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Devi Neha Saraswat: संसार और भगवान के प्रेम में क्या है खास अंतर? देवी नेहा सारस्वत ने बताया महत्व

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Krishna Bhakti: संसार के रिश्तों को सम्मान और प्रेम जरूर दें, लेकिन अपने मन का अंतिम सहारा भगवान को बनाएं। संसार के लोग आज साथ हैं, कल दूर हो सकते हैं, लेकिन श्रीहरि का प्रेम सदैव हमारे साथ रहता है।
 

Devi Neha Saraswat
Spiritual Knowledge: देवी नेहा सारस्वत के अनुसार संसार में मिलने वाला प्रेम और भगवान का प्रेम एक-दूसरे से बिल्कुल अलग होता है। संसार में हम जिन लोगों से प्रेम करते हैं, उनमें से कई लोग हमारे जीवन में किसी न किसी कारण से आते हैं। जब तक उन्हें हमारे साथ से खुशी, सुविधा या कोई लाभ मिलता है, तब तक वे हमारे करीब रहते हैं। समय अच्छा हो तो बहुत से लोग हमारे साथ खड़े दिखाई देते हैं, लेकिन जब जीवन में कठिन परिस्थितियां आती हैं, तब धीरे-धीरे लोगों की वास्तविकता सामने आने लगती है।

संसार के रिश्तों में ऐसा नहीं है कि हर रिश्ता स्वार्थी होता है। माता-पिता, परिवार और सच्चे मित्रों का प्रेम भी बहुत अनमोल होता है। फिर भी मनुष्य के रिश्तों की अपनी सीमाएं होती हैं। समय, परिस्थितियां और जीवन की मजबूरियां कई बार इंसान को अपनों से भी दूर कर देती हैं।

भगवान का प्रेम कभी साथ नहीं छोड़ता

देवी नेहा सारस्वत भगवान के प्रेम की विशेषता बताते हुए कहती हैं कि संसार चाहे कितना भी बदल जाए, भगवान का प्रेम हमेशा स्थिर रहता है। जब इंसान के पास कोई नहीं होता, जब वह दुख और परेशानी से घिर जाता है और उसे समझ नहीं आता कि किस दिशा में आगे बढ़ना है, तब भगवान उसका सहारा बनते हैं। भगवान श्रीकृष्ण और श्रीहरि के प्रति भक्ति इसी अटूट प्रेम का उदाहरण है। भक्त अपने जीवन में कितनी भी कठिनाइयों से गुजर रहा हो, भगवान उसका हाथ कभी नहीं छोड़ते। वे उसे पीड़ा से बाहर निकलने की शक्ति देते हैं और जीवन का सही अर्थ समझने का मार्ग दिखाते हैं।

श्रीहरि अंत तक निभाते हैं साथ

संसार के लोग जीवन के किसी पड़ाव पर साथ छोड़ सकते हैं, लेकिन भगवान का साथ जन्म-जन्मांतर तक माना गया है। श्रीहरि अपने भक्त को केवल सुख के समय नहीं, बल्कि दुख के समय भी संभालते हैं। जब मनुष्य टूट जाता है, तब भगवान उसे भीतर से मजबूत बनाते हैं। भगवान का प्रेम किसी स्वार्थ पर आधारित नहीं होता। वे भक्त से बदले में धन, पद या किसी वस्तु की मांग नहीं करते। सच्चे मन से किया गया स्मरण और प्रेम ही भगवान के लिए पर्याप्त माना गया है।

भगवान के प्रेम में मिलता है सच्चा सहारा

देवी नेहा सारस्वत का संदेश यही है कि संसार के रिश्तों को सम्मान और प्रेम जरूर दें, लेकिन अपने मन का अंतिम सहारा भगवान को बनाएं। संसार के लोग आज साथ हैं, कल दूर हो सकते हैं, लेकिन श्रीहरि का प्रेम सदैव हमारे साथ रहता है। वे हमारी पीड़ा समझते हैं, जीवन का मार्ग दिखाते हैं और अंत तक हमारा साथ निभाते हैं। इसीलिए भगवान का प्रेम सबसे अनमोल है, क्योंकि यह परिस्थितियों के साथ नहीं बदलता। जब पूरी दुनिया दूर हो जाए, तब भी भक्त को विश्वास रहता है कि उसके श्रीहरि उसके साथ हैं और अंततः उसे अपने हृदय से लगा लेंगे।

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देवी नेहा सारस्वत
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