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Kirti Kishori Ji: मृत्यु रूपी भय से कैसे होंगे मुक्त, कीर्ति किशोरी जी ने बताया आसान उपाय

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कथावाचक कीर्ति किशोरी जी
सार

Philosophy of Life: मृत्यु का भय तभी तक बना रहता है जब तक मनुष्य माया और मोह में उलझा रहता है। कबूतर की तरह आंखें बंद करके भागने से समस्या का समाधान नहीं होता। आवश्यकता है सही दिशा में आगे बढ़ने की।
 

Kirti Kishori Ji
Spiritual Growth in Life: कीर्ति किशोरी जी एक बहुत सुंदर उदाहरण के माध्यम से समझाती हैं कि कबूतर ऐसा प्राणी है जो बहुत जल्दी भयभीत हो जाता है। जब वह दूर से किसी खतरे को देखता है, जैसे बिल्ली को अपनी ओर आते हुए देख लेता है, तो घबराहट में अपनी आंखें बंद कर लेता है। उसे लगता है कि आंखें बंद कर लेने से संकट टल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं होता। आंखें बंद होने के कारण उसे सही दिशा दिखाई नहीं देती और वह घबराकर पंख फड़फड़ाते हुए उड़ने लगता है। कई बार वह उसी दिशा में उड़ पड़ता है जहां से खतरा आ रहा होता है। इस प्रकार भय उसे बचाने के बजाय और बड़े संकट में डाल देता है।

मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। संसार में मृत्यु, मोह, माया, विषय-विकार और अनेक प्रकार के आकर्षण तथा भय हमारे चारों ओर फैले हुए हैं। इन्हें देखकर हम घबरा जाते हैं। लेकिन इनसे बचने का उपाय खोजने के बजाय अक्सर हम उन्हीं चीजों की ओर भागने लगते हैं जो हमारे दुख और बंधन का कारण बनती हैं। परिणामस्वरूप हमारा भय और बढ़ जाता है तथा जीवन अशांत हो जाता है।

माया और मोह का जाल

यह संसार अनेक प्रकार के मोह और आकर्षणों से भरा हुआ है। धन, पद, प्रतिष्ठा, संबंध और भौतिक सुख मनुष्य को अपनी ओर खींचते रहते हैं। इन चीजों को प्राप्त करने की दौड़ में व्यक्ति इतना उलझ जाता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य भूल जाता है। जब उसे लगता है कि ये सब कभी भी छिन सकते हैं, तब उसके भीतर भय जन्म लेने लगता है। यही भय धीरे-धीरे मृत्यु के भय का रूप धारण कर लेता है।

माया का स्वभाव ही ऐसा है कि वह जीव को अपने जाल में फंसा लेती है। मनुष्य जितना अधिक सांसारिक वस्तुओं में आसक्त होता है, उतना ही अधिक भयभीत रहता है। उसे हर समय किसी न किसी हानि, विछोह या मृत्यु की चिंता सताती रहती है। इसलिए केवल बाहरी साधनों से इस भय को समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए भीतर जागृति और सही दिशा की आवश्यकता होती है।

विवेक और सद्गुरु की कृपा का महत्व

कीर्ति किशोरी जी बताती हैं कि यदि मनुष्य को थोड़ा सा विवेक प्राप्त हो जाए और सद्गुरु का कृपा-वरदहस्त मिल जाए, तो उसका जीवन बदल सकता है। विवेक वह शक्ति है जो सही और गलत, शाश्वत और नश्वर के बीच अंतर करना सिखाती है। जब व्यक्ति समझ जाता है कि यह संसार परिवर्तनशील है और केवल भगवान ही शाश्वत हैं, तब उसका दृष्टिकोण बदलने लगता है।

सद्गुरु जीव को सही मार्ग दिखाते हैं। वे उसे बताते हैं कि भय से भागने के बजाय भगवान की शरण में जाना चाहिए। जिस प्रकार अंधकार में दीपक मार्ग दिखाता है, उसी प्रकार गुरु का ज्ञान जीवन के भ्रम और भय को दूर करता है। गुरु की कृपा से मनुष्य की दिशा बदल जाती है और वही दिशा परिवर्तन उसकी रक्षा का कारण बनता है।

भागवत का आश्रय: भय से मुक्ति का मार्ग

कीर्ति किशोरी जी के अनुसार, मृत्यु रूपी भय से मुक्ति का सबसे सरल और प्रभावी उपाय श्रीमद्भागवत का आश्रय है। भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भगवान की दिव्य वाणी और भक्ति का अमृत स्रोत है। इसके श्रवण, मनन और चिंतन से मनुष्य के भीतर भगवान के प्रति प्रेम जागृत होता है। जब हृदय में भगवान का स्मरण और विश्वास दृढ़ हो जाता है, तब मृत्यु का भय स्वतः कम होने लगता है। व्यक्ति समझने लगता है कि आत्मा अमर है और मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है। भागवत जीव को यह ज्ञान देती है कि भगवान की शरण में रहने वाला कभी अकेला नहीं होता। उसकी रक्षा स्वयं प्रभु करते हैं।

भगवान की भक्ति और सच्ची शांति 

मृत्यु का भय तभी तक बना रहता है जब तक मनुष्य माया और मोह में उलझा रहता है। कबूतर की तरह आंखें बंद करके भागने से समस्या का समाधान नहीं होता। आवश्यकता है सही दिशा में आगे बढ़ने की। विवेक, सद्गुरु की कृपा और श्रीमद्भागवत का आश्रय मनुष्य को भय, मोह और मृत्यु की चिंता से मुक्त कर सकता है। जब जीवन भगवान की भक्ति और उनके स्मरण से जुड़ जाता है, तब भय का स्थान विश्वास ले लेता है और मनुष्य सच्ची शांति तथा आध्यात्मिक सुरक्षा का अनुभव करता है। यही कीर्ति किशोरी जी का सरल और प्रेरणादायक संदेश है।

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