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Swami Ishan Mahesh Ji Maharaj: सभी शास्त्रों ने आत्महत्या को क्यों बताया महापाप? स्वामी ईशान महेश जी ने बताया

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी ईशान महेश जी महाराज
सार

Religious Discourse: मनुष्य शरीर भगवान का अनुपम उपहार है। इसका सम्मान करना, इसे स्वस्थ रखना और इससे समाज, परिवार तथा धर्म की सेवा करना ही सच्चा कर्तव्य है। 
 

Swami Ishan Mahesh Ji Maharaj
Importance of Human Life: स्वामी ईशान महेश जी महाराज बताते हैं कि भगवान श्रीराम के अनुसार, यह मनुष्य शरीर हमारी अपनी संपत्ति नहीं है, बल्कि भगवान की अमूल्य देन है। जैसे कोई व्यक्ति किसी को अपनी कोई कीमती वस्तु कुछ समय के लिए संभालने को दे, उसी प्रकार यह शरीर भी ईश्वर की अमानत है। इसलिए मनुष्य को इसे सुरक्षित रखना, इसका सदुपयोग करना और इसे धर्म तथा अच्छे कर्मों में लगाना चाहिए। इस शरीर को नष्ट करने का अधिकार केवल उसी को है जिसने इसे दिया है। जब मनुष्य स्वयं अपने शरीर का अंत कर देता है, तो वह ईश्वर की अमानत के साथ विश्वासघात करता है। इसी कारण शास्त्रों में आत्महत्या को महापाप कहा गया है।

महाराज जी कहते हैं कि श्रीराम ने बताया है कि जो व्यक्ति आत्महत्या करता है, उसकी बहुत दुर्गति होती है। केवल एक जन्म में ही नहीं, बल्कि अनेक जन्मों तक उसे उसके कर्मों का फल भोगना पड़ता है। उसका आध्यात्मिक मार्ग बाधित हो जाता है और वह उस शुभ अवसर को खो देता है, जो उसे मनुष्य जन्म के रूप में मिला था। इसलिए शास्त्र बार-बार यह शिक्षा देते हैं कि चाहे जीवन में कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, मनुष्य को धैर्य, श्रद्धा और भगवान पर विश्वास बनाए रखना चाहिए।

मनुष्य जन्म का वास्तविक उद्देश्य

सनातन धर्म में मनुष्य जन्म को अत्यंत दुर्लभ माना गया है। अनगिनत योनियों में भटकने और अनेक जन्मों के बाद आत्मा को मनुष्य शरीर प्राप्त होता है। यह जन्म केवल भोग-विलास या सांसारिक सुखों के लिए नहीं, बल्कि आत्मकल्याण, ईश्वर की भक्ति और मोक्ष प्राप्त करने के लिए मिला है। श्रीराम कहते हैं कि जिसने मनुष्य शरीर पाकर भी भगवान का स्मरण नहीं किया, अपने जीवन को धर्ममय नहीं बनाया और भवसागर से पार होने का प्रयास नहीं किया, उसने इस दुर्लभ अवसर को व्यर्थ कर दिया। ऐसे व्यक्ति से मानो उसने अपने ही आध्यात्मिक जीवन की हत्या कर दी हो।

जीवन का उद्देश्य भूल जाना

स्वामी जी समझाते हैं कि भगवान ने मनुष्य को बुद्धि, विवेक और प्रेमपूर्ण हृदय इसलिए दिया है कि वह अपने मन को भगवान में लगाए। लेकिन जब मनुष्य माया, लोभ, मोह, क्रोध और पाप कर्मों में उलझ जाता है, तब उसका मन ईश्वर से दूर हो जाता है। धीरे-धीरे उसका जीवन केवल सांसारिक इच्छाओं और स्वार्थ तक सीमित रह जाता है। भगवान की कृपा से मिला यह अनमोल जीवन तब अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाता है। यही कारण है कि शास्त्र मनुष्य को बार-बार सत्कर्म, भक्ति और आत्मचिंतन की प्रेरणा देते हैं।

भगवान की कृपा का करें सम्मान 

श्रीराम का संदेश है कि मनुष्य शरीर भगवान का अनुपम उपहार है। इसका सम्मान करना, इसे स्वस्थ रखना और इससे समाज, परिवार तथा धर्म की सेवा करना ही सच्चा कर्तव्य है। जीवन में सुख और दुख दोनों आते हैं, लेकिन कोई भी कठिनाई स्थायी नहीं होती। भगवान पर विश्वास, संतों का मार्गदर्शन, प्रार्थना और धैर्य मनुष्य को हर संकट से बाहर निकाल सकते हैं। इसलिए निराशा में कोई गलत कदम उठाने के बजाय ईश्वर की शरण में जाना ही सबसे बड़ा उपाय है।

भक्ति, सेवा, और आत्मकल्याण 

इसी भावना से सभी शास्त्र आत्महत्या को महापाप बताते हैं, क्योंकि यह केवल शरीर का अंत नहीं माना गया, बल्कि ईश्वर की दी हुई अमूल्य देन का अनादर और मनुष्य जन्म के महान उद्देश्य को अधूरा छोड़ देना भी माना गया है। इसलिए हर व्यक्ति को अपने जीवन का सम्मान करना चाहिए, भगवान की कृपा को पहचानना चाहिए और इस दुर्लभ मानव जीवन को भक्ति, सेवा, सदाचार और आत्मकल्याण के मार्ग पर लगाकर सार्थक बनाना चाहिए।

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