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Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj: चातुर्मास में पूजा के दौरान कर लें ये खास उपाय, मिलेगा अक्षय पुण्य फल

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज
सार

Chaturmas Niyam: चातुर्मास के दौरान आने वाली सभी एकादशी तिथियों का विशेष महत्व होता है। इन दिनों भगवान विष्णु की विधिवत पूजा, व्रत और नामस्मरण करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। 
 

Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj
Chaturmas Puja Importance: चातुर्मास हिंदू धर्म का अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक महत्व वाला समय माना जाता है। वर्ष 2026 में चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई से होगी और इसका समापन 21 नवंबर को होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस अवधि में भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और सृष्टि के संचालन का दायित्व भगवान शिव संभालते हैं। इसलिए इन चार महीनों को साधना, भक्ति, संयम और आत्मचिंतन का श्रेष्ठ अवसर माना गया है। स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज का कहना है कि चातुर्मास को केवल चार महीनों का व्रत न समझें, बल्कि इसे अपने जीवन और मन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का अभ्यास बनाएं। जो व्यक्ति इस समय धर्म, भक्ति और सदाचार का पालन करता है, उसे अनंत गुना पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

पुराणों में बताया गया है कि जब भगवान विष्णु शयन करते हैं, तब से लेकर चार महीनों तक किए गए धार्मिक कार्यों का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक मिलता है। स्कंद पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि इस अवधि में किया गया जप, तप, दान और पूजा अक्षय पुण्य प्रदान करता है। यही कारण है कि संत, महात्मा और भक्त इस समय को आध्यात्मिक उन्नति का सर्वोत्तम अवसर मानते हैं।

गुरु पूर्णिमा से मिलती है साधना की प्रेरणा

चातुर्मास शुरू होने के कुछ दिनों बाद गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व आता है। इस दिन श्रद्धालु अपने गुरु के चरणों में जाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और उनसे आध्यात्मिक जीवन की शिक्षा ग्रहण करते हैं। गुरु अपने शिष्यों को भक्ति, साधना और संयम का मार्ग बताते हैं। चातुर्मास में गुरु के बताए नियमों का पालन करने से साधक का मन स्थिर होता है और ईश्वर के प्रति श्रद्धा और भी मजबूत होती है।

चातुर्मास में संयम रखना सबसे बड़ा व्रत

स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज बताते हैं कि चातुर्मास का वास्तविक अर्थ केवल उपवास करना नहीं है, बल्कि अपने मन, वाणी और कर्म पर नियंत्रण रखना है। यदि कोई व्यक्ति दिन में तीन बार भोजन करता है तो वह एक समय का भोजन छोड़ सकता है। कोई अपनी प्रिय वस्तु, फल या मिठाई का त्याग कर सकता है। इस प्रकार का त्याग व्यक्ति के भीतर आत्मसंयम और अनुशासन विकसित करता है। यही चातुर्मास व्रत की सबसे बड़ी साधना है।

अनावश्यक यात्राओं से करें परहेज

चातुर्मास के दौरान बिना आवश्यकता यात्रा करने से बचने की भी परंपरा रही है। प्राचीन समय में संत और संन्यासी भी इन चार महीनों तक एक ही स्थान पर रहकर साधना करते थे। इसका उद्देश्य मन को स्थिर करना और आध्यात्मिक अभ्यास में निरंतरता बनाए रखना था। इसलिए इस अवधि में घर या आश्रम में रहकर पूजा, पाठ और ध्यान करना अधिक शुभ माना जाता है।

गुरु मंत्र का जाप करने का श्रेष्ठ समय

चातुर्मास को गुरु मंत्र के जाप और अनुष्ठान के लिए सबसे उत्तम समय माना गया है। स्वामी जी के अनुसार यदि किसी का मंत्र दो अक्षरों का है तो वह दो लाख या समय और सामर्थ्य के अनुसार दो करोड़ मंत्र जाप का संकल्प ले सकता है। यदि मंत्र चार या पांच अक्षरों का है तो उसी के अनुरूप लाखों की संख्या में जाप का लक्ष्य निर्धारित किया जा सकता है। नियमित मंत्र जाप से मन की शुद्धि होती है और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

प्रतिदिन स्नान, दान और पूजा का रखें नियम

इन चार महीनों में प्रतिदिन प्रातः स्नान करके भगवान की पूजा करना, यथाशक्ति दान देना और सत्कर्म करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि किसी वस्तु का त्याग किया गया है तो चातुर्मास समाप्त होने पर उसी वस्तु का दान करके व्रत का उद्यापन करना चाहिए। इससे व्रत पूर्ण माना जाता है और उसका पुण्य फल कई गुना बढ़ जाता है।

एकादशी व्रत का विशेष महत्व

चातुर्मास के दौरान आने वाली सभी एकादशी तिथियों का विशेष महत्व होता है। इन दिनों भगवान विष्णु की विधिवत पूजा, व्रत और नामस्मरण करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। धार्मिक मान्यता है कि एकादशी का पालन करने से मन और शरीर दोनों शुद्ध होते हैं तथा भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसलिए चातुर्मास में प्रत्येक एकादशी का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करना चाहिए।

चातुर्मास को बनाएं आत्मपरिवर्तन का पर्व

स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज का संदेश है कि चातुर्मास केवल धार्मिक परंपरा निभाने का समय नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर बनाने का अवसर है। यदि इन चार महीनों में व्यक्ति संयम, भक्ति, सेवा, दान, मंत्र जाप और सत्कर्म को अपने जीवन का हिस्सा बना ले, तो उसके भीतर सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगता है। यही चातुर्मास का वास्तविक उद्देश्य है। इस पवित्र काल में किए गए छोटे-छोटे शुभ कार्य भी भगवान की कृपा से अक्षय पुण्य फल प्रदान करते हैं और जीवन को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाते हैं।

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