशाली और अहंकारी राजा बना। उसने धरती के लगभग सभी राजाओं को पराजित कर दिया। उसकी शक्ति इतनी बढ़ गई कि उसने स्वर्ग और वैकुंठ तक भगवान विष्णु से युद्ध करने का विचार कर लिया।

भगवान विष्णु ने कंस को क्यों नहीं मारा?

जब कंस भगवान विष्णु से युद्ध करने वैकुंठ पहुंचा तो भगवान ने समझ लिया कि इस समय सीधे युद्ध करना उचित नहीं होगा। भगवान विष्णु ने एक लीला की और कंस के मन में ही जाकर बैठ गए। कंस भगवान को बाहर खोजता रहा, लेकिन भगवान उसके अपने भीतर ही मौजूद थे। यह प्रसंग हमें बताता है कि भगवान को केवल बाहरी स्थानों पर खोजने से अनुभव नहीं होता। जब तक मनुष्य अपने अंदर के अहंकार, छल और अशुद्ध विचारों को दूर नहीं करता, तब तक वह भगवान की उपस्थिति को महसूस नहीं कर पाता।

सेठ और चोर की कथा से मिलने वाली शिक्षा

एक बार एक सेठ जी ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। उनके पास बहुत धन था। एक चोर को यह बात पता चल गई और वह भी उसी ट्रेन में उनके पास बैठ गया। उसने बातचीत करते हुए सेठ जी का विश्वास जीतने की कोशिश की। सेठ जी समझ गए कि यह व्यक्ति चोर है। जब चोर थोड़ी देर के लिए बाथरूम गया तो सेठ जी ने उसका बैग खोला और अपना बटुआ उसी के बैग में रख दिया। बाद में जब चोर ने सेठ जी का बैग खोजा तो उसे धन नहीं मिला। वह हैरान रह गया। सुबह जब वे कलकत्ता पहुंचे तो चोर ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए पूछा कि आखिर धन कहां रखा था? सेठ जी ने कहा कि धन तुम्हारे अपने बैग में था। अगर तुम अपना बैग भी देख लेते तो तुम्हें सब कुछ मिल जाता। यह कहानी बताती है कि हम भी जीवन में सुख, शांति और भगवान को बाहर खोजते रहते हैं, जबकि वह हमारे अपने हृदय में विराजमान हैं।

पूतना की कथा और भगवान की करुणा

स्वामी जी बताते हैं कि भगवान भक्तों के भाव को देखते हैं। पूतना का अर्थ होता है जिसका हृदय पवित्र नहीं है। कथा के अनुसार राजा बलि के दरबार में जब भगवान वामन आए थे, तब उनकी सुंदरता देखकर रत्नमाला नाम की कन्या के मन में मातृत्व का भाव जागा। उसने सोचा कि यदि यह मेरा पुत्र होता तो मैं इसे दूध पिलाती, लेकिन जब भगवान वामन ने राजा बलि से तीन पग भूमि मांगकर सब कुछ ले लिया, तब रत्नमाला के मन में क्रोध आया। उसने सोचा कि यदि यह बालक मेरे हाथ लगे तो मैं इसे विष मिला हुआ दूध पिला दूंगी। यही रत्नमाला आगे चलकर पूतना बनी और भगवान श्रीकृष्ण को मारने के उद्देश्य से आई। उसने अपने स्तनों पर विष लगाकर भगवान को दूध पिलाने का प्रयास किया। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उसके कपट को भी स्वीकार कर लिया और उसके जीवन का उद्धार कर दिया।

भगवान भाव देखते हैं, बाहरी रूप नहीं

पूतना के शरीर का अंत हो गया, लेकिन भगवान ने उसे भी माता का स्थान दिया क्योंकि उसने भगवान को अपने स्तन से दूध पिलाने का भाव रखा था। भगवान ने उसके पाप नहीं देखे, बल्कि उसके अंदर छिपे मातृत्व के भाव को स्वीकार किया। यशोदा मैया जब श्रीकृष्ण को वापस लेकर आईं तो उन्हें चिंता हुई कि कहीं उनके लाला को किसी की नजर न लग गई हो। उन्होंने प्रेम से कृष्ण की नजर उतारी, गोमूत्र से स्नान कराया और गोपूछ से झाड़ा लगाया। यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान को पाने के लिए बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता और सच्चा भाव जरूरी है। जब मनुष्य अपने भीतर झांकता है और अपने हृदय को निर्मल बनाता है, तभी उसे भगवान की अनुभूति होने लगती है।

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