Navratri Visarjan: आज प्रतिमा विसर्जन के दौरान नदियों और तालाबों में प्रदूषण बढ़ने की चिंता भी सामने आती है। प्लास्टर ऑफ पेरिस, रासायनिक रंगों और अन्य गैर-जैविक सजावटी सामग्री से बनी प्रतिमाएं जल और जलीय जीवों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
Navratri Visarjan Ka Sach: नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की आराधना, भक्ति और शक्ति की उपासना का प्रतीक है। इन नौ दिनों में भक्त पूरे श्रद्धाभाव से मां भगवती की पूजा करते हैं। घरों और बड़े-बड़े पंडालों में माता की प्रतिमा स्थापित की जाती है। कहीं भजन-कीर्तन होते हैं, तो कहीं जागरण और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। भक्त मां से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। लेकिन जब माता को विदा करने का समय आता है, तब कई बार हमारी भक्ति पर सवाल खड़े होने लगते हैं।
साध्वी कृष्णप्रिया जी ने नवरात्रि विसर्जन से जुड़ी एक गंभीर बात की ओर ध्यान दिलाया है। उनका कहना है कि हम कई दिनों तक जिन देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, विसर्जन के बाद उन्हीं की प्रतिमाओं की दुर्दशा देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। नदियों और जलाशयों में प्रतिमाओं के टूटे हुए सिर, हाथ-पैर और अन्य हिस्से पड़े दिखाई देते हैं। जिस मां भगवती के सामने हम सिर झुकाकर अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना करते हैं, उनकी प्रतिमा को इस तरह बिखरा हुआ छोड़ देना हमारी आस्था और व्यवहार के बीच का अंतर दिखाता है।
केवल दिखावा बनकर रह गई है भक्ति
साध्वी कृष्णप्रिया जी का संदेश है कि हमें स्वयं से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या हमारी पूजा सच्ची श्रद्धा से जुड़ी है या फिर हम केवल उत्सव, मौज-मस्ती और मनोरंजन तक ही सीमित रह गए हैं। बड़े-बड़े पंडाल लगाना, आकर्षक सजावट करना और धूमधाम से उत्सव मनाना गलत नहीं है। लेकिन यदि इन सबके बाद हम प्रतिमाओं के सम्मान और प्रकृति की रक्षा का ध्यान नहीं रखते, तो हमारी भक्ति अधूरी रह जाती है। सच्ची उपासना केवल पूजा-पाठ करने या धार्मिक आयोजन करने से पूरी नहीं होती। उसका वास्तविक अर्थ है अपने आचरण में प्रेम, करुणा, जिम्मेदारी और सम्मान को अपनाना।
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प्रतिमा विसर्जन के साथ प्रकृति की रक्षा जरूरी
आज प्रतिमा विसर्जन के दौरान नदियों और तालाबों में प्रदूषण बढ़ने की चिंता भी सामने आती है। प्लास्टर ऑफ पेरिस, रासायनिक रंगों और अन्य गैर-जैविक सजावटी सामग्री से बनी प्रतिमाएं जल और जलीय जीवों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए विसर्जन के लिए पर्यावरण के अनुकूल मिट्टी की प्रतिमाओं का चुनाव करना चाहिए और स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित सुरक्षित विसर्जन व्यवस्था का पालन करना चाहिए। प्रतिमाओं को सम्मानपूर्वक विसर्जित करना, नदी-तालाबों को साफ रखना और पूजा सामग्री को जल में न फेंकना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
सच्ची भक्ति का अर्थ समझना जरूरी
साध्वी कृष्णप्रिया जी का यह संदेश हमें सोचने पर मजबूर करता है कि भगवान की आराधना केवल कुछ दिनों का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। यदि हम मां दुर्गा को शक्ति का स्वरूप मानते हैं, तो हमें प्रकृति, जीव-जंतुओं और समाज के प्रति भी संवेदनशील होना चाहिए। नवरात्रि में मां भगवती की पूजा करने के साथ-साथ उनके प्रति सम्मान बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। याद रखें, सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार और कर्मों में दिखाई देती है। मां दुर्गा की विदाई तभी सार्थक होगी, जब हम श्रद्धा के साथ-साथ स्वच्छता, जिम्मेदारी और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प भी लें।