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Pundarik Goswami Ji: राधारमण मंदिर में क्या बिना पैसे नहीं मिलता प्रसाद? पुण्डरीक गोस्वामी जी ने बताया कारण

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी
सार

Radha Raman Temple: राधारमण मंदिर में प्रसाद को लेकर उठने वाले सवालों का उत्तर देते हुए पुण्डरीक गोस्वामी जी का संदेश यही है कि भगवान की सबसे प्रिय भेंट तुलसी और सच्ची भक्ति है, जो सभी को निःशुल्क प्राप्त होती है।
 

Pundrik Goswami Ji Maharaj
Radha Raman Mandir Vrindavan: वृंदावन के प्रसिद्ध राधारमण मंदिर में प्रसाद को लेकर अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है। कई श्रद्धालु पूछते हैं कि जब भगवान का प्रसाद सभी के लिए होता है, तो फिर बिना पैसे दिए लड्डू या अन्य प्रसाद क्यों नहीं मिलता? इसी विषय पर पुण्डरीक गोस्वामी जी ने सरल शब्दों में अपनी बात रखी और इस भ्रम को दूर करने का प्रयास किया।

पुण्डरीक गोस्वामी जी बताते हैं कि राधारमण जी के मंदिर में ऐसा नहीं है कि बिना कुछ दिए कोई प्रसाद नहीं मिलता। मंदिर में हर आरती के बाद श्रद्धालुओं को तुलसी का प्रसाद वितरित किया जाता है। यह तुलसी सभी को बिना किसी शुल्क के दी जाती है। जो भी श्रद्धा से भगवान के दर्शन करने आता है, वह तुलसी का प्रसाद प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने कहा कि राधारमण जी स्वयं शालिग्राम स्वरूप भगवान हैं और उनके लिए सबसे प्रिय वस्तु तुलसी है। वृंदावन स्वयं तुलसी और भगवान की भक्ति का पावन धाम माना जाता है। इसलिए भगवान को अर्पित की गई तुलसी का विशेष महत्व है और वही सबसे श्रेष्ठ प्रसाद भी है।

भगवान को सबसे प्रिय है भक्ति

गोस्वामी जी ने भगवान श्रीकृष्ण के प्रसिद्ध श्लोक का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान कहते हैं कि "पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।" अर्थात यदि कोई भक्त प्रेम और श्रद्धा से एक पत्ता, एक फूल, एक फल या थोड़ा-सा जल भी अर्पित करता है, तो भगवान उसे प्रेमपूर्वक स्वीकार करते हैं। इसका अर्थ यह है कि भगवान के लिए वस्तु का मूल्य नहीं, बल्कि भक्त की भावना और भक्ति का महत्व होता है। इसलिए यदि किसी को केवल तुलसी का प्रसाद मिलता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि वह भगवान की सबसे प्रिय वस्तु प्राप्त कर रहा है।

लड्डू और अन्य प्रसाद बनाने में खर्च 

स्वामी जी आगे समझाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति लड्डू या अन्य विशेष प्रसाद लेना चाहता है, तो उसके पीछे भी एक व्यवस्था होती है। लड्डू अपने आप नहीं बन जाते। उन्हें बनाने के लिए हलवाई मेहनत करता है, सामग्री खरीदनी पड़ती है, घी, आटा, चीनी, मेवे और अन्य चीजों का खर्च होता है। साथ ही प्रसाद तैयार करने वाले लोगों के परिवार भी इसी कार्य से जुड़े होते हैं और उनकी आजीविका भी इसी पर निर्भर करती है। इसी कारण मंदिर में लड्डू जैसे प्रसाद के लिए निर्धारित राशि ली जाती है। यह भगवान के प्रसाद को बेचने का विषय नहीं, बल्कि उसे तैयार करने और व्यवस्था बनाए रखने का एक माध्यम है।

दान करने का अवसर भी सौभाग्य

पुण्डरीक गोस्वामी जी कहते हैं कि जब कोई श्रद्धालु भगवान के लिए कुछ अर्पित करता है, तो वह वास्तव में अपना सौभाग्य बढ़ाता है। उनके अनुसार धन की अधिष्ठात्री माता लक्ष्मी हैं और वे भगवान की ही शक्ति हैं। जो धन कुछ समय के लिए हमारी जेब में आता है, वह भी अंततः भगवान की कृपा से ही मिलता है। इसलिए जब हम भगवान की सेवा, प्रसाद या मंदिर की व्यवस्था के लिए कुछ अर्पित करते हैं, तो यह किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता, बल्कि भगवान और माता लक्ष्मी की सेवा का अवसर होता है। इसे दान या सेवा की भावना से देखना चाहिए, न कि लेन-देन के रूप में।

जो समर्थ नहीं हैं, उनके लिए भी मंदिर के खुले हैं द्वार 

गोस्वामी जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि यदि कोई श्रद्धालु आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है और वह प्रसाद के लिए राशि नहीं दे सकता, तो उसे निराश होने की आवश्यकता नहीं है। मंदिर में समय-समय पर होने वाले सेवा महोत्सवों और विशेष उत्सवों में बड़ी मात्रा में प्रसाद का निःशुल्क वितरण किया जाता है। उन्होंने सभी भक्तों को आमंत्रित करते हुए कहा कि ऐसे उत्सवों में अवश्य आएं, भगवान के दर्शन करें, कीर्तन का आनंद लें और प्रेमपूर्वक प्रसाद ग्रहण करें। उन्होंने विश्वास दिलाया कि भविष्य में भी ऐसे अवसर आते रहेंगे, जहां अधिक से अधिक भक्तों को खुले मन से प्रसाद वितरित किया जाएगा।

भगवान की सेवा का अवसर 

राधारमण मंदिर में प्रसाद को लेकर उठने वाले सवालों का उत्तर देते हुए पुण्डरीक गोस्वामी जी का संदेश यही है कि भगवान की सबसे प्रिय भेंट तुलसी और सच्ची भक्ति है, जो सभी को निःशुल्क प्राप्त होती है। वहीं लड्डू जैसे विशेष प्रसाद के लिए जो राशि ली जाती है, वह उसकी तैयारी और मंदिर की व्यवस्था से जुड़ी आवश्यकताओं के कारण होती है। यदि कोई श्रद्धालु दान करता है, तो वह भगवान की सेवा का अवसर प्राप्त करता है, और यदि कोई ऐसा करने में सक्षम नहीं है, तो भी मंदिर के उत्सवों में सभी के लिए प्रेमपूर्वक प्रसाद की व्यवस्था की जाती है। इसलिए श्रद्धालुओं को प्रसाद के पीछे केवल मूल्य नहीं, बल्कि सेवा, व्यवस्था और भक्ति की भावना को समझना चाहिए।

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