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Sanjeev Krishna Thakur Ji: संकट में शास्त्र ही दिखाते हैं सही मार्ग, संजीव कृष्ण ठाकुर जी ने बताया महत्व

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
श्री संजीव कृष्ण ठाकुर जी महाराज
सार

Bhagavad Gita: जब जीवन में दुविधा, भ्रम या धर्मसंकट उत्पन्न हो, तब किसी व्यक्ति की राय या सुनी-सुनाई बातों के बजाय शास्त्रों को ही प्रमाण मानना चाहिए। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन को यही शिक्षा दी थी।
 

Sanjeev Krishna Thakur ji Maharaj
Spiritual Inspiration: मनुष्य के जीवन में कई ऐसे अवसर आते हैं, जब उसे समझ नहीं आता कि क्या सही है और क्या गलत। कभी परिवार की जिम्मेदारियां, कभी समाज की परिस्थितियां और कभी अपने मन की उलझनें उसे दुविधा में डाल देती हैं। ऐसे समय में व्यक्ति अनेक लोगों से सलाह लेता है, लेकिन हर व्यक्ति की राय अलग-अलग होती है। इसलिए यह समझना कठिन हो जाता है कि किसकी बात मानी जाए। इसी विषय पर संजीव कृष्ण ठाकुर जी महाराज ने बताया कि जब जीवन में धर्मसंकट या दुविधा की स्थिति उत्पन्न हो जाए, तब किसी व्यक्ति की नहीं बल्कि शास्त्रों की शरण लेनी चाहिए। शास्त्र ही मनुष्य को सही और गलत का स्पष्ट ज्ञान कराते हैं।

महाराज ने बताया कि यह कोई साधारण विचार नहीं है, बल्कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का उपदेश है। महाभारत के युद्ध के समय कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन भी गहरे धर्मसंकट में पड़ गए थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि युद्ध करना उचित है या नहीं। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान देते हुए कहा कि जब कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्णय करना कठिन हो जाए, तब शास्त्रों को ही प्रमाण मानना चाहिए। गीता का प्रसिद्ध श्लोक है कि “तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।” अर्थात क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इसका अंतिम प्रमाण शास्त्र ही हैं।

व्यक्ति नहीं, शास्त्र को बनाएं आधार

संजीव कृष्ण ठाकुर जी महाराज ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की बात को अंतिम सत्य नहीं मानना चाहिए। संसार में हर व्यक्ति अपनी समझ, अनुभव और परिस्थितियों के अनुसार सलाह देता है। कई बार सुनी-सुनाई बातें भी लोगों तक पहुँच जाती हैं, जिनका कोई प्रमाण नहीं होता। यदि हम केवल लोगों की बातों पर चलेंगे तो भ्रम बढ़ सकता है। लेकिन शास्त्रों में जो बातें कही गई हैं, वे भगवान की वाणी और ऋषि-मुनियों के अनुभवों पर आधारित हैं। इसलिए जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय शास्त्रों को ही आधार बनाना चाहिए।

समय बदलता है, शास्त्रों का सत्य नहीं

महाराज ने समझाया कि समय के साथ समाज, तकनीक और जीवन की परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन शास्त्रों के सिद्धांत कभी नहीं बदलते। हजारों वर्ष पहले भी शास्त्र सत्य का मार्ग बताते थे, सैकड़ों वर्ष पहले भी वही शिक्षा देते थे और आज भी वही संदेश दे रहे हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए भी शास्त्रों का ज्ञान उतना ही उपयोगी रहेगा। यही कारण है कि शास्त्रों को सनातन कहा गया है, क्योंकि उनका सत्य हर युग में समान रहता है।

शास्त्रों का अध्ययन क्यों है आवश्यक 

उन्होंने कहा कि केवल शास्त्रों का नाम लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका अध्ययन और उनके अनुसार जीवन जीने का प्रयास भी करना चाहिए। जब मनुष्य नियमित रूप से गीता, रामायण, भागवत और अन्य धर्मग्रंथों का अध्ययन करता है, तब उसके भीतर सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है। कठिन परिस्थितियों में भी उसका मन विचलित नहीं होता, क्योंकि उसे पता होता है कि धर्म का मार्ग क्या है। शास्त्र मनुष्य को केवल धार्मिक ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि जीवन को सफल, संतुलित और शांतिपूर्ण बनाने की प्रेरणा भी देते हैं।

जीवन में शास्त्रों का करना चाहिए सम्मान 

संजीव कृष्ण ठाकुर जी महाराज ने अपने प्रवचन में स्पष्ट किया कि जब जीवन में दुविधा, भ्रम या धर्मसंकट उत्पन्न हो, तब किसी व्यक्ति की राय या सुनी-सुनाई बातों के बजाय शास्त्रों को ही प्रमाण मानना चाहिए। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन को यही शिक्षा दी थी। शास्त्रों का ज्ञान काल, परिस्थिति और युग के परिवर्तन से प्रभावित नहीं होता। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में शास्त्रों का सम्मान करना चाहिए, उनका अध्ययन करना चाहिए और उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। यही मार्ग मनुष्य को सही निर्णय, आत्मिक शांति और जीवन की वास्तविक सफलता प्रदान करता है।

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