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Sadhvi Krishnapriya Ji: जीवन में व्रत रखने का सही महत्व, साध्वी कृष्णप्रिया जी ने बताया सही तरीका

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कथावाचक साध्वी कृष्णप्रिया जी
सार

Spiritual Growth: व्रत केवल परंपरा निभाने या विशेष प्रकार के भोजन करने का नाम नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य शरीर की शुद्धि, मन की एकाग्रता और आत्मिक उन्नति है। 
 

Sadhvi Krishnapriya Ji
Spiritual Motivation: भारतीय संस्कृति में व्रत का विशेष महत्व माना गया है। अधिकांश लोग सोमवार, गुरुवार, एकादशी, पूर्णिमा, चतुर्थी या अन्य धार्मिक अवसरों पर व्रत रखते हैं। लेकिन अक्सर लोग व्रत के वास्तविक उद्देश्य को भूल जाते हैं और इसे केवल एक परंपरा या धार्मिक रस्म मानकर निभाते हैं। साध्वी कृष्णप्रिया जी के अनुसार व्रत का अर्थ केवल भोजन का प्रकार बदल देना नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का एक श्रेष्ठ माध्यम है। यदि व्रत सही भावना और सही नियमों के साथ किया जाए तो यह व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।

साध्वी कृष्णप्रिया जी बताती हैं कि व्रत का सबसे बड़ा उद्देश्य शरीर और मन की शुद्धि करना है। हम प्रतिदिन तरह-तरह के भोजन करते हैं, जिससे शरीर पर अतिरिक्त भार पड़ता है। व्रत शरीर को विश्राम देने और पाचन तंत्र को संतुलित करने का अवसर देता है। इसके साथ ही मन को भी सांसारिक इच्छाओं से हटाकर ईश्वर की ओर लगाने का अवसर मिलता है। इसलिए व्रत केवल भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि स्वयं को संयमित करने का अभ्यास है।

केवल भोजन बदलना व्रत नहीं

आज के समय में कई लोग व्रत के दिन सामान्य भोजन छोड़कर उसकी जगह साबूदाना, आलू, मिठाइयाँ, तले हुए पकवान और कई प्रकार के फलाहारी व्यंजन भरपूर मात्रा में खाते हैं। कई बार तो व्रत के दिन सामान्य दिनों से भी अधिक भोजन कर लिया जाता है। साध्वी कृष्णप्रिया जी कहती हैं कि यदि केवल खाने की वस्तुएँ बदल दी जाएँ और भोजन की मात्रा पहले जैसी या उससे अधिक रहे, तो इसे सच्चा व्रत नहीं कहा जा सकता। व्रत का अर्थ पेट भरना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण रखना है।

व्रत में सादगी और संयम जरूरी

साध्वी कृष्णप्रिया जी के अनुसार यदि कोई व्यक्ति पहली बार व्रत रख रहा है तो वह अपनी क्षमता के अनुसार एक या दो बार हल्का फलाहार कर सकता है। जैसे दूध, केला, सेब या अन्य सरल फल ग्रहण किए जा सकते हैं। धीरे-धीरे जब शरीर और मन इस अभ्यास के अभ्यस्त हो जाएँ, तब भोजन की मात्रा कम करते हुए अधिक संयम अपनाने का प्रयास करना चाहिए। व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि उसे संतुलित रखना और मन को मजबूत बनाना है।

व्रत के साथ मन की शुद्धि भी आवश्यक

सच्चा व्रत केवल भोजन छोड़ने तक सीमित नहीं होता। यदि मन में क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और नकारात्मक विचार भरे हों, तो व्रत का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। व्रत के दिन व्यक्ति को शांत मन से भगवान का स्मरण करना चाहिए, भजन, जप, ध्यान और सत्संग में समय बिताना चाहिए। इससे मन को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है और आत्मिक शांति का अनुभव होता है।

व्रत से बढ़ता है आत्मबल और अनुशासन 

नियमित रूप से व्रत करने से व्यक्ति में आत्मसंयम और अनुशासन का विकास होता है। जब हम अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना सीखते हैं, तो जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना भी अधिक धैर्य और संतुलन के साथ कर पाते हैं। व्रत हमें यह सिखाता है कि सुख केवल स्वादिष्ट भोजन में नहीं, बल्कि संयम और संतोष में भी है।

एकाग्रता और आत्मिक उन्नति 

साध्वी कृष्णप्रिया जी का संदेश स्पष्ट है कि व्रत केवल परंपरा निभाने या विशेष प्रकार के भोजन करने का नाम नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य शरीर की शुद्धि, मन की एकाग्रता और आत्मिक उन्नति है। यदि व्रत सादगी, संयम और ईश्वर भक्ति के साथ किया जाए, तो यह जीवन को स्वस्थ, संतुलित और सकारात्मक बनाने का एक प्रभावी साधन बन जाता है। इसलिए व्रत रखते समय भोजन की मात्रा बढ़ाने के बजाय मन को शांत, विचारों को पवित्र और जीवन को अनुशासित बनाने का प्रयास करना ही सच्चे व्रत की पहचान है।

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